इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं

( Subjective features of volition )

मनुष्य की सक्रियता के सचेतन संगठन तथा नियमन ( regulation ) के रूप में इच्छाशक्ति आंतरिक कठिनाइयों को लांघने की ओर लक्षित होती है और मुख्य रूप से आत्म-नियंत्रण ( self control ) के रूप में अपने को प्रकट करती है। सर्वविदित है कि आत्म-नियंत्रण की क्षमता सभी लोगों में एक जैसी नहीं होती। इच्छाशक्ति की बहुत ही विविध व्यक्तिपरक विशिष्टताएं मिलती हैं। फिर तीव्रता की दृष्टि से भी, प्रचंड और दुर्बल के बीच इसकी बहुविध अभिव्यक्तियां पाई जाती हैं। प्रचंड इच्छाशक्तिवाला मनुष्य अपने लक्ष्य के मार्ग में आनेवाली कैसी भी कठिनाइयों को लांघ सकता है और दृढ़निश्चय, साहस और सहनशक्ति जैसे संकल्पमूलक गुण प्रकट करता है। इसके विपरीत दुर्बल इच्छाशक्तिवाला आदमी कठिनाइयों से कतराता है, साहस, दृढ़ता तथा संयम का अभाव दिखाता है और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित उच्चतर अभिप्रेरकों की ख़ातिर क्षणिक इच्छाओं, आकांक्षाओं को दबाने में असमर्थ सिद्ध होता है।

दुर्बल इच्छाशक्ति की अभिव्यक्तियां भी उतनी ही विविध हैं, जितने विविध दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए लाक्षणिक गुण हैं। इच्छाशक्ति की दुर्बलता की चरम अभिव्यक्तियां, जैसे संकल्प-अक्षमता और गति-अक्षमता, सामान्य मानस की सीमा के बाहर है।

संकल्प-अक्षमता सक्रियता के उत्प्रेरण के अभाव और निर्णय लेने या कार्य करने की अयोग्यता को कहते हैं, जिनका कारण मस्तिष्क के विकार हैं। संकल्प-अक्षमता का रोगी चिकित्सक के निर्देशों के पालन की आवश्यकता स्पष्टतः अनुभव करने पर भी अपने को उनके पालन के लिए तैयार नहीं कर पाता। गति-अक्षमता प्रमस्तिष्क के प्रेरक क्षेत्र ( ललाट खंडों ) में विकृतियों के कारण सोद्देश्य क्रियाएं करने की अयोग्यता को कहते हैं। यह अपने को निर्धारित कार्यक्रम के बाहर स्थित गतियों तथा क्रियाओं के ऐच्छिक विनिमयन ( voluntary regulation ) के क्षीण बनने में प्रकट करता है। गति-अक्षमता संकल्पात्मक क्रियाओं के निष्पादन ( execution ) को असंभव बना देती है।

संकल्प-अक्षमता और गति-अक्षमता अपेक्षाकृत विरल विकृतियां हैं और मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचे होने का संकेत देती हैं। शिक्षकों का अपने कार्य के दौरान दुर्बल इच्छाशक्ति की जिस परिघटना से प्रायः साक्षात्कार होता है, सामान्यतः उसका कारण कोई विकृति नहीं, अपितु ग़लत शिक्षा और पालन होते हैं। यह कमी व्यक्तित्व-निर्माण की व्यूह रचना के दायरे में संगठित शिक्षा प्रयासों से दूर की जा सकती है। दुर्बल इच्छाशक्ति की सबसे ठेठ अभिव्यक्ति आलस्य ( laziness ), अर्थात कठिनाइयों से बचने और संकल्पात्मक प्रयासों से कतराने की प्रवृत्ति है। ध्यान देने योग्य बात है कि बहुत-से लोग सामान्यतः अपनी कमियां स्वीकार करने को सहमत न होने पर भी आलस्य को अपनी सभी दिक़्क़तों की जड़ मान लेने पर तुरंत राज़ी हो जाते हैं। “आपने ठीक कहा, मैं आलसी हूं” – मित्रों द्वारा आलोचना किए जाने पर कोई भी आदमी यह कह सकता है और मुस्कुराते हुए अपनी छोटी-मोटी ग़लतियां सहर्ष स्वीकार कर लेता है। इस सहजता से की हुई स्वीकारोक्ति के पीछे वास्तव में मनुष्य की अपने बारे में ऊंची राय छिपी होती है। वह जैसे यह कहती है कि इस आदमी में बहुत से गुण छिपे हैं, जो अगर यह आलसी न होता, तो वे अपने को अवश्य ही प्रकट कर देते।

किंतु स्वीकारोक्ति में छिपा यह भाव सर्वथा भ्रांतिजनक है। निष्कर्मण्यता मनुष्य की अशक्तता तथा ढीले-ढालेपन को, उसकी अपने को जीवन के अनुकूल ढाल पाने की असमर्थता तथा साझे ध्येय के प्रति उदासीनता को इंगित करती है। आलसी मनुष्य की विशेषता नियंत्रण का बाह्य स्थान-निर्धारण है और इसलिए वह ग़ैर-ज़िम्मेदार होता है। आलस्य और दुर्बलता की अन्य अभिव्यक्तियां – कायरता, अनिश्चय, संयम का अभाव, आदि – व्यक्तित्व के गंभीर दोष हैं, जिन्हें दूर करने के लिए बड़े शैक्षिक प्रयासों और मुख्य रूप से कड़ी आत्म-शिक्षा ( self-education ) की आवश्यकता होती है।

इच्छाशक्ति के सकारात्मक गुण, उसकी दृढ़ता की अभिव्यक्तियां सफल सक्रियता की महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) हैं और उनसे मनुष्य के व्यक्तित्व की अच्छी तस्वीर बनती है। इन गुणों में निर्भीकता, कर्मठता, दृढ़निश्चय, आत्मनिर्भरता, आत्म-नियंत्रण, आदि शामिल किए जाते हैं। दृढ़निश्चय ( determination ) एक संकल्पमूलक गुण है, जो दिखाता है कि दत्त मनुष्य स्वतंत्र महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकता है और उन्हें क्रियान्वित कर सकता है। दृढ़ चरित्रवाले मनुष्य में अभिप्रेरकों का द्वंद लंबी प्रक्रिया नहीं बनता और शीघ्र ही किसी निर्णय के लिए जाने और क्रियान्वित किए जाने के साथ समाप्त हो जाता है। यह निर्णय सदा सामयिक ( कभी-कभी तत्क्षण भी ) और खूब सोचा-विचारा होता है। जल्दबाज़ी में लिया हुआ निर्णय प्रायः मनुष्य की आंतरिक तनाव से मुक्ति पाने और अभिप्रेरकों के द्वंद को खत्म करने की इच्छा का सूचक होता है, ना कि चरित्र की दृढ़ता का। दूसरी ओर, निर्णय लेने तथा उसे अमली रूप देने को लगातार टालना निश्चय ही कमज़ोर इच्छाशक्ति का प्रमाण है।

इच्छा की स्वतंत्रता के लिए, एक ओर, दूसरों की सलाहों तथा रायों को सुनना और, दूसरी ओर, उनके बारे में संयत रवैया ( moderate attitude ) अपनाना आवश्यक है। दृढ़निश्चय और स्वावलंबन ( independence ) संकल्पात्मक कार्यों में नियंत्रण के आंतरिक स्थान-निर्धारण के परिचायक होते हैं। स्वतंत्र इच्छा, एक ओर, जिद्दीपन ( waywardness ) तथा नकारवाद ( denial ) की विरोधी है और, दूसरी ओर, सहजप्रभाव्यता ( impressionable ) तथा अनुकारिता ( imitability ) की प्रतिध्रुवस्थ। सहजप्रभाव्य मनुष्य की अपनी कोई राय नहीं होती और उसका व्यवहार परिस्थितियों तथा दूसरे लोगों के प्रभाव पर निर्भर होता है, जबकि जिद्दीपन मनुष्य को तर्कबुद्धि के विरुद्ध कार्य करने और अन्य लोगों की सलाह पर कोई ध्यान न देने को प्रेरित करता है। अंतर्वैयक्तिक संबंधों में आत्म-निर्भरता अथवा इच्छा-स्वातंत्र्य व्यक्तित्व की एक विशेषता के नाते अपने को सामूहिकतावादी आत्म-निर्णय में अधिकतम व्यक्त करते हैं।

इच्छाशक्ति को “दृढ़ता-दुर्बलता” के मापदंड से ही नहीं आंका जा सकता। इच्छा का नैतिक पहलू, उसकी समाजोन्मुखता तथा परिपक्वता भी, अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरे शब्दों में, संकल्पात्मक कार्यों का नैतिक मूल्यांकन मनुष्य के अभिप्रेरकों की सामाजिक महत्व पर निर्भर होता है


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति और जोखिम के अंतर्संबंधों पर चर्चा की थी, इस बार हम संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना
( structure of volitive actions )

मनुष्य की इच्छाशक्ति और सामान्यतः क्रियाशीलता का आधार उसकी आवश्यकताएं ( needs ) हैं, जो क्रियाओं और कार्यों के लिए तरह-तरह के अभिप्रेरकों ( motivators ) को जन्म देती हैं।

संकल्पात्मक क्रियाओं के अभिप्रेरक

मनोविज्ञान में अभिप्रेरकतीन अपेक्षाकृत स्वतंत्र प्रकार की मानसिक परिघटनाओं ( phenomena ) को कहाजाता है, जो आपस में घनिष्ठतः संबद्ध ( related, associated ) तो हैं,किंतु एक नहीं है। इनमें सर्वप्रथम वे अभिप्रेरक आते हैं, जो मनुष्य की आवश्यकताओं की तुष्टि की ओर लक्षित सक्रियता के लिए अभिप्रेरणाका काम करते हैं। इस दृष्टि से देखे जाने पर अभिप्रेरक मनुष्य कीसामान्यतः क्रियाशीलता का और मनुष्य को सक्रियता के लिए जागृत करने वाली आवश्यकताओं का स्रोत है।

दूसरे, अभिप्रेरक क्रियाशीलता की वस्तुओं को इंगित करते हैं और बताते हैं कि मनुष्य ने किसी ख़ास स्थिति में किसी ख़ास ढंग से ही व्यवहारक्यों किया है। इस अर्थ में अभिप्रेरकों को मनुष्य द्वारा चुने गए व्यवहारके एक निश्चित ढंग के पीछे छिपे कारणों का समानार्थक समझा जा सकता है औरअपनी समग्रता में वे मनुष्य के व्यक्तित्व की अभिमुखता ( personality orientation ) के परिचायक होते हैं।

तीसरे, अभिप्रेरक मनुष्य के स्वतःनियमन ( self-regulation ) के साधन,यानि अपने व्यवहार तथा सक्रियता को नियंत्रित ( control ) करने का उपकरणहैं। इन साधनों में संवेगों, इच्छाओं, अंतर्नोदों, आदि को शामिल किया जाताहै। संवेग मनुष्य द्वारा अपनी क्रिया के व्यक्तिगत महत्त्व का मूल्यांकनहैं और यदि क्रिया उसकी सक्रियता के अंतिम लक्ष्य से मेल नहीं खाती, तोसंवेग उस क्रिया की सामान्य दिशा को बदल देते हैं, मनुष्य के व्यवहार कोपुनर्गठित ( reconstituted ) करते हैं और मूल उत्प्रेरकों के प्रबलन (reinforcement ) के लिए नये उत्प्रेरक लाते हैं।

संकल्पात्मक क्रिया में उसकी अभिप्रेरणा के उपरोक्त तीनों प्रकारों अथवा पहलुओं – क्रियाशीलता का स्रोत, उसकी दिशा और स्वतःनियमन के साधन – का समावेश रहता है।

संकल्पात्मक क्रिया के घटक

आवश्यकताओं से पैदा होनेवाले अभिप्रेरक मनुष्य को कुछ क्रियाएं करने को प्रोत्साहित करते हैं और कुछ क्रियाएं करने से रोकते हैं। मनुष्य को अपने अभिप्रेरकों का कितना ज्ञान है, इसे देखते हुए अभिप्रेरकों को अंतर्नोदों और आकांक्षाओं में बांटा जाता है।

अंतर्नोद सक्रियता का ऐसा अभिप्रेरक है, जो अभी पूरी तरह न समझी गई, न पहचानी गई आवश्यकताका प्रतिनिधित्व करता है। किसी निश्चित व्यक्ति के प्रति अंतर्नोद कीअभिव्यक्ति यह है कि मनुष्य को उस व्यक्ति को देखते ही, उसकी आवाज़ सुनतेही हर्ष अनुभव होता है, और वह उससे, प्रायः अनजाने ही, मिलना, बातें करनाचाहता है। किंतु कभी-कभी मनुष्य अपने हर्ष के कारण से अनभिज्ञ भी हो सकता है। अंतर्नोद अस्पष्ट और अव्यक्त होते हैं।

आकांक्षाएं सक्रियता के वे अभिप्रेरक हैं, जिनकी विशेषता है उनके मूल में निहित आवश्यकताओं की मनुष्य को चेतना।प्रायः मनुष्य अपनी आवश्यकता की वस्तु को ही नहीं जानता, अपितु उसकीतुष्टि के संभावित उपाय भी जानता है। गरमी में चिलचिलाती धूप में प्यासलगने पर आदमी छाया और शीतल जल के बारे में सोचने लग जाता है।

सक्रियताके अभिप्रेरक मनुष्य के जीवन की परिस्थितियों और अपनी आवश्यकताओं की उसकीचेतना को प्रतिबिंबित करते हैं। मनुष्य को कभी कोई अभिप्रेरक अधिकमहत्त्वपूर्ण लगते हैं, तो कभी कोई। उदाहरण के लिए, अपने मित्र के साथसिनेमा जाने की अपेक्षाकृत गौण इच्छा कभी-कभी किशोर के लिए अपनी पढ़ाई करनेकी आवश्यकता से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत हो सकती है। विभिन्न उत्प्रेरकोंके बीच से किसी एक ( या कुछेक ) को चुनने की आवश्यकता से पैदा होनेवाले अभिप्रेरकों के द्वंदमें उच्चतर क़िस्म के अभिप्रेरक, यानि जिनके मूल में सामाजिक हित ( socialinterests ) हैं, वे अभिप्रेरक स्वार्थसिद्धि की ओर लक्षित निम्नतर क़िस्मके अभिप्रेरकों से टकरा सकते हैं। यह संघर्ष कभी-कभी मनुष्य के लिए बड़ीपीड़ा तथा चिंता का कारण बनता है, किंतु कभी-कभी वह विभिन्न विकल्पों केबारे में शांतिमय बहस चलाए जाने और हर विकल्प का सभी पहलुओं से मूल्यांकनकिए जाने का रूप भी ले सकता है। उदाहरण के लिए, किसी छात्र के लिए यह तयकरने में कठिनाई हो सकती है कि शाम को पुस्तकालय जाए या थियेटर, अथवा अपनेमित्र के किसी बेईमानीभरे काम की वज़ह से उससे मैत्री तोड़ने का निर्णय करतेसमय कर्तव्य की भावना और मित्र से लगाव की भावना के बीच टकराव की पीड़ासहनी पड़ सकती है। अभिप्रेरकों के इस संघर्ष में निर्णायक भूमिका कर्तव्य की भावना, विश्व-दृष्टिकोण तथा नैतिक मान्यताओं की होती हैं

अभिप्रेरकोंके संयत विश्लेषण ( analysis ) अथवा संघर्ष ( struggle ) के परिणामस्वरूपमनुष्य कोई निश्चित निर्णय करता है, यानी लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के साधननिर्धारित करता है। इस निर्णय पर या तो तुरंत अमल किया जा सकता है या अमलको टाला जा सकता है। टालने की स्थिति में निर्णय एक दीर्घकालिक इरादे( intention ) का रूप ले लेता है। इरादे का निर्णय लिए जाने और उसपर अमलके बीच की अवधि में मनुष्य के व्यवहार पर नियामक ( regulatory ) प्रभावपड़ता है ( उसके बारे में सोचता रहना, उससे संबंधित तैयारी करते रहना, उसेजांचते-परखते रहना, आदि )। कभी-कभी इरादा त्यागा जा सकता है, निर्णय बदलाजा सकता है या काम को अधूरा छोड़ा जा सकता है। किंतु यदि हर बार याज़्यादातर, निर्णय को क्रियान्वित नहीं किया जाता, तो यह दुर्बल इच्छाशक्ति का परिचायक होता है।

निर्णय पर अमल ( implementation of decision ) संकल्पात्मक क्रिया का अंतिम चरण है और मनुष्य की इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है। इच्छाशक्ति को कर्म से आंका जाना चाहिए, न कि उदात्त अभिप्रेरकों, दृढ़ निर्णयों और नेक इरादों से। कार्यों का विश्लेषण मनुष्य के अभिप्रेरकों को समझने की कुंजी है और अपनी बारी में अभिप्रेरकों का ज्ञान विभिन्न परिस्थितियों में मनुष्य के व्यवहार का पूर्वानुमान करना संभव बनाता है।

संकल्पात्मक प्रयास

संकल्पात्मक क्रिया के मुख्य घटकों – निर्णय लेना और उसपर अमल करना – को साकार बनाने के लिए प्रायः संकल्पात्मक प्रयास ( volitive efforts ) की आवश्यकता होती है, जो एक विशिष्ट संवेगात्मक अवस्था है। संकल्पात्मक प्रयास को यूं परिभाषित किया जा सकता है : यह संवेगात्मकखिंचाव का वह रूप है, जो मनुष्य की मानसिक शक्तियों ( स्मृति, चिंतन,कल्पना, आदि ) को जुटाता है, क्रिया के लिए अतिरिक्त अभिप्रेरक पैदा करताहै और काफ़ी अधिक तनाव की अवस्था के रूप में अनुभव किया जाता है

इच्छाशक्ति या संकल्प के प्रयास से मनुष्य कुछ अभिप्रेरकों को निष्प्रभावी और अन्य को अधिकतम प्रभावी बना सकता है। कर्तव्य-बोध वश किया जानेवाला प्रयास बाह्य बाधाओं ( किसी कठिन समस्या को हल करने में, थकान की अवस्था में, आदि ) और आंतरिक कठिनाइयों ( किसी दिलचस्प पुस्तक को पढ़ने से अपने को न रोक पाना, दिनचर्या का पालन करने की अनिच्छा, आदि ) को लांघनेके लिए मनुष्य की मानसिक शक्तियों को एकजुट करता है। संकल्पात्मक प्रयासके फलस्वरूप आलस्य, भय, थकान, आदि पर विजय पाने से मनुष्य को बड़ा नैतिकसंतोष मिलता है और इसे वह अपने ऊपर विजय के रूप में अनुभव करता है।

बाह्य बाधा को लांघने के लिए संकल्पात्मक प्रयास की आवश्यकता तब होती है, जब उसे ऐसी आंतरिक कठिनाई के तौर पर, ऐसी आंतरिक बाधा के तौर पर अनुभव किया जाता है, जिसे अवश्य लांघा जाना है।

इसकीएक सरल सी मिसाल देखें। यदि हम फ़र्श पर एक मीटर के फ़ासले पर रेखा खींचकरइस बाधा ( फ़ासले ) को लांघने का प्रयत्न करें, तो इसमें हमें कोई कठिनाईनहीं होगी और कोई विशेष प्रयास न करना पड़ेगा। किंतु यदि पर्वत पर चढ़ते हुएबर्फ़ में उतनी ही चौडी़ दरार सामने आ जाए, तो इसे एक गंभीर बाधा समझाजाएगा और इसे लांघने के लिए हमें काफ़ी इच्छाशक्ति जुटानी होगी। फिर भीपहाड़ों में इस डग के भरे जाने से दो अभिप्रेरकों – आत्मरक्षा की भावना औरकर्तव्य ( उदाहरणार्थ, ख़तरे में पड़े साथी की सहायता करने के कर्तव्य ) कीपूर्ति की भावना – के बीच संघर्ष चलता है। यदि जीत पहले अभिप्रेरक की हुई,तो पर्वतारोही डरकर पीछे खिसक जाएगा और यदि कर्तव्य-भावना अधिक बलवतीसिद्ध हुई, तो अपने भय पर काबू पाकर बाधा को लांघ जाएगा।

संकल्पात्मक प्रयास हर शौर्यपूर्ण कर्म का अभिन्न अंग होता है। संकल्प, इच्छाशक्ति से काम लेना दृढ़ चरित्र के निर्माण की एक आवश्यक पूर्वापेक्षा है। हर राष्ट्र का इतिहास शौर्यपूर्ण कारनामों से भरा हुआ है और उनमें से हर कारनामे को संकल्पात्मक क्रिया की मिसाल समझा जा सकता है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

इच्छाशक्ति और जोखिम

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को आगे बढ़ाते हुए नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य” पर चर्चा की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति और जोखिम के अंतर्संबंधों को समझेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति और जोखिम
( will and risk )

जोखिमभरी स्थिति ( risky situations ) में मनुष्य का व्यवहार उसकी इच्छाशक्ति ( will power, volition ) का एक सबसे अचूक सूचक ( indicator ) है।

जोखिम ( risk ) उस स्थिति में सक्रियता का एक आवश्यक पहलू है, जब कर्ता परिणाम ( result ) के बारे में अनिश्चित होता है और उसे लगता है कि असफलता ( failure ) की सूरत में उसे प्रतिकूल परिणाम ( adverse results ) भुगतने पड़ सकते हैं ( दंड, पीड़ा, चोट, प्रतिष्ठा-हानि, आदि )। जोखिमभरी स्थिति में अपेक्षित हानि ( expected loss ), असफलता की संभाव्यता पर और व्यक्ति के लिए जो ख़तरा उत्पन्न हो सकता है, उसपर निर्भर होती है। स्वाभाविकतः प्रश्न उठता है : यदि सफलता पाने के अवसर कम हैं और असफलता के लिए भारी दंड मिलेगा, तो मनुष्य को जोखिम उठाने को क्या विवश करता है? मनोविज्ञान जोखिमभरी स्थिति के एक अनिवार्य मानसिक घटक के नाते इच्छाशक्ति द्वारा शासित जोखिमी व्यवहार के दो परस्परसंबंध कारण या अभिप्रेरक ( motivator ) बताता है।

जोखिम के लिए पहला अभिप्रेरक और इसलिए जोखिम का पहला रूप भी सफलता की प्रत्याशा ( anticipation ) पर आधारित है, जिसका परिणाम असफलता की सूरत में होनेवाली संभावित हानि की मात्रा से अधिक होता है। ( स्थितिपरक जोखिम situational risk )। सफलता की आकांक्षा, विफलता से बचने की इच्छा से अधिक बलवती सिद्ध होती है। यदि हम ध्यान में रखें कि दैनंदिन जीवन में यह संबंध उलट सकता है ( विफलता से बचने की इच्छा सफलता की आकांक्षा से अधिक बलवती निकल सकती है ), तो हमें स्वीकार करना होगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में जोखिम एक प्रमुख स्थान रखता है। परंतु इस प्रकार का व्यवहार अनोखा नहीं है, यद्यपि इसके लिए संकल्पमूलक निर्णय लेना आवश्यक है।

मनोविज्ञानी उचित और अनुचित जोखिम के बीच अंतर करते हैं। जोखिमभरी स्थिति का परिणाम कितना भी अनिश्चित क्यों न हो, अनुचित जोखिम के विपरीत, उचित जोखिम में यह जरूरी होता है कि संकल्पमूलक निर्णय के सभी पहलुओं के बारे में, जोखिमभरे व्यवहार के पीछे जो अभिप्रेरक हैं, उनकी नैतिक तथा वैचारिक एकता के बारे में और अपेक्षाकृत निरापद पसंद के मुक़ाबले ख़तरनाक पसंद के लाभ के बारे में अच्छी तरह सोच-विचार कर लिया जाए। ऐसी भी स्थितियां हो सकती हैं जिनमें परिणाम संयोग ( “चित्त या पट”) पर या इसके विपरीत मनुष्य के वैयक्तिक गुणों ( योग्यताओं, अध्यवसाय diligence, कौशल skill, आदि ) पर निर्भर होता है। यह पाया गया है कि अन्य बातें समान होने पर लोग उन स्थितियों में कहीं अधिक जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं, जिनमें परिणाम संयोग के बजाए मनुष्य की अपनी योग्यताओं, कौशलों और आदतों पर निर्भर होता है

जोखिमी पसंद का दूसरा अभिप्रेरक और जोखिम का दूसरा रूप व्यक्ति की तथाकथित स्थिति-निरपेक्ष क्रियाशीलता से, उसकी दत्त स्थिति की अपेक्षाओं से ऊपर उठ पाने और अपने लिए आरंभिक कार्यभार ( assignments ) से ज़्यादा ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करने की योग्यता से पैदा होते हैं। प्रयोगों में जोखिममापी नामक एक विशेष उपकरण की मदद से प्रकट किए गए जोखिम के दूसरे रूपभेद को “स्थिति-निरपेक्ष“, “निःस्वार्थ” अथवा “जोखिम की ख़ातिर जोखिम” की संज्ञा दी गई है।

कुछ लोगों को एक निश्चित प्रायोगिक क्षेत्र में ख़ुद अपने द्वारा चुने गए निशानों पर मार करने का काम दिया गया। किंतु उन्हें चेतावनी दे दी गई कि क्षेत्र में एक ख़तरनाक जगह है और उसपर मार करने से दंड मिल सकता है। पाया गया कि कुछ लोगों ने अपने निशाने उस ख़तरनाक जगह के आसपास ही चुने और इस तरह जान-बूझकर दंड का जोखिम उठाया, जबकि दूसरों ने निषिद्ध जगह से दूर के निशाने चुनकर ऐसे जोखिम से बचने का प्रयत्न किया। प्रयोग की कई बार पुनरावृत्ति और उसके डिज़ायन में परिवर्तनों से प्रयोगकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे पहले समूह के लोगों में निःस्वार्थ जोखिम के लिए परिस्थितिवश विकसित हुआ स्वाभाविक झुकाव था।

बाद के अध्ययनों ने दिखाया कि जोखिम की ख़ातिर जोखिम उठानेवाले, ऊंचाई पर काम करनेवाले निर्माण-मज़दूरों, मोटर-साइकिल के खेल के शौक़ीनों, उच्च-वोल्टता बिजली लाइनें बनानेवालों और उन पर काम करने वालों, आदि के बीच ज़्यादा मिलते हैं।

प्रयोगों ने यह भी दिखाया कि स्थितिमूलक जोखिम उठानेवालों में जोखिम की ख़ातिर जोखिम के लिए ज़्यादा झुकाव होता है। इसके विपरीत जिन लोगों ने प्रयोगों के दौरान निःस्वार्थ जोखिम की क्षमता नहीं दिखायी, वे सामान्यतः उस स्थिति में भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे, जिसमें अपेक्षित लाभ और संभावित हानि बराबर-बराबर थे। निःस्वार्थ जोखिम के लिए रुझान, जिसे मनोवैज्ञानिक प्रयोग द्वारा, यानि अल्पकालिक जांच द्वारा प्रकट किया जा सकता है, दिखाता है कि वैसा मनुष्य वास्तविक ख़तरेवाली स्थिति में भी संकल्पात्मक क्रियाएं करने की क्षमता रखता है। इस तरह जोखिममापी की मदद से, एक दमकल दल का मुखिया अपने लोगों में काम का इष्टतम वितरण कर सकता है, जिसमें जोखिम उठाने का झुकाव नहीं है, उन्हें सहायक कामों में और जो जोखिम के लिए झुकाव रखते हैं, उन्हें सीधे आग से लड़ने के काम में लगाया जा सकता है।

दृढ़ इच्छाशक्ति और निःस्वार्थ जोखिम के लिए क्षमता एक ही चीज़ नहीं है। प्रयोग दिखाते हैं कि दमकल दल के जोखिम उठाने को तैयार लोगों को जब सहायक कामों पर लगाया जाता है, तो वे उनमें कोई ज़्यादा सफल नहीं रहते। रोजमर्रा का काम, जो कभी-कभी बड़ा कठिन तथा नीरस होता है, कठोर परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रयोग की अपेक्षा करता है। अध्यवसाय, धेर्य, निर्देशों का ईमानदारी से पालन, आदि संकल्पमूलक गुण ख़तरे का सामना करने के लिए आवश्यक गुणों से भिन्न होने पर भी समाज के लिए कम मूल्यवान नहीं है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

नियतत्ववाद और "इच्छा-स्वातंत्र्य"

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझा था, इस बार हम इसी को आगे बढ़ाते हुए नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य” पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य”
( determinism and freedom of will )

प्रत्ययवादीया भाववादी ( idealistic ) दर्शन तथा मनोविज्ञान में इच्छा को एक अलौकिक, समाज-निरपेक्ष,यानि अनियत शक्ति बताया जाता है, जो मानो मनुष्य की कोई कार्य आरंभ वसंपन्न करने की क्षमता का स्रोत है। इस संकल्पना में सारी मानसिक सक्रियताको इच्छाशक्ति का कार्य और स्वयं इच्छाशक्ति को क्रियाशीलता का अचेतन परमस्रोत समझा जाता है। इसी तरह कुछ मशहूर भाववादी मनोविज्ञानियों ने भी किसी भीक्रिया में सर्वोच्च भूमिका पूर्णतः स्वतंत्र इच्छागत निर्णय की मानी थी।यह तो कुछ ऐसा कहने के समान है कि मनुष्य अपने से कहता है, ‘ऐसा हो !’, औरजो उसने चाहा था, हो जाता है। दूसरे शब्दों में , जैसे कि इस रहस्यमय परमतत्व के अलावा और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।

वास्तव में मनुष्य के कार्य तथा व्यवहार यथार्थ की उपज( yield of reality ) होते हैं। अभिप्रेरकों को और संकल्पात्मक क्रियाओं को भी, वे बाह्य प्रभावजन्म देते हैं, जिन्होंने पहले की सक्रियताओं और परिवेश से अन्योन्यक्रिया( mutual action ) के दौरान मनुष्य के मस्तिष्क पर अपनी छाप छोड़ी थी। किंतु संकल्पात्मकक्रियाओं के नियतत्व ( कारणसापेक्षता ) का यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य काएक निश्चित तरीक़े से ही काम करना पूर्वनियत है, कि उसे चुनने की कोईस्वतंत्रता नहीं है और वह अपने कार्यों के अवश्यंभावी स्वरूप का हवालादेकर स्वयं उत्तरदायित्व ( responsibility ) से बच सकता है।

मनुष्य कोई भी संकल्पात्मकक्रिया एक व्यक्ति के तौर पर करता है और इसलिए चह उसके परिणामों के लिएउत्तरदायी भी होता है। मनुष्य का संकल्पमूलक व्यवहार, उसकी क्रियाशीलता कीसामाजिक संबंधों की एक निश्चित संबंधों की एक निश्चित पद्धति पर निर्भर एकउच्चतर अवस्था है, जिसकी विशेषता मनुष्य की ज्ञान के आधार पर निर्णय लेनेकी योग्यता है। मनुष्य की क्रियाशीलता और विशेषतः उसकी इच्छाशक्ति कर्मका रूप ले लेती है, जो सक्रियता का एक सामाजिकतः सार्थक परिणाम है, ऐसापरिणाम कि जिसके लिए मनुष्य तब भी उत्तरदायी होता है, जब वह उसके आरंभिकइरादों की सीमा से बाहर निकल जाता है।

दूसरे व्यक्ति को उसकीसमस्याओं के हल में मदद देकर मनुष्य प्रशंसनीय काम करता है। वह दूसरेमनुष्य के जीवन में अपनी भूमिका से अनभिज्ञ ( unaware ) हो सकता है, फिर भी उसे उदात्तकार्य के हितकर परिणामों के लिए श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इसी तरह यदिकोई आदमी किसी अन्य को बिला वज़ह हानि पहुंचाता है, उसकी आवश्यकताओं कीतुष्टि में बाधा डालता है, तो वह बुरा काम करता है और इसके लिए वह उस सूरतमें उत्तरदायी होता है, अगर वह इसके परिणामों का पूर्वानुमान कर सकता थाया अगर ऐसा पूर्वानुमान कर लेना उसका कर्तव्य था। जब मनुष्य किसी कर्मद्वारा अन्य लोगों के जीवन, व्यवहार तथा चेतना में परिवर्तन लाता है, तोऐसा वह नेक अथवा बुरी इच्छा के वाहक के तौर पर करता है और इसलिए प्रशंसाअथवा निंदा का पात्र बनता है।

लोग अपने कामों  के लिए किसेउत्तरदायी ( responsible ) ठहराते हैं ( मनोविज्ञान में इसे ‘नियंत्रण का स्थान-निर्धारण’,‘कन्ट्रोल लोकेलाइज़ेशन’ कहा जाता है ), इसके अनुसार उन्हें दो कोटियों मेंबांटा जा सकता है। अपने व्यवहार को बाह्य कारणों ( भाग्य, परिस्थितियों,संयोग, आदि ) का परिणाम माननेवालों को ‘बाह्य स्थान-निर्धारण’ शीर्ष केअंतर्गत रखा जाता है। जो प्राप्त परिणामों को अपने प्रयासों या योग्यता काफल समझते हैं, वे ‘नियंत्रण का आंतरिक स्थान-निर्धारण’ शीर्ष के अंतर्गतआते हैं।

पहली कोटि में आनेवाले बच्चे अपने कम अंक पाने के लिएअपनी लापरवाही के सिवाय और किसी भी चीज़ को जिम्मेदार ठहरा देते हैं ( सवालठीक नहीं लिखा गया था, किसी ने ग़लत हल बताया, मेहमानों ने पढ़ने नहीं दिया,पुस्तक में इस बारे में नहीं था, वग़ैरह )। अनुसंधानों ने दिखाया है कि ऐसीबाह्य स्थान-निर्धारण की प्रवृत्ति का कारण चरित्र के उत्तरदायित्वहीनता ( irresponsibility ),अपनी योग्यताओं में विश्वास का अभाव, दुश्चिंता, इरादों का क्रियान्वयनस्थगित करने की आदत, आदि लक्षण होते हैं।

इसके विपरीत जो मनुष्यसामान्यतः अपने कार्यों के लिए अपने को उत्तरदायी ठहराता है और उनकी सफलताया असफलता का स्रोत अपने चरित्र, अपनी योग्यताओं अथवा उनके अभाव में देखताहै, उसके बारे में उचित ही कहा जा सकता है कि उसमें नियंत्रण के आंतरिकस्थान-निर्धारण की क्षमता है। नियंत्रण का आंतरिक स्थान-निर्धारण करनेवालाछात्र यदि कम अंक पाता है, तो बहुत करके वह इसका कारण अपनी ओर से विषय मेंरुचि का अभाव, भुलक्कड़पन, ध्यान कहीं और होना बताएगा। यह स्थापित किया जाचुका है कि इस तरह के मनुष्यों में गहन उत्तरदायित्व-बोध, बड़ी लगन,आत्म-परीक्षा की प्रवृत्ति, मिलनसारी और स्वतंत्रता होती है।

संकल्पात्मककार्यों के नियंत्रण का आंतरिक या बाह्य स्थान-निर्धारण, जिसके सकारात्मकऔर नकारात्मक, दोनों ही तरह के सामाजिक परिणाम निकलते हैं, शिक्षा तथापालन की प्रक्रिया में विकास करनेवाली स्थिर चरित्रगत विशेषता है


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

इच्छाशक्ति ( volition, will power )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति ( volition, will power )
व्यक्ति की क्रियाशीलता का एक रूप

इच्छाशक्ति,मनुष्य द्वारा अपनी सक्रियता और व्यवहार का सचेतन संगठन व स्वतःनियमन है,ताकि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में सामने आनेवाली कठिनाइयों को लांघाजा सकेइच्छाशक्तिमनुष्य की क्रियाशीलता का एक विशिष्ट रूप और स्वेच्छा से निर्धारितलक्ष्यों द्वारा निदेशित उसके व्यवहार के संगठन का एक प्रकार है।इच्छाशक्ति की उत्पत्ति श्रम के दौरान होती है, जब मनुष्य प्रकृति केनियमों का ज्ञान प्राप्त करता है और इस तरह उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसारबदलता है।

इच्छाशक्ति दो परस्परसंबद्ध कार्य करती है : अभिप्रेरणात्मक ( motivational ) और प्रावरोधात्मक ( prohibitory )।

अभिप्रेरणात्मक कार्य का मूल मनुष्य की क्रियाशीलता में है। प्रतिक्रियाशीलता ( reactivity ) केविपरीत, जब मनुष्य की क्रिया पूर्ववर्ती स्थिति पर निर्भर होती है ( बुलाएजाने पर मुड़कर देखना, अपनी ओर फेंकी गई गेंद को वापस फेंकना, बेहूदी बातपर नाराज़ होना, वगै़रह ), क्रियाशीलताक्रिया को जन्म मनुष्य की आंतरिक अवस्थाओं के विशिष्ट स्वरूप के कारण देतीहै, जो अपने को क्रिया के निष्पादन ( execution ) के क्षण में प्रकट करती है ( उदाहरण केलिए, आवश्यक सूचना पाने के लिए मनुष्य अपने साथी को बुलाता है, या अच्छीमनःस्थिति में न होने के कारण बेहूदगी से बात करता है, वगै़रह )।

क्षेत्र व्यवहारके विपरीत, जिसकी विशेषता अनैच्छिकता है, क्रियाशीलता में संकल्प का तत्वहोता है, यानि वह किसी सचेतन लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट ( directed ) होती है। क्रियाशीलताका वर्तमान स्थिति द्वारा, इसकी मांगों को पूरा करने और निर्धारित सीमाओंके भीतर काम करने की इच्छा द्वारा उत्प्रेरित होना आवश्यक नहीं है। इसकास्वरूप स्थिति-निरपेक्ष होताहै, यानि वह आरंभिक लक्ष्यों की सीमाओं को लांघती है और उसमें मनुष्य कीदत्त स्थिति की अपेक्षाओं के सार से ऊपर उठने तथा आरंभिक लक्ष्यों से ऊंचेलक्ष्य रखने की योग्यता ( उदाहरणार्थ, ‘जोखिम के लिए जोखिम उठाना’,सृजनात्मक उत्साह, आदि ) महत्त्व रखती है।

मनुष्य की सामाजिकक्रियाशीलता की एक अभिव्यक्ति उसका सामान्य कर्तव्य-बोध से ऊपर उठकर ऐसेकार्यकलाप में प्रवृत्त होना है, जो उसके अपने लिए आवश्यक नहीं है ( यदिउसे वह नहीं करता है, तो कोई इसके लिए उसपर उंगली नहीं उठाएगा ), मगर जोसामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप है।

संकल्पात्मक प्रक्रियाओं ( volitive processes ) की एक औरविशेषता है, जो इच्छाशक्ति के अभिप्रेरणात्मक कार्य के रूप में सामने आतीहै। यदि मनुष्य के लिए कोई ऐसा कार्य करना तत्काल ज़रूरी नहीं है, जिसकीवस्तुपरक आवश्यकता ( objective need ) को वह समझता है, तो इच्छाशक्ति कुछ अतिरिक्त अभिप्रेरण ( motive )पैदा कर देती है, जो उस कार्य के अर्थ को बदल देते हैं और मनुष्य को उसकेपरिणामों का पूर्वानुमान लगाने को प्रेरित करके उसे और अधिक महत्त्वपूर्णबना डालते हैं। उदाहरण के लिए, एक स्कूल की बालीबाल की टीम का कप्तान यदिथका हुआ है, तो अपनी बची-खुची ताक़त जुटाकर अभ्यास के लिए शहर के दूसरे छोरपर स्थित जिम में जाने में वह कठिनाई महसूस कर सकता है। फिर भी जब वहसोचता है कि उसकी टीम की की सफलता और उसके स्कूल की प्रतिष्ठा उसकी कप्तानके रूप में तैयारी पर निर्भर है, तो वह अपनी सारी इच्छाशक्ति जुटा लेता हैऔर कठिन कार्य के लिए एक अतिरिक्त अभिप्रेरक पैदा कर डालता है।

इच्छाशक्ति का प्रावरोधात्मक कार्यअभिप्रेरणात्मक कार्य से एकता बनाए रखते हुए अपने को क्रियाशीलता कीअवांछित अभिव्यक्तियों को रोकने में प्रकट करता है। मनुष्य सामान्यतः अपनेअभिप्रेरकों और कार्यों पर अंकुश लगा लेता है, जो उसके विश्व-दृष्टिकोण,विचारों और विश्वासों से मेल नहीं खाते। अवरोध के बिना व्यवहार का नियमनअसंभव होता। ‘प्रावरोधात्मक आदतों’ का विकास परिपक्व और सुरुचीपूर्णव्यक्तित्व के निर्माण के लिए एक आवश्यक शर्त है। शिक्षकों को बच्चों मेंअपनी अति-चंचलता, बातूनीपन और शोर-शराबे को नियंत्रित करने की क्षमताविकसित करनी चाहिए। यह नियंत्रण बच्चे के शरीर के लिए उपयोगी है, सुरुचिका सूचक है और सामूहिक जीवन की अपेक्षाओं के अनुकूल है।

मनुष्य कीकार्य करने की प्रेरणा बुनियादी आवश्यकताओं ( भोजन, वस्त्र तथा आवास ) सेलेकर नैतिक, सौंदर्यात्मक तथा बौद्धिक आवश्यकताओं तक विभिन्न अभिप्रेरकों के सोपानतंत्रका प्रतिनिधित्व करती है। इच्छाशक्ति का प्रयोग करके मनुष्य अपने निम्नतरअभिप्रेरकों पर, जिनमें कुछ जीवनावश्यक अभिप्रेरक भी हैं, अंकुश लगाता हैऔर उच्चतर अभिप्रेरकों को बढ़ावा देता है। अभिप्रेरणात्मक और प्रावरोधात्मक कार्यों की एकता की बदौलत इच्छाशक्ति मनुष्य को लक्ष्य-प्राप्ति में आड़े आनेवाली कठिनाइयों पर विजय पाने में समर्थ बनाती है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में प्रेम की भावना पर विचार किया था, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं
( voluntary and volitive actions )

मनुष्य की सक्रियता किन्हीं निश्चित लक्ष्य की पूर्ति की ओर लक्षित,परस्परसंबद्ध क्रमानुवर्ती क्रियाओं की पद्धति है। क्रियाओं का उद्देश्यएक निश्चित परिणाम प्राप्त करना है, जो संबंधित सक्रियता का अभीष्ट लक्ष्यहोता है या ऐसा प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, जब हम कोई वृक्ष लगातेहैं, अर्थात उसके लिए एक निश्चित गहराई का गड्ढ़ा खोदते है, उसमें खादडालते हैं, बीच में डंडा गाड़ते हैं, फिर गड्ढ़े में पौधा रोपकर उसकी जड़ोंपर अच्छी तरह मिट्टी जमाकर उसे डंडे के सहारे खड़ा करते हैं वग़ैरह, तो हमअपने लक्ष्य को पाने के लिए एक निश्चित योजना के अनुसार काम करते हैं। कामके दौरान यह योजना विचारों तथा परिकल्पनों ( बिंबों ) के एक क्रम के रूप में सामने आती है और अलग-अलग बल, वेग, विस्तार, समन्वय और सुतथ्यतावाली गतियों के माध्यम से साकार, क्रियान्वित होती है।

निश्चितगतियां, जो मिलकर क्रिया या कार्य कहलाती हैं, और सामान्य योजना से संबद्धचिंतन की संक्रियाएं संपन्न करते हुए मनुष्य, अपना ध्यान श्रम की वस्तुतथा प्रक्रिया में प्रयुक्त उपकरणों पर संकेन्द्रित करता है। इसके साथ हीविभिन्न क्रियाएं करते हुए वह निश्चित भावनाएंभी अनुभव करता है, जैसे बाधाएं एवं कठिनाइयां सामने आने पर चिढ़ना,आवश्यकताओं की तुष्टि पर खुश होना, श्रम के लिए उत्साह, थकान, श्रम मेंआनंद पाना, इत्यादि।

सीधे क्षोभकों द्वारा निर्धारित अनैच्छिक क्रिया ( involuntary action, reflex ) के विपरीत संकल्पात्मक क्रिया ( volitive action ) समुचित साधनों ( संकेतों, मानक मूल्यों, आदि ) की मददसे, यानि किसी माध्यम के ज़रिए संपन्न की जाती हैं। इस तरह शल्यचिकित्सकपहले अपने मन में भावी आपरेशन का बिंब बनाता है और इसके बाद ही वास्तविकआपरेशन करने लगता है।

संकल्पात्मक क्रिया स्वतःनियमन( self regulation ) की मदद से की जाती है। इसकी संरचना में निम्न चीज़ेंशामिल रहती हैं : कर्ता का लक्ष्य, इस लक्ष्य को पाने के लिए की जानेवालीक्रियाओं व संक्रियाओं का कार्यक्रम, क्रियाओं की सफलता के मापदंड कानिर्धारण और उनकी वास्तविक परिणामों से तुलना, और अंत में, इस बारे मेंनिर्णय कि क्रिया को पूर्ण माना जाए या समुचित सुधार के बाद आगे जारी रखाजाए। अतः किसी भी ऐच्छिक क्रिया के स्वतःनियमन के लिए उसकी आयोजना (planning ) व निष्पादन ( execution ) पर संकल्पात्मक नियंत्रणआवश्यक होता है। व्यक्तिवृत में नियमन व नियंत्रण का कार्य आरंभ मेंवयस्कों द्वारा बच्चे के साथ संयुक्त सक्रियता एवं संप्रेषण के दौरानसंपन्न किया जाता है। बाद में सक्रियता के प्रचलित मानकों तथा संरूपों केआभ्यंतरीकरण के फलस्वरूप बच्चा अपनी क्रियाओं का स्वयं नियंत्रण करनासीखता है।

ऐच्छिक क्रियामें मनुष्य पहले यह मालूम करता है कि उसकी क्रिया के भावी परिणाम का बिंबउसकी सक्रियता के प्रयोजन ( purpose ) से, यानि जो लक्ष्य उसने स्वयं तयकिया है, उससे संगत ( compatible ) है या नहीं। इसके बाद उसकी क्रिया वैयक्तिक महत्त्व ( personal importance ) ग्रहण कर लेती है और उसकी सक्रियता के लक्ष्यके रूप में सामने आती है। सक्रियता की संरचना में ऐच्छिक क्रियाएं उसकाउच्चतर स्तर होती हैं और उनकी विशेषता होती है सचेतन लक्ष्य और उनकीप्राप्ति के लिए साधनों का सचेतन चयन। छात्र द्वारा निबंध की रूपरेखा केबारे में सोचना, सामग्री की मन में पुनरावृति, आदि ऐच्छिक क्रियाएं बिनाकिसी बाह्य चिह्नों के संपन्न की जा सकती हैं।

संकल्पात्मक क्रियाएं एक विशेष प्रकार की ऐच्छिक सक्रियता है। ऐच्छिक क्रिया के सभी लक्षणों से युक्त संकल्पात्मक क्रिया की एक मुख्य शर्त कठिनाइयों को लांघनाहै। दूसरे शब्दों में, ऐच्छिक क्रिया को हम संकल्पात्मक क्रिया तभी कहसकते हैं, जब इसकी निष्पत्ति  ( achievement ) के लिए विशेष प्रयास कियाजाता है।

संकल्पात्मक क्रियाएं कम या अधिक जटिल ( complex ) होसकती हैं। उदाहरण के लिए, नदी या तरणताल में ऊंचाई से कूदने का प्रयत्नकरनेवाले को पहले अपने तत्संबंधी भय पर विजय पानी पड़ती है। इन्हें सरल संकल्पात्मक क्रियाएं कहा जाता हैं। जटिलसंकल्पात्मक क्रियाओं में कई सारी सरल क्रियाएं शामिल होती हैं। उदाहरण केलिए, कोई कठिन धंधा सीखने का निर्णय करनेवाले नौजवान को अपना लक्ष्य पानेके लिए कई सारी अंदरूनी और बाहरी बाधाएं व कठिनाइयां लांघनी होती हैं।अपनी बारी में जटिल क्रियाएं मनुष्य की सचेतन रूप से निर्धारित निकटवर्तीतथा सुदूर लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर लक्षित संकल्पात्मक सक्रियता मेंसम्मिलित होती हैं।

ऐसी सक्रियता मनुष्य की संकल्पात्मक विशेषताओं को, उसकी इच्छाशक्ति ( volition, will power ) को प्रकट करती है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय