तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन – २
( rational cognition or abstract thinking – 1 )

KatherineSherwoodUnfathomableLogicचिंतन-प्रक्रिया में संकल्पनाएं ( concepts ) आम तौर पर निर्णयों के अवयव ( elements of judgments ) होती हैं। निर्णय एक प्रकार का विचार ( thought ) है, जो इस बात को उचित या ग़लत ठहराता है कि कुछ लक्षण ( features ) एक निश्चित वस्तु या वस्तु-समूह के हैं, या जो वस्तुओं के बीच एक संबंध ( relation ) के होने या न होने का दावा करते हैं। मसलन, ऐसे विचार कि, ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, ‘एशियाई, अफ़्रीकी और लैटिन अमरीकी देशों के पिछड़ेपन के लिए उपनिवेशवाद ( colonialism ) दोषी है’ और ‘समाजवाद ( socialism ) सामाजिक न्याय का समाज है’ निर्णय हैं। इनमें से पहला विचार मनुष्य और समाज के बीच संबंध, दूसरा उपनिवेशवाद तथा अनेक अल्पविकसित देशों के बीच तथा तीसरा समाजवाद और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को निश्चित करता है।

एक निर्णय, प्रत्यक्ष प्रेक्षण ( observation ) से भी निरूपित किया जा सकता है और अन्य निर्णयों के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से भी। चिंतन के जिस रूप के द्वारा एक या कई अन्य निर्णयों से एक नया निर्णय निगमित ( deduced ) किया जाता है, उसे अनुमान ( inference ) या अनुमिति ( conclusion ) कहते हैं। जिन निर्णयों से अनुमान का निष्कर्षण ( drawn ) होता है, उन्हें आधारिका ( premises ) और नये निर्णय को निष्कर्ष ( conclusion ) या परिणाम ( consequence ) कहते हैं। अनुमान का एक उदाहरण ऐसे लिया जा सकता है : “पितृसत्तात्मक (  patriarchal ) समाजों में स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की होती है। भारत के अधिकतर हिस्सों में पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना अभी भी कायम है। फलतः, भारत के अधिकतर हिस्सों में अभी भी स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की है।” यहां पहले दो निर्णय इस प्रकार संबंधित हैं कि उनसे ऐसे नये निर्णय का अनुमान करना संभव हो जाता है, जिसमें एक नया प्रत्यय ( idea ) निहित हो।

जिन घटनाओं को प्रत्यक्षतः नहीं देखा जा सकता है, परंतु जो ज्ञात नियमों से संचालित ( governed ) हैं, उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुमानों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। अनुमान, विभिन्न प्रस्थापनाओं ( propositions ) की सत्यता अथवा तर्कदोष ( fallacy ) को प्रमाणित करने, स्थापित तथ्यों और नियमों को स्पष्ट करने और अन्वेषित नियमानुवर्तिताओं ( discovered uniformities ) के बल पर वैज्ञानिक भविष्यवाणियां करने में सहायक होते हैं।

संज्ञान की संवेदनात्मक ( sensory ) और बौद्धिक ( rational ) अवस्थाएं घनिष्ठता से अंतर्संबंधित ( interconnected ) हैं। वैज्ञानिक संज्ञान, वस्तु या घटना के अलग-अलग पक्षों तथा संबंधों के प्रत्यक्ष अवबोधन ( perception ) से शुरू होता है। फिर प्रयोग किये जाते हैं, जिनमें सामान्य (general ) को प्रकाश में लाने के लिए, इन पक्षों और संबंधों की तुलना तथा मिलान करने के लिए सामग्री प्राप्त होती है। इसके उपरांत अपकर्षण ( abstraction ) होता है, यानी वस्तुओं और घटनाओं के कुछ अनुगुणों ( properties ) और संबंधों से ध्यान हटाना तथा सामान्यीकरण, यानी महत्त्वपूर्ण निर्णायक अनुगुणों और संबंधों को प्रकट करना। इससे आगे वैज्ञानिक संज्ञान, वस्तुओं और प्रक्रियाओं के आंतरिक संबंधों, उनकी अंतर्क्रियाओं ( interactions ) तथा कायांतरणों ( transmutations ) और उनके विकास की निर्णायक नियमानुवर्तिताओं को उद्‍घाटित करता है।

images (3)हमारे ज्ञान के गहराने के साथ ही इन संयोजनों, संबंधों और स्वयं वस्तु का परावर्तन ( reflection ) भी संवेदनात्मक बिंब ( sensory image ) को गंवाने लगता है, लेकिन संज्ञान की प्रक्रिया जारी रहती है, क्योंकि वैज्ञानिक अपकर्षण उसको भी समझना संभव बना देता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रेक्षण नहीं हो सकता है। यहां यह मुद्दा ध्यान में रखना चाहिये कि संवेदनात्मक संज्ञान की ही भांति चिंतन भी व्यवहार ( practice ) पर, व्यावहारिक मानवीय आवश्यकताओं पर आश्रित तथा उनसे संबंधित होता है और व्यवहार से हासिल जानकारी पर भरोसा करता है

मानव संज्ञान के विकास का नियम, आभास ( appearance ) ) से सार ( essence ) की ओर, बाह्य ( external ) से आंतरिक ( internal ) की ओर होनेवाली हरकत ( movement ) है। विज्ञान का सारा इतिहास इसका गवाह है। मसलन, पहले के कई अर्थशास्त्रियों ने पण्यों ( commodities ) के बाहरी अनुगुण देखे थे, यानी उनकी उपयोगिता ( उपयोग मूल्य ) तथा विनिमय क्षमता ( विनिमय मूल्य )। लेकिन पण्यों के अनुगुणों की इन बाह्य अभिव्यक्तियों में गहरे आंतरिक संबंध छुपे हुए हैं। वह मार्क्स थे, जिन्होंने इनका पता लगाया और सारे पण्यों के सर्वनिष्ठ ( common ) गुण को, यानी उनके उत्पादन के लिए आवश्यक सामाजिक श्रम ( social labour ) को उद्‍घाटित किया। पण्य का मूल्य, श्रम की सामाजिक प्रकृति को, लोगों के बीच सामाजिक संबंधों को व्यक्त करता है।

वैज्ञानिक सैद्धांतिक चिंतन की भारी अहमियत इस बात में है कि यह विश्व के संज्ञान में एक ऐसा सशक्त औज़ार है, जो मनुष्य को सत्य ( truth ) की समझ में समर्थ ( enable ) बनाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन पर चर्चा की थी, इस बार हम तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन – १
( rational cognition or abstract thinking – 1 )

18azlo1delz86jpgवस्तुओं के सार्विक ( universal ), आवश्यक और सारभूत अनुगुण तथा संबंध, उनके नियमाधीन संपर्क ( law-governed connections ), संवेदनात्मक ज्ञान के लिए अलभ्य ( inaccessible ) होते हैं। इन्हें जानने-समझने का काम चिंतन ( thinking ) की सहायता से संज्ञान की बौद्धिक या तार्किक अवस्था में संपन्न होता है। मानव चिंतन उसे भी समझ लेने में सक्षम है, जो किसी क्षण-विशेष पर देखा नहीं जा सकता या जिसका प्रत्यक्ष प्रेक्षण ( direct observation ) हो ही नहीं सकता। मसलन हमारे संवेदी अंग ( sensory organs ) पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की दशाओं की या प्रकाश की गति की रफ़्तार की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं कर सकते, लेकिन ऐसी प्रक्रियाओं और घटनाओं का मानसिक बोध ( mental comprehension ) संभव हैं।

चिंतन, आंतरिक तथा सार्विक संबंधों को प्रकट करने, प्रकृति, समाज में और स्वयं संज्ञान में हो रहे परिवर्तनों व विकास के नियमों का पता लगाने, हमारे परिवेशीय जगत के गहनतम रहस्यों का अनावरण ( unravel ) करने में सहायता करता है। चिंतन, सामाजिक व्यवहार के ऐतिहासिक विकास का एक उत्पाद ( product ) है। यह वास्तविकता ( reality ) का सामान्यीकृत और अप्रत्यक्ष परावर्तन ( reflection ) है। चिंतन, वास्तविक जगत के साथ, संवेदनात्मक संज्ञान ( sensory cognition ) के द्वारा जुड़ा होता है और इसका सार ( essence ) संवेदी अंगों द्वारा प्राप्त सूचनाओं को संसाधित ( processing ) करने में निहित है।

वास्तविकता के सामान्यीकृत संज्ञान के रूप में चिंतन, वस्तुओं, घटनाओं और प्रक्रियाओं के सामान्य, सारभूत अनुगुणों ( general, essential properties ) को प्रकट करने की ओर निर्देशित होता है। भाषा के बग़ैर सामान्यीकरण असंभव होता : चिंतन और भाषा एक दूसरे के साथ घनिष्ठता से जुड़े हैं। वस्तुओं और घटनाओं में से सामान्य को प्रकाश में लाते हुए हम उसे भाषा में, शब्दों के रूप में व्यक्त करते हैं। भाषा की सामान्यीकरण करनेवाली भूमिका की ही वजह से एक मनुष्य अपने विचारों को प्रकट कर सकता है और अपनी बारी में अन्य लोगों के विचारों के बारे में पता लगा सकता है ; वह ज्ञान का समाहार ( summarise ) कर सकता है और उसे दूसरों को अंतरित ( pass on ) कर सकता है। ( चिंतन पर और विस्तार से `यहां‘ पढ़ा जा सकता है )

संवेदनात्मक संज्ञान की तरह चिंतन भी निश्चित रूप ( forms ) धारण करता है। ये रूप हैं : संकल्पनाएं ( concepts ), निर्णय ( judgments ) और अनुमान ( inference )। संकल्पना, चिंतन का एक ऐसा रूप है, जो वस्तुओं और घटनाओं के सामान्य और सारभूत लक्षणों ( features ) को परावर्तित करता है। इन सामान्य लक्षणों का साकल्य ( totality ), संकल्पना की अंतर्वस्तु ( content ) होता है। भाषा में संकल्पनाएं शब्दों या शब्द-समूहों में व्यक्त की जाती हैं, जैसे ‘भूतद्रव्य’ ( matter ), ‘अंगी’ ( organism ), ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ ( socio-economic formation ), आदि। प्रत्येक विज्ञान की संकल्पनाओं की अपनी ही प्रणाली ( system ) होती है। ये संकल्पनाएं उसके द्वारा खोजे नियमों को व्यक्त करती हैं और उसके प्रांरभिक उसूलों ( principles ) को निरूपित करती है। मसलन, दर्शन की बुनियादी संकल्पनाओं में शामिल हैं भूतद्रव्य, चेतना, गति, कारणता ( causality ), आदि, और राजनीतिक अर्थशास्त्र में मूल्य ( value ), पण्य ( commodity ), आदि की बुनियादी ( basic ) संकल्पनाएं शामिल हैं।

वैज्ञानिक संकल्पनाएं वास्तविकता का सामान्यीकृत परावर्तन हैं। उनमें एक संपूर्ण ऐतिहासिक अवधि के दौरान विज्ञान तथा व्यवहार ( practice ) द्वारा प्राप्त ज्ञान व अनुभव संचित ( accumulated ) होता है। इसलिए प्रत्येक संकल्पना ज्ञान के विकास में एक प्रकार की संक्षिप्त विवरणिका ( summary ), वस्तुगत जगत के संज्ञान की एक अवस्था ( stage ), किसी भी वैज्ञानिक सिद्धांत की श्रृंखला ( chain ) में एक मुख्य कड़ी ( nodal link ) होती है। संकल्पनाओं की सहायता से कोई एक विज्ञान, जारी परिवर्तनों के कारणों का, उनकी प्रकृति और विशेषताओं का और उनके पीछे निहित नियमों का स्पष्टीकरण दे सकता है। इसलिए संकल्पनाओं का विराट संज्ञानात्मक मूल्य है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम