अनिवार्यता और संयोग – ४

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अनिवार्यता और संयोग’ के प्रवर्गों पर चर्चा को आगे विस्तार दिया था, इस बार हम इन प्रवर्गों पर द्वंद्वात्मक दृष्टिकोण को कुछ और समझते हुए इस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अनिवार्यता और संयोग – ४
( necessity and chance ) – 4

Content_as_form_purification-1204055904प्रकृति और समाज में अनेकानेक अनिवार्यताएं एक दूसरे को प्रतिच्छेदित ( intersects ) तथा परस्पर अंतर्क्रियाएं ( mutual interaction ) करती रहती हैं। ऐसे प्रतिच्छेदनों व अंतर्क्रियाओं के फलस्वरूप ही संयोग का जन्म होता है। संयोग भी उतना ही वस्तुगत ( objective ) है, जितनी की अनिवार्यता और उसी की तरह यह भी मनुष्य की चेतना के बाहर विद्यमान हैं। उनके बीच एक गहन और आंतरिक संयोजन ( connection ) है ; भूतद्रव्य ( matter ) के विकास और गति के दौरान वे एक दूसरे में रूपांतरित ( transform ) हो सकते हैं, वस्तुतः स्थान परिवर्तन कर सकते हैं। जो चीज़ एक मामले में तथा एक प्रणाली ( system ) में संयोग है वह दूसरे संबंध तथा दूसरी प्रणाली में अनिवार्यता बन सकती है और इसी भांति, अनिवार्यता संयोग बन सकती है। इस तरह, अनिवार्यता हमेशा संयोग से होकर अपने लिए रास्ता बनाती है और उसी के ज़रिये अपने को उद्घाटित करती है, जबकि प्रत्येक सांयोगिक वृत्त में अनिवार्यता का एक निश्चित अंश होता है।

द्वंद्वात्मक विधि ( dialectical method ) आधुनिक विज्ञान के अनुरूप इन दोनों के बीच संयोजनों की जांच करने की ज़रूरत पर बल देती है। प्रकृति और समाज का सही ढंग से संज्ञान ( cognition ) प्राप्त करना केवल ऐसे ही उपागम ( approach ) से संभव है। इसलिए यह सोचना ग़लत है कि विज्ञान ‘संयोग’ का शत्रु है। जो वैज्ञानिक प्रत्येक सांयोगिक घटना का ध्यान से अध्ययन करता है, केवल वही सांयोगिक घटनाओं के पीछे निहित गहन, स्थायी, अनिवार्य संयोजन की खोज कर सकता है।

संयोग सापेक्ष ( relative ) होता है। ऐसी कोई घटनाएं नहीं हैं, जो हर मामले में और हर तरह से संयोगात्मक हों और अनिवार्यता से जुड़ी हुई न हों। कोई एक सांयोगिक घटना किसी निश्चित नियमबद्ध संयोजन के संबंध में ही संयोगात्मक होती है, जबकि किसी अन्य संयोजन के मामले में वही घटना अनिवार्य भी हो सकती है। मसलन, वैज्ञानिक विकास के संपूर्ण क्रम की दृष्टि से यह महज़ एक संयोग है कि किसी वैज्ञानिक ने कोई खोज की, लेकिन ख़ुद वह खोज उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) द्वारा हासिल विशेष विकास-स्तर का, स्वयं विज्ञान की प्रगति का आवश्यक परिणाम है।

संयोग अक्सर दो या अधिक अनिवार्य संपर्कों के प्रतिच्छेद-बिंदु पर होता है। मिसाल के लिए, तूफ़ान में गिरे एक पेड़ को ले लीजिये। उस पेड़ के जीवन में वह तेज़ हवा एक संयोग थी, क्योंकि वह उस पेड़ के जीवन व वृद्धि के सार से अनिवार्यतः उत्पन्न नहीं हुई। लेकिन मौसमी कारकों के संबंध में वह तूफ़ान एक अनिवार्य घटना था, क्योंकि उसकी उत्पत्ति उन कारकों की संक्रिया ( operation ) के कुछ निश्चित नियमों का फल थी। संयोग उस बिंदु पर हुआ, जहां दो अनिवार्य प्रक्रियाएं – एक पेड़ का जीवन और तूफ़ान का उठना – एक दूसरी को काटती हैं। इस उदाहरण में केवल हवा ही पेड़ के लिए संयोग नहीं, बल्कि वह पेड़ भी हवा के लिए वैसा ही संयोग था, जो उसके रास्ते में आ पड़ा।

अतः संयोग प्रदत्त घटना या प्रक्रिया के संबंध में कोई बाहरी चीज़ है और फलतः उस घटना या प्रक्रिया के लिए संयोग का होना संभव तो है, परंतु अवश्यंभावी नहीं और वह हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता।

Jose-Clemente-Orozco-Painting-Zapatistas-अनिवार्यता एक स्थायी और पुनरावर्तक चीज़ के रूप में अनेकानेक संयोगों के बीच प्रकट होती है और उन्हीं से होकर अपनी राह बनाती है। मिसाल के लिए, सामाजिक विकास विविधतापूर्ण प्रयासों, लक्ष्यों तथा स्वभावोंवाले अनेकों व्यक्तियों के क्रियाकलाप का कुल जोड़ होता है। ये सारे प्रयास अंतर्गुथित होते हैं तथा टकराते है और अंततः विकास की एक निश्चित दिशा में परिणत होते हैं, जो पूर्णतः अनिवार्य प्रकृति की होती है। संयोग हमेशा अनिवार्यता के साथ होते हैं और उनको परिपूर्ण बनाते हैं और इस तरह इतिहास में एक निश्चित भूमिका अदा करते हैं। यही कारण है कि सामाजिक विकास के एक ही नियम विभिन्न देशों व विभिन्न अवधियों में विशेष रूप ग्रहण कर लेते हैं, अपने खास ढंग से संक्रिया करते हैं।

उस तथ्य से कि अनिवार्यता संयोग के ज़रिये साकार हो सकती है, यह निष्कर्ष निकलता है कि संयोग अनिवार्यता को परिपूर्ण ही नहीं बनाता, बल्कि यह उसकी अभिव्यक्ति का एक रूप भी है और यह अनिवार्यता तथा संयोग की द्वंद्वात्मकता को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। यथा, सामाजिक क्रांतिया तथा नियमानुसार होनेवाली अन्य सामाजिक घटनाएं अनेक सांयोगिक परिस्थितियों से जुड़ी हैं, जैसे विभिन्न घटनाओं का स्थान व समय, उनके सहभागी आदि। यह परिस्थितियां ऐतिहासिक विकास के संबंध में सांयोगिक हैं, लेकिन इन्हीं सांयोगिक परिस्थितियों के ज़रिये अनिवार्य प्रक्रियाएं होती हैं।

सामाजिक विकास को संतुलित क्रिया बना कर, ऐसी अनुकूल दशाएं बनाई जा सकती हैं, जो अवांछित ( unwanted ) संयोगों के प्रभाव को सीमित करना संभव बना सकती हैं। जैसे, वैज्ञानिक कृषि कर्म का उपयोग शुरू करने, भू-सुधार तथा अन्य उपायों से विभिन्न प्रदेशों तथा सारे देश में कृषि उत्पादन पर मौसमी गड़बड़ियों के दुष्प्रभाव काफ़ी हद तक सीमित किये जा सकते हैं। इसी तरह सचेत व सोद्देश्य मानवीय क्रियाकलाप सांयोगिक घटनाओं की भूमिका को तेज़ी से घटा सकते हैं। इसलिए हमें सीखना चाहिये कि हम संयोगों की अवहेलना न करें, बल्कि उनका अध्ययन करें ताकि, एक ओर तो, प्रतिकूल ( adverse ) संयोगों का पूर्वानुमान लगाया जा सके, उन्हें रोका या सीमित किया जा सके और, दूसरी ओर, अनुकूल संयोगों का उपयोग किया जा सके।

विश्व में अग्रगामी प्रक्रियाओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, उनकी नियमानुवर्तिताओं को समझना और वस्तुगत नियमों के ज्ञान के बल पर प्राकृतिक व सामाजिक प्रक्रियाओं का नियंत्रण करना महत्त्वपूर्ण है। अनिवार्यता निश्चित वस्तुगत दशाओं में प्रकट होती है। परंतु ये दशाएं बदलती रहती हैं और उन्हीं के तदनुरूप अनिवार्यता भी बदलती व विकसित होती है। अनिवार्यता बने-बनाये रूप में कभी उत्पन्न नहीं होती, बल्कि पहले एक ऐसी संभावना ( possibility ) के रूप में अस्तित्वमान होती है, जो केवल अनुकूल दशाओं में ही वास्तविकता ( actuality ) में परिणत होती है।

अगली बार हम द्वंद्ववाद के इन्हीं दो प्रवर्गों, संभावना और वास्तविकता पर चर्चा शुरू करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

अनिवार्यता और संयोग – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अनिवार्यता और संयोग’ के प्रवर्गों पर चर्चा को आगे विस्तार दिया था, इस बार हम उसी चर्चा को नियमानुवर्तिताओं के संदर्भ में और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अनिवार्यता और संयोग – ३
( necessity and chance ) – 3

18Authier2010Fulcrum-565x468अब तक की चर्चा के आधार पर, हम तो यह मान सकते हैं कि घटनाएं केवल सांयोगिक होती हैं और यह कि सब कुछ अनिवार्य, अवश्यंभावी है और यह ही कि कुछ घटनाएं सांयोगिक होती है तथा कुछ अनिवार्य। इन मान्यताओं के समर्थकों का दृढ़ विश्वास है कि हर घटना या तो शत प्रतिशत अनिवार्यता है या शत प्रतिशत संयोग और एक ही घटना में दोनों विलोम ( opposites ) नहीं पाये जा सकते। किंतु वास्तविकता तो यह है कि हर घटना इन विलोमों का संपात या एकत्व होती है। ऐसा क्यों?

प्रेक्षण से हमें पता चलता है कि हर नियम-नियंत्रित क्षेत्र की अलग-अलग घटनाएं एक दूसरे से काफ़ी भिन्न होती हैं। तो यहां पुनरावृत्ति ( recurrence ) कहां हैं? और यदि पुनरावृत्ति नहीं है, तो नियम ( law ) कहां हैं? नियमों का इसके अलावा और कोई महत्त्व नहीं होता कि वे प्रवृत्ति ( trend, tendency ) या औसत को दिखायें। आर्थिक नियमों की ही तरह ही प्रकृति में भी यही बात देखने में आती है। जीवों और वनस्पतियों की लाखों जातियों में यह प्रवृत्ति बार-बार दोहराई जाती है कि जो जातियां अपने को परिवेश के अनुकूल नहीं बना पातीं, वे मर जाती हैं, और जो बना लेती हैं, वे जीवित रहती हैं।

द्वंद्ववाद के नियमों ( laws of dialectics ) के प्रसंग में हम यह बता चुके हैं कि प्रकृति और समाज में पूर्ण, शत प्रतिशत पुनरावृत्ति कभी नहीं होती। कुछ संबंधों की पुनरावृत्ति बेशक और अवश्य होती है, हालांकि वह पूर्ण नहीं, बल्कि स्थूल पुनरावृत्ति ही है। अनिवार्यता इसी में प्रकट होती है। नियम का सार यही है कि किसी अलग घटना के लिए बहुसंख्य संभावनाओं की गुंजाइश छोड़ने के साथ-साथ वह उनकी हद, संभव और असंभव के बीच की सीमा निर्धारित करता है।

उदाहरण के लिए, एक अणु दूसरे अणु से टकराकर उसे जो ऊर्जा अंतरित करता है, उसका मान कुछ भी हो सकता है। किंतु नियम इस ‘कुछ भी’ की सीमा निर्धारित करता है और इस सीमा के बाद असंभाव्यता ( impossibility ) का क्षेत्र आ जाता है। यह असंभव है कोई अणु दूसरे अणु को अपने में निहित ऊर्जा से अधिक ऊर्जा अंतरित करे। अलग-अलग घटनाओं का नियम से विचलन ( deviation ) उस नियम द्वारा निर्धारित सीमाओं में ही होता है। नियम का उल्लंघन ( violation ), नियम के विपरीत घटना असंभव है।

नियम जिन बहुसंख्य घटनाओं का निष्कर्ष ( conclusion ) होता है, उनमें से हर एक घटना इस या उस दिशा में, कम या अधिक मात्रा में नियम से विचलन ही है और उस अर्थ में वह संयोग है, जिसका निस्संदेह सदा कोई न कोई कारण होता है। यह नियम का उल्लंघन नहीं, अपितु उसकी पूर्ति है : संयोग अनिवार्यता की अभिव्यक्ति का एक रूप है। नियम संयोगों के रूप में ही साकार बनता है, वह संयोगों के ‘बिखराव’ की सीमाओं को निर्धारित करता है। किसी नियम को उद्घाटित कर पाना इसीलिए कठिन होता है कि वह अपने विलोम, अर्थात नियम से विचलनों – में ही प्रकट होता है : सार्विक ( universal ), अनिवार्य और आवृत्तिशील संबंध केवल एकाकी, काफ़ी हद तक दोहराई न जानेवाली, सांयोगिक घटनाओं में प्रकट होता है। ऐसे कोई तथ्य नहीं हैं, जो या तो मात्र सांयोगिक हों, या मात्र अनिवार्य। हर तथ्य इन दो विलोमों की एकता ( unity of opposites ) दिखाता है।

कभी-कभी कुछ विद्वानों को कहते पाया जाता है कि बहुसंख्यीय पिण्डों ( जैसे घोल में विद्यमान अणुओं और अन्तरिक्षीय किरणों में विद्यमान सूक्ष्मकणों ) के मामले में तो अनिवार्यता वस्तुतः संयोग के रूप में प्रकट होती है और नियम हर पृथक अणु या सूक्ष्मकण का भाग्य अलग रूप से पूर्वनिर्धारित किये बिना, स्थूल या औसत रूप में क्रियान्वित होता है। मगर जहां तक क्लासिक यांत्रिकी ( classic mechanics ) के नियमों से नियंत्रित एकाकी पिंडों का सवाल है, तो उनमें शुद्ध अनिवार्यता ही देखने में आती है, जो संयोग के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती। इन विद्वानों के अनुसार, यहां नियम पूर्ण यथातथ्यता और अपरिहार्यता के साथ हर अलग पिण्ड के भाग्य को पूर्वनिर्धारित करते हैं। प्रमाण के तौर पर वे कहते हैं कि पृथ्वी, मंगल और अन्य ग्रह अरबों वर्षों से बिल्कुल एक ही सी गतियों को दोहरा रहे हैं, जिन्हें क्लासिकी यांत्रिकी ने ठीक-ठीक निरुपित कर दिया था।

bubblePaint.0012-300x225किंतु ऐसे प्रमाण में विश्वास तब तक ही किया जा सकता था, जब तक माप ( measurement ) अपेक्षाकृत अल्प सटीक यंत्रों की मदद से किये जाते थे। अधिक परिशुद्ध यंत्र इस्तेमाल करके वैज्ञानिकों के पता लगाया है कि अपनी कक्षा पर पृथ्वी का हर चक्कर पूर्ववर्ती चक्कर से भिन्न होता है और इसी तरह उसकी सूर्य के गिर्द परिक्रमाएं भी एक सी नहीं होती।

यह पाया गया है कि हर अलग पिण्ड ( body ) की गति का प्रक्षेप पथ ( trajectory ) लाखों अतिसूक्ष्म हिस्सों से बना हुआ है जिनमें से हर एक, नियम द्वारा निर्धारित पथ से विचलन दिखाता है। ये अतिसूक्ष्म हिस्से नियम के अनुरूप तभी होते हैं, जब उन्हें समष्टि के रूप में लिया जाता है। यह बात सभी एकाकी पिण्डों पर लागू होती है। उनमें से हर एक उसमें अधिक गहरे स्तर में निहित बहुसंख्य तत्वों का योग है। दूसरे शब्दों में, एकाकी पिण्ड वास्तव में अपने अधिक गहरे स्तर पर बहुसंख्यीय पिण्ड ही है और जिस नियम से वह नियंत्रित होता है, वह उस पिण्ड के बहुसंख्य तत्वों के उससे विचलनों का योग है।

इसलिए ही कहा गया था कि सामाजिक विज्ञान का संबंध ( सामान्यतः सारे विज्ञान का भी ) बहुसंख्यीय परिघटनाओं से है, न कि एकाकी घटनाओं से। इस तरह यदि एकाकी और बहुसंख्यीय परिघटनाओं ( phenomenon ) का अंतर सापेक्ष है, तो परिशुद्ध नियमों और केवल औसत, प्रवृत्ति के रूप में ही काम करने वाले नियमों का अंतर भी सापेक्ष ( relative ) है। नियम, हर तरह का नियम संकीर्ण, अपूर्ण और स्थूल होता है

इस प्रश्न को द्वंद्वात्मक ढंग से समझना न केवल विज्ञान, अपितु तकनीक के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस बात को इलेक्ट्रॉनिकी के क्षेत्र में काम करनेवाले विशेष तीक्ष्णता के साथ महसूस करते हैं, क्योंकि वहां अनिवार्यता और संयोग की द्वंद्वात्मक समझ के बिना काम नहीं चल सकता। इलेक्ट्रॉनिकी से इतर क्षेत्रों में भी पुराना यंत्रवादी दृष्टिकोण नयी मशीनें डिज़ायन करने में तभी तक सहायक हो सकता है, जब तक कि वे अपेक्षाकृत कम जटिल हैं और उनसे अधिक ऊंची परिशुद्धता ( accuracy ) की अपेक्षा नहीं की जाती। किंतु इस पुराने दृष्टिकोण के आधार पर कोई ऐसा यंत्र बनाया भी जाता है, जिसमें किसी न किसी बात में एक दूसरे से असंबद्ध बहुत से पुर्जे हैं और जिससे सर्वाधिक परिशुद्ध लेथमशीनों से भी हज़ारों गुना अधिक परिशुद्धता की अपेक्षा की जाती है, तो उसमें किसी छोटे से पुर्जे के ख़राब होने की देर है कि सारा यंत्र ख़तरे में पड़ जायेगा।

यंत्र ( machine ) से जितनी ही अधिक परिशुद्धता और जटिलता की अपेक्षा की जायेगी, वह उतना ही कम विश्वसनीय होगा। उदाहरण के लिए, १९६२ में संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा शुक्र ग्रह की ओर छोड़े गये एक रॉकेट को बीच ही में इसलिए नष्ट कर देना पड़ा कि कंप्यूटर के लिए बनाये गये प्रोग्राम में एक हाइफन – डैश – चिह्न छूट गया था। उल्लेखनीय है कि इस रॉकेट के बनाने पर  १.८ करोड़ डालर ख़र्च हुए थे। इसलिए पिछले कुछ समय से ऐसे यंत्र बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है, जिनके पुर्जों में नियम से थोड़ा-बहुत विचलन के लिए गुंजाइश हो और यदि कोई एक या कुछ पुर्जे ख़राब भी हो जायें, तो भी शेष पुर्ज़े और इस तरह सारा यंत्र ठीक ढंग से काम करते रहें। अत्यधिक जटिल और अति परिशुद्ध यंत्रों की विश्वसनीयता में महत्त्वपूर्ण वृद्धि तभी की जा सकती है, जब अनिवार्यता और संयोग के सहसंबंध को द्वंद्वात्मक ढंग से समझा जाये।

ऐसी समझ की आवश्यकता के बारे में २० वीं सदी में क्वाण्टम यांत्रिकी, आनुवंशिकी और साइबरनेटिकी ने इतने अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत कर दिये हैं जो कि अनिवार्यता और संयोग के प्रश्न पर द्वंद्वात्मक दृष्टिकोण की महत्ता को स्थापित करते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

अनिवार्यता और संयोग – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अनिवार्यता और संयोग’ के प्रवर्गों पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि इन प्रवर्गों पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोण क्या कहते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अनिवार्यता और संयोग – २
( necessity and chance ) – 2

2010-08-20-LISAADAMSAMorassofContradictionsहमारे परिवेशी विश्व में अनिवार्यता और संयोग के बीच आपस में क्या संबंध है?

एक उत्तर इस प्रकार है : ऐसा कुछ नहीं है, जिसे अवश्यमेव घटना है, और ऐसा भी कुछ नहीं है, जो घट न सके। सब कुछ, सभी घटनाएं, चाहे वे हमें कितनी भी असंभाव्य क्यों न लगें, घट सकती है और ऐसे भी घट सकती हैं और वैसे भी। इस दृष्टि से यथार्थ वास्तविकता में कुछ भी असंभव नहीं है : अनिवार्य ( necessary ) नाम की कोई चीज़ नहीं है और विश्व में जो कुछ भी घटता है, वह नितांत संयोग ( chance ) है।

इस दृष्टिकोण के सार को एक उपन्यास, जिसका नायक कान से पैदा हुआ था, के इन शब्दों में लेखक ने सटीक ढंग से व्यक्त किया है : “मुझे लगता है कि आपको इतने अजीब जन्म पर विश्वास नहीं हो रहा है….आप कहेंगे कि इसमें तनिक भी सच नहीं है….किंतु अगर भगवान ने ऐसा ही चाहा था, तो क्या आप कहेंगे कि वह ऐसा नहीं कर सकता था?….इसीलिए मैं आपसे कह रहा हूं कि भगवान के लिए कुछ भी असंभव नहीं है और अगर वह चाहता है, तो सभी औरतें कानों से ही बच्चे पैदा करतीं।”

जो व्यक्ति अनिवार्यता को नहीं मानता और सोचता है कि दुनिया में सब कुछ संभव है ( इस दृष्टिकोण को अनियतत्ववाद indeterminism कहते हैं ), उसे यह भी मानना होगा कि वह जिस पत्थर पर बैठा था, वह हालांकि अभी तो ख़ामोश है, मगर सर्वथा यह संभव है कि कभी शास्त्रीय गीत गाने लगे, या यह कि यद्यपि कुत्ता चौपाया जानवर है, मगर बिल्कुल मुमकिन है कि उसका पिल्ला बीस पैरोंवाला होगा, या यह कि दो और दो अभी तो चार होते हैं, मगर शायद शाम तक दो और दो एक भी हो सकता है।

अनियतत्ववादी ( indeterminists ) कहने को तो अनिवार्यता और प्रकृति के नियमों को नहीं मानते, मगर व्यवहार में उन्हें अनिवार्यता और प्रकृति के नियमों को मानना ही पड़ता है। यह दिखाता है कि उपरोक्त सिद्धांत कितना अयुक्तिसंगत ( irrational ) है। यहां तक कि धर्म के सरमायेदार भी, जो यह दोहराते नहीं थकते कि ईश्वर के लिए अनिवार्यता कुछ नहीं है, कि उसके लिए सब कुछ संभव है, क़दम-क़दम पर अपने अनियतत्ववाद से पीछे हटते हैं। उन्हें यह मानने पर मज़बूर होना पडा है कि वास्तविकता के बहुत से क्षेत्रों में अनिवार्यता का ही राज है और ‘सर्वशक्तिमान’ ईश्वर भी उसे नहीं बदल सकता : ईश्वर अतीत को नष्ट नहीं कर सकता, वह ऐसा नहीं कर सकता कि त्रिभुज के तीनों कोणों का योग दो समकोणों के बराबर न हो या झूठ सच बन जाये, वग़ैरह-वग़ैरह।

अनियतत्ववाद का विरोध यांत्रिक नियतत्ववाद ( mechanical determinism ) के समर्थक भी करते हैं। वे कहते हैं कि धार्मिक विश्वास में प्राकृतिक नियमों के सभी तरह के उल्लंघनों और सभी तरह के चमत्कारों के लिए जगह है, जबकि विज्ञान सिद्ध करता है कि विश्व में सब कुछ प्रकृति के नियमों और अपरिहार्य अनिवार्यता के अनुसार घटता है। घटनाएं जिस रूप में घटती हैं, उससे भिन्न रूप में वे नहीं घट सकती। यदि एक भी घटना नियमों के विपरीत घटती या ऐसी एक भी घटना होती, जो नहीं घट सकती थी ( संयोग ), तो वह कारणहीन तथ्य या चमत्कार ही होता। किन्तु चमत्कार न तो होते हैं और न हो ही सकते हैं। इस प्रकार की तर्कणा के आधार पर स्पिनोज़ा  ने निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति में कुछ भी सांयोगिक नहीं है, कि विश्व में केवल अनिवार्यता है और सब कुछ पूर्वनिर्धारित है।

क्लासिक यांत्रिकी ( classical mechanics ) से इस दृष्टिकोण की पुष्टि हुई। क्लासिक यांत्रिकी के नियम पृथक पिण्ड की गति के प्रक्षेप-पथ को पूर्ण परिशुद्धता ( accuracy ) और अचूक अपरिहार्यता के साथ पूर्वनिर्धारित करते हैं, इस मान्यता के आधार पर वैज्ञानिक आश्चर्यजनक यथातथ्यता ( preciseness ) के साथ आकाशीय तथा पार्थिव पिण्डों के स्थान-परिवर्तन की भविष्यवाणी किया करते थे। किन्तु जब विज्ञान का पृथक पिण्डों की गति के प्रक्षेप-पथ से कहीं अधिक जटिल परिघटनाओं से वास्ता पड़ा, तो स्पष्ट हो गया कि यांत्रिक नियतत्ववादियों का दृष्टिकोण भी अयुक्तिसंगत है।

6a00d8341c575d53ef0168e6e9c755970cजैसे कि जीवों तथा वनस्पतियों के संबंध में प्रकृति का नियम है कि उनमें से कोई भी नित्य नहीं है। किंतु कुछ ऐसे नियम है, जिनके अनुसार कतिपय जीव तथा वनस्पति जातियों का जीवन अत्यधिक लंबा होता है। बरगद के वृक्ष हज़ारों वर्ष जीवित रह सकते हैं, मगर बरगद के हर अलग पौधे के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती : वह दूसरे, बीसवें या हज़ारवें दिन ही मर सकता है। ऐसा कोई नियम नहीं है, जो हर अलग पौधे या जीव की मृत्यु के दिन या घंटे को पूर्वनिर्धारित कर सके।

हर घटना अनिवार्य रूप से पूर्वनिर्धारित है और उसके घटने में, उसकी ‘घड़ी आने’ में कुछ भी बाधक नहीं बन सकता, यह स्वीकृति हमें नियतिवाद ( fatalism ) पर ले आती है। एक उपन्यास के नायक ने तब इसी तरह सोचा था, जब उसने अपनी कनपटी पर पिस्तौल तानते हुए कहा था कि यदि यह अनिवार्य रूप से पूर्वनिर्धारित है कि मैं इसी क्षण मर जाऊं, तो यह होकर ही रहेगा, चाहे मैं गोली चलाऊं या नहीं, और अगर यह पूर्वनिर्धारित है कि आज मुझे ज़िंदा बचना है, तो मैं घोड़ा दाबूं या नहीं, इसके बावजूद मैं ज़िंदा रहूंगा ही। नियतिवाद लोगों के रोजमर्रा के व्यवहार से इतना असंगत है कि उसे स्वीकार करने को यांत्रिक नियतत्ववाद के घोरतम समर्थक भी तैयार न हुए। किंतु घटनाओं को अपरिहार्य रूप से पूर्वनिर्धारित मानने के बाद नियतिवाद से कैसे बचा जा सकता है, यह कोई भी यांत्रिक नियतत्ववादी नहीं बता सका। नियतिवाद, यांत्रिक नियतत्ववाद का अनिवार्य परिणाम है

कभी-कभी प्राकृतिक वरण ( natural selection ) के महत्त्वपूर्ण जीववैज्ञानिक नियम का यह अर्थ लगाया जाता है कि हर प्राणी भाग्य के हाथ की कठपुतली है : यदि उसने अपने को जीवन के लिए औरों से कम अनुकूल बनाया है, तो वह जल्दी मर जायेगा और उसका वंश नहीं बढ़ पायेगा, और यदि उसने अपने को जीवन के लिए औरों से बेहतर अनुकूल बनाया है, तो वह बहुत समय तक जियेगा और उसका वंश ख़ूब बढ़ेगा। किंतु इस नियम की ऐसी व्याख्या सरासर ग़लत है। औरों से कम अनुकूलित अकेला प्राणी अपनी जाति के अन्य प्राणियों जितने लंबे समय तक ज़िंदा भी रह सकता है और जन्म के तुरंत बाद मर भी सकता है। उसके सामने बहुत सी दूसरी संभावनाएं भी है। नियम यह पूर्वनिर्धारित नहीं करता कि उस प्राणी के मामले में इनमें से कौनसी संभावना पूरी होगी। जड़ प्रकृति में भी नियम इसी तरह काम करते हैं।

कुछ दार्शनिक अनियतत्ववाद और यांत्रिक नियतत्ववाद की त्रुटिपूर्णता को देखकर मध्यम मार्ग अपनाते हैं। वे कहते हैं कि हर घटना या तो अनिवार्यता है या संयोग। छोटी, अमहत्त्वपूर्ण घटनाएं संयोग हैं और बड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाएं अपरिहार्यता, अनिवार्यता। सांयोगिक घटनाओं में कोई अनिवार्यता नहीं होती, इसलिए वे किन्हीं भी नियमों से नियंत्रित नहीं हैं और उन्हें चमत्कार ही माना जाना चाहिए। जहां तक अनिवार्य घोषित घटनाओं का संबंध है, तो इन दार्शनिकों के अनुसार उनमें से हर एक अपरिहार्य रूप से पूर्वनिर्धारित है और हम नियतिवादियों की तरह अवश्यंभाविता के मूक दर्शक ही बन सकते हैं। मध्यमार्गी दृष्टिकोण में पूर्वोक्त दो दृष्टिकोणों जैसी त्रुटियां तो हैं ही, पर इसके अलावा वह इसका निर्धारण पूरी तरह मनुष्य की मर्ज़ी पर छोड़ देता है कि कौन सी घटनाएं चमत्कार है और कौन सी अवश्यंभावी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

अनिवार्यता और संयोग – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम ‘अनिवार्यता और संयोग’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अनिवार्यता और संयोग – १

( necessity and chance ) – 1

732760-caveman-paintings-chauvet-cave-franceसामान्यतः संयोग ( chance ) उसे कहते हैं, जो घट भी सकता है और नहीं भी घट सकता है तथा ऐसे भी घट सकता है और वैसे भी घट सकता है। अनिवार्य ( necessary ) उसे कहते हैं, जिसे अवश्यमेव घटित होना है या जो घटे बिना नहीं रह सकता। जब तेज़ हवा के झोंके से कुकरौंधे के बीज हर दिशा में उड़ते हैं, तो पहले से ही यह कहना असंभव होता है कि वे कहां गिरेंगे। इस स्थिति में हम कहते हैं कि उनके गिरने की जगह नितांत सांयोगिक ( coincidental ) होती है। साथ ही बीजों का बिखरना कुकरौंधे के अस्तित्व ( existence ) की एक अनिवार्य शर्त है। इसके बिना पौधों की यह जाति धरती से लुप्त हो सकती है। ऐसे और भी उदाहरण दिये जा सकते हैं।

हम आसानी से अपने गिर्द की दुनिया में अल्पकालिक, अस्थायी, बाह्य, परिवर्तनीय तथा शीघ्रता से ग़ायब होने वाले ऐसे संयोजनों को देख सकते हैं, जिनके बिना भी कोई एक घटना विद्यमान तथा विकसित हो सकती है। उन्हें “संयोग” कहा जाता है। परंतु प्रत्येक प्रणाली और प्रत्येक घटना में ऐसे संयोजन, अंतर्क्रियाएं और संबंध, तत्व और उपप्रणालियां होती हैं, जिनके बिना वह अस्तित्वमान और विकसित नहीं हो सकती। उन्हें “अनिवार्य” कहा जाता है। अनिवार्यता ( necessity ) और संयोग, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रवर्ग ( category ) हैं। वे प्रत्येक भौतिक प्रणाली के प्रमुख लक्षण होते हैं।

अनिवार्यता की संकल्पना ( concept ) कुछ संयोजनों ( connections ) तथा अनुगुणों ( properties ) की समुचित दशाओं के अंतर्गत अवश्यंभावी उत्पत्ति को परावर्तित ( reflect ) करती है। अनुगुण और संयोजन तब अनिवार्य कहे जाते हैं, जब उनके अस्तित्व के कारण उन्हीं के भीतर निहित हों और जब वे एक घटना की रचना करने वाले घटकों की आंतरिक प्रकृति पर निर्भर हों। परंतु जिन अनुगुणों और संयोजनों के अस्तित्व के कारण उनसे बाहर स्थित होते हैं, यानी जो बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं, उन्हें सांयोगिक कहा जाता है। अनिवार्य अनुगुण और संयोजन अवश्यंभाव्यतः कुछ निश्चित दशाओं में ही उत्पन्न होते हैं, जबकि सांयोगिक अनुगुण और संयोजन अवश्यंभावी नहीं होते और वे उत्पन्न हो भी सकते हैं और नहीं भी हो सकते।

वस्तुगत जगत में घटनाओं के विकास की अवश्यंभावी शक्ति के रूप में अनिवार्यता का ही बोलबाला होता है, क्योंकि यह उनके सार ( essence ) से उपजती है और उनके संपूर्ण पूर्ववर्ती विकास और अंतर्क्रिया ( interaction ) पर आश्रित होती है। अनिवार्यता का प्रवर्ग प्राकृतिक और सामाजिक विकास के नियमबद्ध स्वभाव को अभिव्यक्त करता है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सांयोगिक घटनाओं के, अनिवार्य घटनाओं की ही तरह, अपने ही कारण ( cause ) होते हैं। यह सोचना ग़लत होगा कि संयोग और कारणहीनता एक ही चीज़ है। कारणहीन घटनाएं क़तई नहीं होती। अनिवार्यता की ही भांति संयोग भी वस्तुगत ( objective ) है और उसका अस्तित्व इस पर निर्भर नहीं है कि हम उसके कारण को जानते हैं या नहीं। संयोग की वस्तुगत प्रकृति को अस्वीकार करने से सामाजिक इतिहास तथा मनुष्य के अस्तित्व को भाग्यवादी, रहस्यमय प्रकृति प्रदान करने की प्रवृत्ति पैदा हो जाती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम