भाववादी-आध्यात्मिक घटाघोप

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


भाववादी-आध्यात्मिक घटाघोप

मेरा मतलब यही है। आखिर हम उस वजह को जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों हुआ? मध्यकालीन भारत के बाद अचानक भारत में 5-700 वर्षों तक किस वजह से यह सब होता है? मैं मानता हूँ कि गुलाम मानसिकता और देश नया चिन्तन कम करते हैं या नहीं करते या नयी खोज नहीं ही करते। पूरा इतिहास इसका साक्षी है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है।

उसी बात में इसके कारणों की तरफ़ भी इशारा था, पर आपने ध्यान नहीं दिया। ‘इस लौकिक ज्ञान की परंपराओं और धाराओं पर, काल्पनिक, अलौकिक तथा आध्यात्मिक चिंतन और ज्ञान हावी हो गया।’ आपको अभी इतिहास के वस्तुगत ( objective ) से गुजरना होगा, तभी आपको वस्तुस्थिति का पता चल पाएगा। हमने जिस प्रक्रिया का जिक्र किया है, वह अभी ५-७०० वर्ष पूर्व की नहीं है, जैसा कि आप इसे ‘गुलामी की मानसिकता’ वाली बात के साथ जोड़ कर देखना चाहते हैं।

जगत का वस्तुगत ज्ञान प्राप्त करने की ओर लक्षित यह भौतिकवादी धारा शुरुआत से ही साथ चली है। जब से समाज में वर्ग संरचना उभरना शुरु हुआ, यानि ऐसे वर्गों का उभार होना शुरु हुआ जो समाझ में प्रभुत्व प्राप्त करते जा रहे थे, और श्रम प्रक्रिया से विलग रहकर भी साधनों का उपभोग करने में सक्षम थे, और इसीलिए उनके पास अवसर था कि वह जगत की दार्शनिक संकल्पनाओं के लिए काल्पनिक चिंतन की उड़ान भर सकें, तभी से यथास्थिति बनाए रखने और उसे धार्मिक जामा पहनाने की कवायदें शुरू हुई और साथ ही लोक की इस भौतिकवादी समझ और व्याख्याओं पर अवरोध डालना शुरू कर दिया गया।

बाद का इतिहास इनके विरोधों से भरा हुआ है। चार्वाकों, लोकायतों, न्याया-वैशेषिकों, योग आदि की भौतिकवादी धाराओं का या तो समूल नाश कर दिया गया, या उन्हें भाववाद के मुलम्मे में प्रक्षिप्त। बुद्ध और बाद के काल में यह धारा और परंपरा थोड़ा सापेक्षतः अधिक विकसित हुई, परंतु बौद्धों के सांस्थानिक नाश के बाद से, गुप्त काल में, ब्राह्मण पुनरुत्थान में इन पर सर्वाधिक हमले हुए और इन धाराओं का यह हाल बना दिया कि इनका विकास अवरुद्ध हो गया या ये भाववादी मुलम्मे के साथ ही अपने-आपको छुटपुट रूप से बनाए रखने में बमुश्किल सफल रह पाई।

तभी तक जो काम बमुश्किल हो चुका था, वही हो पाया, उसके बाद तो जो कूपमंडूकता के हालात चले वे कमोबेश अभी तक जारी हैं। धार्मिकता और भाववादी काल्पनिक ज्ञान ने, जगत के वस्तुगत ज्ञान को परवान चढ़ने ही नहीं दिया, सर्वत्र आध्यात्मिकता हावी हो गई। हर जिज्ञासा का समाधान काल्पनिक चिंतन प्रस्तुत करने लगा, हर मुसीबत और जरूरत के लिए अलौकिक शक्तियों के आगे गुहार करने की प्रवृत्ति चला दी गई। आदमी के सारे प्रयास इसी पूजा-पाठ, ताबीज़-डोरों, ग्रह-शांतियों में ही खपने लगे। कुछ ठीक हो जाए तो प्रभु की कृपा, और ना हो तो प्रभु की लीला, पूर्वजन्मों के कर्मों का खेल। अब खाक कुछ हो पाने की संभावनाएं बची। आप जिस अकर्मण्यता का उत्स ‘गुलाम मानसिकता’ में देखना चाहते हैं, हम उन्हें इसी भाववादी-आध्यात्मिक घटाघोप में देखा करते हैं।

खैर, आपको अध्ययन करना चाहिए। अगर आप वाकई वस्तुगत रूप से चीज़ों को समझना चाहते हैं तो जिस तरह, हर तरह की धाराओं का विपुल लेखन सहज रूप में अधिक उपलबध है, वैसे ही इस भौतिकवादी धारा का भी विपुल लेखन उपलब्ध है, बस वह सामान्य रूप से पहुंच में नहीं रह पाता है, उसके कारण भी उपरोक्त परिस्थितियों में ही छुपे हैं कि समाज के प्रभुत्व प्राप्त वर्ग, समूह यथास्थिति को बनाए रखने के लक्षित इसी भाववादी विचारधारा को बनाए रखना चाहते हैं, और भौतिकवादी धारा को सामने आने नहीं देना चाहते।

लेकिन जब अमेरिका या जर्मनी का आदमी आइंस्टाइन पर या अन्य वैज्ञानिकों पर गर्व कर सकता है तो हम आर्यभट्ट और अन्य पर नहीं कर सकते? इस गर्व से निश्चय ही नुकसान नहीं है।

क्यों नहीं कर सकते। करना ही चाहिए, करते ही हैं। हमें आर्यभट्ट पर भी गर्व होना चाहिए, और अन्य महानुभावों पर भी जो कहीं के भी हों, पर जिनके प्रयासों ने पूरी मानवजाति को फायदा पहुंचाया है। इसे भी राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरे में बांधने की क्या जरूरत है। पर सिर्फ़ गर्व करने से ज़िंदगी नहीं चला करती, विकास नहीं हुआ करता। उनका उपयोग करना, उनके सिरे को पकड़कर आगे तक पहुंचाने काम, उनके आगे बढ़ने का काम होना चाहिए। वह नहीं हुआ, और हम क्या चाहते हैं आगे भी ना हो। हमारे अपने ही वैज्ञानिक मनीषियों, उनकी विचारधाराओं को हमने जानबूझकर ( हमारे समाज में प्रभुत्व प्राप्त विचारधारा ने ) भुला दिया, इनके ज्ञान की धाराओं को रोक दिया, सिर्फ़ उन्हें कुछ किताबों में जिक्र करके गर्व की चीज़ बनाए रखा, वह भी सिर्फ़ उनके नामों को, नाकि उनके काम और विचारों को सामने लाया गया ( जैसा कि एक उदाहरण, अभी भगतसिंह के साथ है, उनके नाम का ढिंढोरा तो बहुत पीटा जाता है, उनके विरोधी भी पीटते हैं, पर उनके विचारों, विचारधारा पर कोई बात नहीं होती, बल्कि उसे और दबाया, बरगलाया जाता है ) ।

हम इसी में लगे रहे, और बाकी दुनिया ने इसी ज्ञान और परंपरा को अपने में समेटते हुए, उससे लाभांवित होते हुए इसे आगे बढ़ाया और वैज्ञानिक प्रगतियां दर्ज़ की। हम ज़ीरो-ज़ीरो गाते रहे, और उन्होंने इस ज़ीरो का सदुपयोग करते हुए पूरी मानवजाति को कई अनोखी चीज़ों से भर दिया।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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इतिहास की धाराओं को परखना होगा

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


इतिहास की धाराओं को परखना होगा

अब बात धर्मपाल और उनके इतिहास की….राजीव दीक्षित ने इनका जिक्र अपने व्याख्यानों में किया है…25-30 साल तक इन्होंने इस काम पर मेहनत की है, दुनिया के कई देशों के पुस्तकालय आदि छाने…मैंन इन पर संदेह किया…जिस स्रोत को बताया गया है और किताब लिखी गई है, वहाँ मैंने सब देख लिया कि लेखक सही बता रहा है…

इतिहास पर लिखने वालों की गज़ब भरमार है। कई धाराएं यहां काम कर रही हैं। कुछ लोग गंभीर काम कर रहे हैं, वे निरपेक्षता, वस्तुगतता के साथ वैज्ञानिक पद्धतियों से अपने इतिहास की पुनर्रचना में लगे हुए हैं, कुछ लोग नस्लीय आर्य श्रेष्ठता के चश्में से भारत को समूची मानवजाति का मूल सिद्ध करने की रणनीति के तहत इतिहास की मनमानी व्याख्याएं करने में लगे हैं, कुछ श्रेष्ठताबोध तलाशते हुए अतीत से इस श्रेष्ठताबोध को तुष्ट करने लायक सामग्री निकाल रहे हैं, सीमित, अधूरी, एकतरफा विवेचना कर रहे हैं, कुछ पुराणों, महाकाव्यों और मिथकों को ही इतिहास समझने और समझाने में लगें हैं।

सभी काम कर रहे हैं, महनत कर रहे हैं, लाखों पृष्ठ काले कर रहे हैं। ऐसे में सभी स्वतंत्र है, जिसको जो अपनी मानसिकता, अपनी राजनीति, अपने हितों के अनूकूल लगता है उसे उठा रहा है और उसका उपयोग कर रहा है।

राजीव दीक्षित को अपने उद्देश्यों के लिए धर्मपाल उचित जान पड़ते हैं, तो वह उनका संदर्भ लेते हैं, उन्हें चुन लेते हैं। इस चुनाव को श्रेष्ठ और समुचित बताने का प्रक्रम तो करना ही होता है। वैसे मेहनत तो करनी ही होती है, कुछ भी रचना हो। कुछ लोग जानबूझकर बदमाशी करते हैं, कुछ अपनी मानसिकता और मान्यताओं के प्रति कोरी भावुकता में अपना जीवन भी होम कर ही देते हैं। बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के, बिना उस वैज्ञानिक-विषय के प्रति ईमानदारी के, बिना सार्विक वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाए, कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं रचा सकता, चीज़ों को सही और वस्तुगत रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।

तथ्यों का संदर्भ सही हो सकता है, परंतु बात उनकी व्याख्याओं की, इन व्याख्याओं में काम में लिये गए दृष्टिकोण और उनकी दबी-छिपी उद्देश्यपरकता की है, इनके पीछे की आत्मपरकताओं की है। कोई भी, पहले से ही कुछ मन में ठाने, पूर्वाग्रहों को चित्त में समाए, कोई हित या उद्देश्य सामने रख कर जब किसी अनुसंधान में उतरता है, तो उसके निष्कर्ष भी जाहिर है, इसी तरह के होंगे।

धर्मपाल जी की महनत अपनी जगह है, पर उनकी आंखों पर चढ़ा हुआ श्रेष्ठताबोध और राष्ट्रवादी आत्मपरकता का मुलम्मा अपनी जगह ही है। और इसीलिए वे कम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वे राजीव दीक्षित जी के लिए काम के हो सकते हैं, दक्षिणपंथियों, अंधराष्ट्रवादियों के काम के हो सकते हैं, विकीपीडिया पर डाले जा सकते हैं, परंतु इतिहास पर हो रहे गंभीर और वैज्ञानिक शोध और अध्ययन में इनका कोई स्थान हमें अभी तक तो नज़र नहीं आया है। इन्हें वहां संदर्भित होने का मौका भी नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि मंड़न और खंड़न की प्रक्रियाओं में वाद-विवादों, मत-मतांतरों में ये धाराएं एक दूसरे का संदर्भ नहीं देती हैं, हमारा कहने का मतलब यह है कि इनके काम की भागीदारी तो वहां इस वाद-विवाद के लिए भी नहीं दिखती है। वहां पर दूसरे कई इसी मानसिकता के लेखक हैं, जिनके काम को इस लायक तो समझा जाता है कि जिनका खंड़न के प्रयास किये जाते हैं।

यह हमने अपनी जानकारियां ऐसे ही पेश करदी हैं, आप ख़ुद अपने शोध जारी रखे हुए ही हैं। अपनी मान्यताएं बनाना, बिगाड़ना, गलत मानना, सही मानना, अपने दृष्टिकोण को तय करना आपका अधिकार है। आप ही अपने लिए, इसे भली-भांति कर सकते हैं।

एक किताब है ‘भारतीय चित्त, मानस और काल’ धर्मपाल की ही है…किताब में जिन विषयों के संस्कृत विद्यालयों में पढ़ाने की बात की है, उसमें आवश्यक और तकनीकी विषय हैं। जैसे….

ये विषय ठीक ही लग रहे हैं, तथ्यात्मकता के नज़रिए से। उस समय की भारतीय तकनीकी प्रगति के सापेक्ष ही हैं। पत्त्थर और लकड़िया काटने वाले, लौह और अन्य धातुकर्म करने वाले, धागा कातने और बुनने वाले, चूडियां मनके बनाने वाले, नमक बनाने वाले, बारूद पर काम करने वाले, साबुन बनाने वाले, नाव बनाने वाले, मछलियां पकड़ने वाले, धोबी, खाती, जूते बनाने वाले, दर्ज़ी आदि-आदि। ये तकनीकी काम हैं, और उस समय की तात्कालीन जीवनचर्या से जुडे हुए ही लगते हैं। इनमें पता नहीं आप क्या विशेष देख रहे हैं। इसमें गढ़ने लायक कुछ नहीं लग रहा, अब बात यह है कि इनको कोई भी कैसे व्याख्यायित करता है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय