कलात्मक चेतना और कला – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कलात्मक चेतना और कला – ३
( Artistic Consciousness and Art – 3 )

कला, सामाजिक मानसिकता तथा सामान्य चेतना सहित, सामाजिक चेतना के सारे स्तरों पर यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। कलाकृतियों में, रचनात्मक व्यक्तित्व की प्रतिभा, अतिकल्पना (fantasy) तथा कल्पनाशीलता मूर्त होती है। समाज का कला पर प्रभाव तथा कला का समाज पर प्रतिप्रभाव कई कारकों (factors) से निर्धारित होता है, जिनमें समाज की सामाजिक संरचना (structure), चेतना के अन्य रूप, एक प्रदत्त ऐतिहासिक अवधि में प्रभावी मानसिक रुख़ (attitude), राष्ट्रीय परंपराएं, सार्वजनिक रुचियां और अंतिम, कलाकार का व्यक्तित्व तथा उसकी व्यष्टिक (individual), अद्वितीय विशेषताएं भी शामिल हैं। कला के विशेष लक्षणों को और एक विशेष युग की कलात्मक चेतना को समुचित रुप से समझना इन कारकों की अंतर्क्रिया (interaction) से ही संभव होता है।

इसी वजह से, एक तरफ़, कलात्मक चेतना तथा कला और, दूसरी तरफ़, सामाजिक सत्व (social being) के बीच कोई सीधी-सादी, सरल निर्भरता नहीं होती है। रंगचित्रण, साहित्य, नाटक आदि में कला, प्रकृति और समाज का दर्पण-सम प्रतिबिंब नहीं होती है। कलाकारों द्वारा सृजित बिंबों में कलात्मक अविष्कार, अतिकल्पना और व्यक्तिगत अनुभव भी तथा वे कठिन समस्याएं भी शामिल होती हैं, जो समाज को आंदोलित करती हैं और जिनका अभी समाधान नहीं हुआ है। कला, व्यक्ति की भावनाओं और चेतना, दोनों को प्रभावित करती है। यह उसके भावनात्मक जगत को समृद्ध बनाती है और साथ ही उसके सामने नैतिक समस्याएं खड़ी कर देती है

मसलन, होमर की कविताओं, यूरिपीडस, सोफोक्लस और एसख़िलस की त्रासदियों (tragedies) में, ऐरिस्टोफ़न के प्रहसनों (comedies) तथा गीतात्मक कविताओं में यूनानी कला ने लोगों के जीवन में शुभाशुभ के (अच्छाई और बुराई) के बीच, उदात्त (noble) और क्षुद्र (base), त्रासदीय और प्रहसन, शाश्वत और क्षणिक के बीच सहसंबंध के प्रश्न को पेश किया। शेक्सपियर की कला ने एक ठोस ऐतिहासिक यथार्थता को परावर्तित करते हुए, लोगों के सामने जीवन के अर्थ का (हैमलेट), अपराध की दोषमुक्ति का (मैकबेथ), शुभाशुभ और व्यक्तिगत जिम्मेदारी तथा मानवीय अकृतज्ञता (किंग लियर) के शाश्वत प्रश्न प्रस्तुत किये। सर्वान्तेस की रचनाओं ने जीवन के अर्थ के, सत्य की खोज के, उदात्तता तथा पागलपन के, रूमानी वीरत्व और दैनिक जीवन के उथलेपन के बारे में नाना प्रश्न उठाये। रूसी लेखक लेव तालस्तोय और फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की रचनाओं का आधुनिक संस्कृति के लिए विराट महत्व है। उन्होंने हमें मानव आत्मा की अतल गहराइयों में झांकने तथा मनुष्य की मानसिकता की क्रियाविधि को समझने में समर्थ बनाया।

प्रत्येक राष्ट्र और जनगण विश्व कला में अपना ही विशेष योगदान करता है, क्योंकि उसकी नियति (destiny), संस्कृति, उसके कलाकारों, संगीतज्ञों, लेखकों और अभिनेताओं की व्यष्टिक, व्यक्तिगत विशेषताएं अद्वितीय होती हैं। अतः बड़े-छोटे, सभी राष्ट्रों की कला का चिरस्थायी (lasting) ऐतिहासिक महत्व होता है। इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि जनगण के इतिहास में आकस्मिक (abrupt) परिवर्तनों की अवधियों में कलात्मक चेतना तथा कला में विशेष तूफ़ानी और चौतरफ़ा उभार आता है।

आधुनिक पूंजीवादी समाज में, और कुछ विकासमान देशों में कला और यथार्थता की समझ अंतर्विरोधी (contradictory) है क्योंकि वे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों के हितों को परावर्तित करते हैं। पूंजीवादी समाज में आधुनिक कला प्रगतिशील (progressive), प्रतिक्रियावादी (reactionary) तथा रूढ़िपंथी (conservative) प्रवृतियों का मिश्रण है। इसे एक समरूप (homogeneous) चीज के रूप में नहीं लिया जाना चाहिये। जो समाज ऐसी कला को जन्म देता है, वह निस्संदेह अंतर्विरोधी तथा विषमरूप (heterogeneous) है। इसलिए ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन का उद्देश्य आधुनिक कलात्मक चेतना तथा संपूर्ण कला का आद्योपांत (thoroughly) विश्लेषण करना और उनके सामाजिक कार्यों का पर्दाफ़ाश (expose) करना तथा उनमें निहित मूल्यों (values) और नैतिक तथा सौंदर्यात्मक रुख़ों को गहराई से समझना है।

आधुनिक कला की जो कृतियां मानवीय व्यक्तित्व के ऊंचे गुणों को बढ़ावा देती हैं, न्याय की उपलब्धि के लिए स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तनों का आह्वान करती हैं और मानवतावादी परंपराओं और आदर्शों की घोषणा करती हैं, आम ऐतिहासिक प्रकृति के लिए अनुकूल हैं और भविष्य में वे विश्व संस्कृति की निधि (treasury) का अंग बनेंगी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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कलात्मक चेतना और कला – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत कलात्मक चेतना और कला पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कलात्मक चेतना और कला – २
( Artistic Consciousness and Art – 2 )

तार्किक संकल्पनाओं (logical concepts) व पेचीदा सिद्धांतों के रूप में विश्व को परावर्तित (reflect) करनेवाले विज्ञान से भिन्न, कला उन कलात्मक बिंबों का मूर्त भौतिक रूप है, जो हमारे संवेद अंगों (sense organs) को प्रभावित करते हैं और निश्चित भावात्मक अनुक्रिया (emotional reaction) को उकसाते हैं। वैज्ञानिक ज्ञान की प्रणाली में दृश्य-संवेदात्मक बिंबों (visual-sensory images) का कुछ हद तक गौण स्थान है; उन्हें अध्ययनाधीन वस्तुओं के दृश्य मॉडलों, रेखाचित्रों, रूपरेखाओं तथा उनके वर्णन, आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। किंतु ज्ञान के मुख्य साधन, वे वैज्ञानिक संकल्पनाएं व निर्णय (judgments) है, जिनके ज़रिये विज्ञान के नियमों को अमूर्त रूप (abstract form) में निरूपित (formulate) किया जाता है। अलग-अलग घटनाओं को, ज्ञान के आरंभिक बिंदु के रूप में, तथा विज्ञान द्वारा खोजे व निरूपित किये हुए नियमों को संपूरित (supplement) करने की सामग्री के रूप में लिया जाता है।

कलात्मक ज्ञान ( संज्ञान ) में, उपरोक्त के विपरीत, दृश्य-संवेदात्मक बिंबों का केंद्रीय स्थान होता है और वे किसी भी पृथक घटना की गहनतम, सर्वाधिक स्थाई विशेषताओं को, संवेद प्रत्यक्षण (perception) के लिए सीधे सुलभ (direct accessible) रूप में परावर्तित करना संभव बना देते हैं। यहां संकल्पनाओं और निर्णयों को, कलात्मक बिंबों का वर्णन तथा विश्लेषण करने के साधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। फलतः, वैज्ञानिक तथा कलात्मक ज्ञान एक दूसरे के विरोधी नहीं है और वे एक-दूसरे को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते हैं। वे हमारे परिवेशीय जगत के, और मनुष्य की आंतरिक दुनिया, अनुभवों, मनोदशाओं (moods), रुख़ों (attitudes) तथा व्यक्तिगत विशेषताओं के बारे में ऐसे एक पूर्णतर चित्र तथा ज्ञान की ऐसी प्रणाली की रचना करते हुए एक दूसरे को संपूरित करते हैं, जिसमें एक युग व समाज के सर्वाधिक सारभूत लक्षण (essential traits) व्यक्त होते हैं। ऐसा है कला और विज्ञान का सामान्य अंतर्संबंध (general interconnection)।

एक विशेष युग की कलात्मक चेतना, मनुष्य की आंतरिक, मानसिक दुनिया को कलाकृतियों की ऐसी प्रणाली से प्रभावित करती है, जिसमें कि यह दुनिया मूर्त होती है। यह उसके ज़रिये यथार्थता (reality) की उन विशेषताओं को उद्घाटित करती है, जो सामाजिक चेतना के अन्य रूपों की पकड़ में नहीं आते। मनुष्य का आत्मिक शिक्षण उसी से होता है और उसी तरीक़े से प्रकृति व समाज के प्रति उसके निश्चित रुख़ बनते हैं। किसी भी युग तथा किन्ही भी जनगण की कला, कलात्मक चेतना में प्रभावी आदर्शों, मानकों तथा विचारों के अनुरूप जीवन व व्यक्तित्व की उन विशेषताओं तथा मनुष्य व प्रकृति की अंतर्क्रियाओं (interactions) को अद्वितीय कला बिंबों में प्रकट करती है, जो चेतना के अन्य रूपों तथा क्रियाकलाप की क़िस्मों के द्वारा परावर्तित व संचारित (communicated) नहीं होते। इसी कारण से लोक कला, अतीत के महान कलाकर्मियों की कृतियां तथा हमारे समसामयिकों का कृतित्व, संपूर्ण विश्व संस्कृति को हमारे लिए सुलभ बनाने में तथा इतिहास के दौरान मनुष्य जाति द्वारा संचित (accumulated) हर मूल्यवान चीज़ को आत्मसात (assimilate) करने में हमारी मदद करते हैं।

अन्य युगों तथा राष्ट्रों के साहित्य से स्वयं को परिचित कराने, संगीत सुनने और कलावीथियों (art galleries) में जाने से हमें केवल अपने जनगण द्वारा संचित अनुभव का ही बोध नहीं होता, बल्कि उनके जीवन तथा आंतरिक जगत का परिचय भी प्राप्त होता है और हम स्वयं आत्मिक दृष्टि से अधिक समृद्ध तथा उदात्त (noble) बन जाते हैं और अपने दृष्टिकोण तथा विश्व की अपनी समझ को विस्तृत बनाते हैं। कला हमें मनुष्य जाति के अनुभव से परिचित कराके सांस्कृतिक मूल्यों के ‘संचयन’ को बढ़ावा देती है, हमारी भावनाओं को उदात्त बनाती है और जनगण की गहनतर पारस्परिक समझ को प्रोत्साहित करती है। इस तरह, कला, कलात्मक चेतना, सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत जीवन पर विराट भावनात्मक प्रभाव डालती हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

कलात्मक चेतना और कला – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में धर्म पर चर्चा की थी, इस बार हम कलात्मक चेतना और कला को समझने की कोशिश शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कलात्मक चेतना और कला – १
( Artistic Consciousness and Art – 1 )

कला, मानव क्रियाकलाप का एक सबसे पुराना और सर्वाधिक सार्विक (universal) रूप है। `कला‘ (art) पद केवल क्रिया का ही नहीं, बल्कि उसके परिणाम का, अर्थात कलाकृति का द्योतक भी है। कला क्या है? समाज के, और अलग-अलग लोगों के जीवन में कला की भूमिका (role) क्या है?

लोग अपने दैनिक उत्पादक क्रियाकलाप (production activity) में अपनी भौतिक आवश्यकताओं (material wants) की पूर्ति के लिए ही वस्तुओं का ( भोजन मकान आदि ) ही निर्माण नहीं करते, बल्कि उन्हें जितना संभव हो, उतना ही निर्दोष (perfect) तथा सोद्देश्य (purposeful) भी बनाते हैं। वस्तुएं जितनी अच्छी और उपयुक्त हों, उन्हें बनाने के लिए उतनी ही अधिक कुशलता (skill) की ज़रूरत होती है, उत्पादन प्रक्रिया का स्वभाव जितना ज़्यादा रचनात्मक (creative) हो, उसके सर्जक (creator) से उतनी ही अधिक प्रतिभा (talent) तथा कल्पनाशीलता (inventiveness) की अपेक्षा की जाती है। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य की तर्कबुद्धि (reasoning) और संकल्प (will), उसकी विशिष्ट मानवीय शक्ति परिष्कृत हो गये। मनुष्य, प्रकृति से जितना पृथक हुआ और उसने अपने को उससे जितना ऊपर उठा लिया, उतना ही उसने अपने को और अपनी कुशलताओं, ज्ञान तथा व्यवहार के मानकों को परिष्कृत बनाया और फलत:, स्वयं को एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढाल लिया।

मनुष्य की यह सारी विशेषताएं और, सर्वोपरि, उसका सारा सामाजिक सार (social essence), उसके ज्ञान का बल, कल्पना और संस्कृति की शक्ति और साथ ही क्रियाकलाप का परिष्करण (perfection) और पारंगति (mastery) उन वस्तुओं में, संरचनाओं में, औज़ारों में और सुधरी हुई, रूपांतरित (transformed), मानवीकृत प्रकृति में मूर्त (embodied) हुए जिन्हें उसने बनाया। यह मूर्तता (embodiment) जितनी ज्यादा और पूर्ण होती है, उसके श्रम तथा उसकी रचनात्मक क्रिया की भौतिक वस्तुएं उतनी ही उत्कृष्ट और सुंदर होती हैं। इतिहासाश्रित श्रम विभाजन के ज़रिये उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन, सुंदर वस्तुओं के उत्पादन से पृथक हो गया। क्रियाकलाप के एक विशेष रूप में कला, ‘सुंदर का उत्पादन’ भौतिक उत्पादन से पृथक हो गयी। लोगों के एक ऐसे विशेष समूह का उद्भव हुआ, जिनके लिए कला व्यवसाय (profession) बन गई – कलाकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, लेखक, कवि, संगीतज्ञ, अभिनेता तथा अन्य।

वर्ग समाज (class society) में, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant classes) कला के विशेष उपभोक्ता होते हैं। वे कलाकारों, लेखकों और अभिनेताओं को वित्तीय सहायता देते हैं, उनका रचनात्मक श्रम ख़रीदते हैं और साथ ही उन्हें निश्चित वर्गों के उद्देश्यों की सेवा करने तथा एक विश्वदृष्टिकोण और वैचारिकी का सचेतन या अचेतन वाहक बनने को बाध्य करते हैं। परंतु यह सोचना गलत होगा की कला, यानी कलात्मक क्रियाकलाप भौतिक उत्पादन से पूर्ण तरह अलग हैं। यहां तक कि शोषक समाजों में भी कारीगरों, दस्तकारों और किसानों के कृतित्व में पूर्णता के लिए प्रयत्न निहित होते हैं तथा उसमें रचनात्मक मानवीय तत्व अभिव्यक्त होते हैं। जिस सीमा तक काम में स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता के तत्व होते हैं, उस सीमा तक उसमें कलात्मक गुण भी होते हैं। काम जितना स्वतंत्र और रचनात्मक होता है, वह कला के उतने ही निकट होता है।

श्रम के आधार पर विकसित होने वाले सारे मानवीय क्रियाकलाप की सब अभिव्यक्तियों में कलात्मक क्रियाकलाप के तत्व निहित होते हैं। मनुष्य का संपूर्ण सामाजिक सत्व (social being), जो इस क्रियाकलाप का एक उत्पाद है, कमोबेश रचनात्मक, कलात्मक तत्वों से व्याप्त (permeated) होता है और यह भी सामाजिक चेतना के, अर्थात कलात्मक चेतना के एक विशेष रूप में परिवर्तित होता है, जो कलात्मक बिंबों की एक प्रणाली मैं हमारे गिर्द की यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। ये बिंब, व्यष्टिक और सामान्य (individual and general) को, प्रकृति और समाज की लाक्षणिक विशेषताओं, अनुगुणों (properties) और अवगुणों (peculiarities) तथा मनुष्य के आंतरिक जगत को परावर्तित करते हैं। इसके उपरांत उन्हें तदनुरूप (corresponding) भौतिक वस्तुओं व प्रक्रियाओं, संगीत की रचनाओं, चित्रों, मूर्तियों, वास्तुकला संरचनाओं, रंगमंचीय प्रस्तुतियों तथा फ़िल्मों में मूर्त रूप दिया जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम