अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी संक्षिप्त विवेचना का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा – २
( epistemology of agnosticism – 2 )

vis1हर व्यक्ति और समस्त मानवजाति के जीवन का अनुभव बताता है कि अनुभूतियां ( sensations ) वास्तव में बाह्य विश्व के बारे में हमारे ज्ञान का स्रोत हैं। हम अपने दैनंदिन जीवन में प्रकृति संबंधी प्रयोगों के द्वारा जो अधिकांश ज्ञान पाते हैं, वह इंद्रियबोधों ( senses ) और अनुभूतियों पर ही आधारित होता है। इस प्रश्न पर भौतिकवादी और अज्ञेयवादी दोनों सहमत हैं। उनके बीच का मतभेद तब शुरू होता है, जब संज्ञान की प्रक्रिया में अनुभूतियों की भूमिका ( role ) और उनके स्रोत ( source ) का सवाल उठता है।

भौतिकवादी कहते हैं कि अनुभूतियां मानव मस्तिष्क में बाह्य परिवेश से पहुंचनेवाली सूचना का संप्रेषण ( communication ) तथा प्रसंस्करण ( processing ) करती हैं। इसके विपरीत अज्ञेयवादी भौतिक विश्व के अस्तित्व को और इस तरह संज्ञान की संभावना को भी नहीं मानते। किंतु बात इतनी ही नहीं है। समस्त संज्ञान को इन्द्रियजन्य अवबोध मात्र मानने के बाद अज्ञेयवादी आगे यह नहीं बता पाते कि मनुष्य की चेतना और विशेषतः वैज्ञानिक जानकारियों की प्रणाली में वे विचार या संप्रत्यय ( concepts ) कैसे प्रकट होते हैं, जिन्हें इंद्रियजन्य बिंब ( image ) और अनुभूतियां नहीं कहा जा सकता।

एक स्वतंत्र विचार प्रणाली के रूप में अज्ञेयवाद का जन्म प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञान और गणित के तीव्र विकास के काल में हुआ था। यह गणितीय विश्लेषण, उच्च बीजगणित, इत्यादि के उत्कर्ष का काल था। ये विज्ञान ऐसे संप्रत्ययों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे ‘अनन्तता’, ‘फलन’, ‘अनन्त रूप से लघु परिणाम’, ‘बहुविम सदिश’, आदि। इन सब संप्रत्ययों की रचना केवल अनुभूतियों के आधार पर नहीं की जा सकती और न उन्हें अनुभूति का समतुल्य ( equivalent ) ही कहा जा सकता है। दूसरी ओर, विज्ञान का सारा इतिहास उनके महत्त्व की पुष्टि कर चुका है और वे सिद्धांत के विकास के लिए ही नहीं, अपितु व्यावहारिक परिणाम पाने के लिए भी अत्यावश्यक सिद्ध हुए हैं। यह तथ्य अज्ञेयवाद की अयुक्तिसंगतता को साफ़-साफ़ दिखा देता है, क्योंकि यह आधुनिक विज्ञान के अनेक महत्त्वपूर्ण संप्रत्ययों के मूल और भूमिका को नहीं समझा सकता।

आज के समय में, अज्ञेयवाद की सर्वाधिक अतिवादी और स्पष्ट अभिव्यक्ति अतर्कबुद्धिवाद ( irrationalism ) है। यह विश्वास तथा सहजबोध को, मानव ज्ञान के मुक़ाबले में खड़ा करके मनुष्य की संभावनाओं को सीमित करता है। इसके अनुसार संज्ञान में विवेक, चिंतन और तर्क की शक्ति सीमित होती है, कि संज्ञान की मुख्य विधि अन्तःप्रज्ञा ( intuition ), अनुभूति, सहजवृत्ति ( instinct ), आदि हैं। वे विश्व की एक अराजक, नियमसंगति से रहित, तर्कहीन, संयोग के करतबों वाली निराशावादी तस्वीर पेश करते हैं, और विज्ञान तथा सामाजिक प्रगति का निषेध करते हैं। कुछ अतर्कबुद्धिवादी दार्शनिक, बल तथा संकल्पशक्ति का विचार भी प्रतिपादित करते हैं, जो कि अंततः अपनी नियति में फ़ासिज़्म ( fascism ) की वैचारिकी तथा व्यवहार के निरूपणार्थ एक स्रोत के रूप में काम करता है।

इस तरह अज्ञेयवादी केवल विज्ञान की बुनियाद को ही कमज़ोर नहीं बनाते, बल्कि वैज्ञानिक विश्व-दृष्टिकोण तथा प्रगतिशील वैचारिकी को भी कमज़ोर करते हैं। अतः यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वर्तमान में भी प्रगतिशील वर्गों के विरोधी, वैचारिक संघर्ष में अज्ञेयवाद को एक हथियार की तरह से इस्तेमाल करते हैं। वे यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि विश्व और मनुष्य को जानना असंभव है। वे विज्ञान की भूमिका को सीमित करते हैं, तार्किक चिंतन को अस्वीकार करते हैं तथा प्रकृति और विशेष रूप से समाज के वस्तुगत नियमों के संज्ञान के अस्वीकरण के आधार पर एक वैचारिक घटाघोप की अंधगली में भटकते रहने के लिए हमें छोड़ देते हैं। विश्व की ज्ञेयता ( knowability ) को अस्वीकार करके अज्ञेयवादी हमें इस विश्व में सही दिशा की ओर जाने से वंचित करते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत विश्व की ज्ञेयता के बारे में एक बातचीत प्रस्तुत की थी, इस बार हम अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा पर एक संक्षिप्त विवेचना की शुरुआत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अज्ञेयवाद की ज्ञानमीमांसा – १
( epistemology of agnosticism – 1 )

picture-1विश्व की ज्ञेयता ( knowability ) के प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिक मुख्यतः दो प्रवृत्तियों में विभाजित हो जाते हैं। एक प्रवृत्ति में विश्व की ज्ञेयता के समर्थक शामिल हैं, दूसरी प्रवृत्ति में इस ज्ञेयता के विरोधी शामिल हैं, जो यह मानते हैं कि विश्व पूर्णतः या अंशतः अज्ञेय ( unknowable ) है। विश्व की ज्ञेयता के विरोधियों को सामान्यतः अज्ञेयवादी ( agnostic ) कहते हैं। अज्ञेयवाद, यूनानी दर्शन में संशयवाद ( scepticism ) के रूप में उत्पन्न हुआ और उसे ह्यूम तथा कांट के दर्शन में क्लासिकीय रूप प्राप्त हुआ। इसकी एक क़िस्म चित्रलिपियों ( अथवा प्रतीकों ) का सिद्धांत ( theory of hieroglyphs or symbols ) है। नवप्रत्यक्षवाद ( neo-positivism ) और अस्तित्ववाद ( existentialism ) तथा कई अन्य धाराओं के प्रतिनिधि भी यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि विश्व तथा मनुष्य को जानना असंभव है।

अज्ञेयवाद, विश्व की ज्ञेयता से इंकार करता है। अनुभूतियों ( sensations ) को हमारे समस्त ज्ञान का स्रोत मानते हुए अज्ञेयवादी कहते हैं : यदि हमारी अनुभूतियां, हमारे इन्द्रियबोध ( senses ) वास्तविक घटनाओं से मेल खाते हैं, तो हमारा ज्ञान सही है। यदि हमारी अनुभूतियां और इन्द्रियबोध वस्तुओं के वास्तविक रूप के अनुरूप नहीं है, तो हमारे ज्ञान को भ्रामक ही मानना होगा। किंतु क्या किसी वस्तु के इन्द्रियजन्य अवबोध और स्वयं इस वस्तु के बीच तुलना की जा सकती है? “मस्तिष्क के सामने इन्द्रियबोधों के अलावा और कोई वस्तुएं नहीं होतीं। मस्तिष्क इन्द्रियबोधों और वस्तुओं के सहसंबंधों ( correlations ) के बारे में कोई भी प्रयोग करने में बिल्कुल असमर्थ है,” प्रसिद्ध अंग्रेज दार्शनिक डेविड ह्यूम ( १७११-१७७६ ) ने लिखा था।

इनके अनुसार हमारी अनुभूतियों की शून्य से तुलना करना और इसकी जांच करना असंभव है कि अनुभूतियां उस वास्तविकता ( actuality ) के अनुरूप हैं या नहीं, जिसका वे ज्ञान करवाती हैं। इसलिए इस प्रश्न का भी उत्तर नहीं दिया जा सकता कि अनुभूतियां विश्व का प्रतिबिंबन ( imaging ) करती हैं या वे मात्र भ्रांतियां ( misconception ) ही हैं। हो सकता है कि हमसे बाहर ऐसी वस्तुओं का अस्तित्व हो, जिनमें वे ही गुण हैं, जिनकी सूचना अनुभूतियां देती हैं। साथ ही यह भी सर्वथा संभव है कि ऐसी कोई वस्तुएं हैं ही नहीं। इसलिए अज्ञेयवादी कहते हैं कि इस प्रश्न पर संशयों से मुक्त हो पाने और उसका समाधान प्रस्तुत करने की सामर्थ्य लोगों में नहीं है।

ह्यूम के पूर्ववर्ती, आत्मपरक प्रत्ययवादी ( subjective idealistic ) बर्कले भी अनुभूतियों को ज्ञान का एकमात्र स्रोत कहते थे, यद्यपि साथ ही अपने इस विश्वास के कारण कि बाह्य परिवेश की वस्तुएं अनुभूतियों की संहति हैं, वह ईश्वर की सत्ता को अनुभूतियों पर निर्भर नहीं मानते थे। उनकी दृष्टि में ईश्वर ही अनुभूतियों का स्रोत था। इसी में बर्कले ने अपने मत में निहित विरोधाभास ( paradox ) दिखाया, क्योंकि वह अनुभूतियों के स्रोत ( ईश्वर ) को स्वयं अनुभूतियों से बाहर मानते थे।

यहां पर ह्यूम का बर्कले से मतभेद हो जाता है। ह्यूम न केवल अनुभूतियों को समस्त ज्ञान का स्रोत मानते हैं, मगर साथ ही, प्रत्ययवादी होने के बाबजूद, ईश्वर की सत्ता से भी इंकार करते हैं। ह्यूम के अज्ञेयवाद का यह पक्ष शुरू में प्रकृतिविज्ञानियों को पसंद आया, क्योंकि वह धर्मशास्त्रियों के हमलों से उनके बचाव का साधन बन सकता था। किंतु शीघ्र ही उनमें से सर्वाधिक सूक्ष्म दृष्टिवालों ने जान लिया कि अज्ञेयवाद विज्ञान से मेल नहीं खाता : विज्ञान का मुख्य उद्देश्य परिवेशी विश्व का ज्ञान प्राप्त करना है, जबकि अज्ञेयवाद यथार्थ विश्व की ज्ञेयता से ही इनकार करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

विश्व की ज्ञेयता के बारे में एक संवाद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम इसी के अंतर्गत विश्व की ज्ञेयता के बारे में एक संवाद प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें  समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विश्व की ज्ञेयता के बारे में एक संवाद
( a dialogue about the knowability of the world )

color-light-effectsविश्व की ज्ञेयता के विरोधी यानी अज्ञेयवादी ( agnostics ) तथा ज्ञेयता के पक्षपोषक यानी भौतिकवादी ( materialists ) अपने-अपने विचारों का मंडन कैसे करते हैं? क्यों न उनके बीच एक संवाद होने दिया जाये? ——–

भौतिकवादी – यह कल्पना करना भी कठिन है कि एक सामान्य व्यक्ति विश्व की ज्ञेयता से इनकार कर सकता है। हमारे जीवन का सारा अनुभव सिखाता है कि  विश्व ज्ञेय है।

अज्ञेयवादी – नहीं, इसकी उलट बात सच है। हमारे दैनिक जीवन का अनुभव हमारे आसपास की वस्तुओं के प्रेक्षण ( observation ) पर, दृष्टि, श्रवण तथा, स्पर्श, आदि के ज़रिये उनके संवेदनात्मक प्रत्यक्षण ( sensory perception ) पर आधारित है। और उन पर विश्वास करना बहुत ग़लत होगा।

भौतिकवादी – क्यों?

अज्ञेयवादी – मैं एक पेंसिल थामे हुए हूं। यह सीधी दिखायी देती है। मैं इसके आधे भाग को पानी में डुबोता हूं। अब यह पेंसिल आपको कैसी दिखायी पड़ती है ?

भौतिकवादी – मैं देखता हूं कि यह एक छोटे से कोण पर मुड़ी हुई है।

अज्ञेयवादी – तो, दृष्टि कहती है कि एक मामले में पेंसिल सीधी है, और दूसरे में वही मुड़ी हुई। हम किस पर विश्वास करें ? इसके बाद हम कैसे कह सकते हैं कि हम पेंसिल जैसी साधारण वस्तु के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी रखते हैं ?

भौतिकवादी – आपका उदाहरण विश्वसनीय नहीं है। इस बात को परखने के कई तरीक़े हैं कि हमारी दृष्टि से प्राप्त अनुभव सही हैं या ग़लत। जैसे कि एक तो मैं पेंसिल को पानी से बाहर खींचे बिना उसे थामे रख सकता हूं और अपने को आश्वस्त कर सकता हूं कि पेंसिल का मोड़ आभास मात्र है। दूसरा, मैं पेंसिल को पूर्णतः पानी में डुबों सकता हूं, तब वह उतनी ही सीधी होगी जितनी की हवा में। तीसरा, मैं पेंसिल का किंचित मुड़ा हुआ एक अलग खोल ले सकता हूं और पेंसिल को पानी से बाहर निकाले बिना उसे उसके अंदर डालने की कोशिश कर सकता हूं। किंतु मैं ऐसा नहीं कर सकूंगा। इसका मतलब यही होगा कि पेंसिल मुड़ी हुई नहीं है।

अज्ञेयवादी – इससे आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं ?

भौतिकवादी – ज्ञान की सत्यता या असत्यता को परखने के लिए, यानी उसे  यथार्थता ( reality ) के तदनुरूप सिद्ध करने के लिए केवल  प्रेक्षण ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए चाहे सरलतम ही क्यों ना हो, प्रयोग ( experiment ) करने की, यानी जैसे कि इस उदाहरण में, पेंसिल तथा पानी को लेकर कुछ क्रियाकलाप ( activity ) करने की आवश्यकता होती है और तभी हम दृष्टि-भ्रम ( optical illusion ) तथा वास्तविक स्थिति के बीच भेद करने में कामयाब हो सकते हैं।

अज्ञेयवादी – ( अपनी राय पर अड़ते हुए ) – ज्ञान की सत्यता पर संदेह करने के अन्य कारण भी है।

भौतिकवादी – कौनसे ?

अज्ञेयवादी – एक ही सदी पहले तक वैज्ञानिकों का ख़्याल था कि परमाणु अविभाज्य है। फिर प्रयोग करने के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि परमाणु में एक नाभिक तथा मूल कण, इलैक्ट्रोन, होते हैं, जो आगे अविभाज्य हैं। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकगण यह कहने लगे हैं कि स्वयं मूल कणों में विशेष भौतिक तत्व, क्वार्क तथा उनको साथ ‘श्लेषित’ ( glued ) करने वाले भौतिक क्षेत्र ( ग्लूओन ) होते हैं। अर्थात १९वीं सदी के अंत में जो बात सत्य समझी जाती थी, वह २०वीं के प्रारंभ में मिथ्या ( false ) सिद्ध हो गयी और जो बात तब सत्य मानी जाती थी, वह हमारे युग में असत्य पायी जाती है। तो बताइये कि हम किसे सत्य मानें ? हम विश्व के सही ज्ञान की बात कैसे कर सकते हैं ?

भौतिकवादी – आप इस बात को ध्यान में नहीं रख रहे हैं कि विज्ञान के विकास के अपने नियम होते हैं। मुद्दा यह है कि जब हमारा ज्ञान  गहनतर ( deeper ) होता है, तो हम पहले के असत्य दृष्टिकोणों को व्यर्थ ही ठुकराते नहीं, बल्कि उन्हें अधिक सही, अधिक पूर्णतर और अधिक सत्य बनाते हैं। इसलिए हमारा संबंध  संज्ञान की एक प्रक्रिया से है जिसमें हम हर समय विश्व के अधिक सत्य तथा पूर्णतर ज्ञान की ओर लगातार आगे बढ़ते रहते हैं। आपका उदाहरण केवल इस बाट की पुष्टि करता है कि आज की भौतिकी के पास परमाणु की संरचना के बारे में ५० या १०० साल पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा अच्छी जानकारी है, इस बारे में हमारा ज्ञान अधिक उन्नत और समृद्ध हुआ है। इससे आपके नहीं, बल्कि मेरे इसी दृष्टिकोण की पुष्टि होती है कि हम विश्व को जान सकते हैं और यह ज्ञान असीम है।

उपरोक्त संवाद से दो महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं।

(१) अज्ञेयवाद अपने दृष्टिकोणों के समर्थन में संवेदनों के भ्रमों ( illusions ) का ( उपरोक्त उदाहरण में दृष्टि-भ्रम का ) उपयोग करता है। वह केवल निष्क्रिय ( passive ) प्रेक्षण पर भरोसा करता है, यही नहीं, वह जिस प्रेक्षण पर भरोसा करता है उसे अन्य के रिश्ते में नहीं, उनसे अलग-थलग करके देखता है। दूसरी तरफ़ विश्व की ज्ञेयता के समर्थक, यानी एक भौतिकवादी, विश्व के संज्ञान के लिए और अज्ञेयवाद की बातों का खंडन करने के लिए प्रयोग का उपयोग करता है, जो व्यवहार ( practice ) का, यानी जनगण की सामाजिक व उत्पादन क्रिया का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह व्यवहार ही है जो विश्व की ज्ञेयता को प्रमाणित करने में मदद करता है

(२) अज्ञेयवाद विज्ञान के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को एक दूसरे से  असंबंधित ( unconnected ) रूप में देखता है। वह उनकी आंतरिक एकता और अंतर्संबंधों को, या विज्ञान के विकास पर ध्यान नहीं देता और इसीलिए यह समझने में असमर्थ होता है कि विकास या क्रमविकास के दौरान एक अवस्था दूसरी अवस्था से संबंधित होती है, उसे संपूरित करती है और कोई एक ज्ञान गहनतर होता है, अन्य को संशोधित ( refine ) करता है। फलतः ज्ञान स्वयं विकसित ( develop ) होता है और बाह्य जगत के बारे में हमारी जानकारी बढ़ती जाती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

दर्शन का बुनियादी सवाल और इसकी प्रवृत्तियां

हे मानवश्रेष्ठों,
पिछली बार हमने दर्शन और विश्व को देखने के मनुष्य के नज़रिए यानि उसके विश्वदृष्टिकोण के बीच क्या संबंध होता है, इसे समझने की कोशिश की थी।
चर्चा आगे बढ़ाते हैं।
आज हम दर्शन के बुनियादी सवाल से गुजरेंगे।
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प्रत्येक विज्ञान का अपना प्रमुख बुनियादी सवाल होता है, यानि उन घटनाओं और प्रक्रियाओं का परास (range) जिनका वह अध्ययन करता है और अंत में अनुसंधान की उसकी अपनी विशेष विधि होती है। फलतः दर्शन की गहन समझ के लिए जरूरी है कि उसके बुनियादी सवाल, विषयवस्तु तथा अध्ययन-विधि को परिभाषित किया जाए।

जर्मनी के दार्शनिक इमानुएल कांट का विश्वास था कि दार्शनिक को तीन प्रश्नों का उत्तर देना ही चाहिए: “मैं क्या जान सकता हूं?”, “मुझे क्या करना चाहिए?” और “मैं किसकी उम्मीद कर सकता हूं?” आइए, यह देखें कि इन तीन प्रश्नों में कोई अधिक सामान्य प्रश्न तो छुपा नहीं है।

वास्तव में मनुष्य सीखता है, उम्मीदें करता है और केवल इसी कारण से कि वह एक मन, चेतना और संकल्प से संपन्न है और अपने इर्द-गिर्द होने वाले सब कुछ का अवबोध व व्याख्या करने में समर्थ है। मनुष्य पेशियों और तंत्रिकाओं का ढे़र मात्र नहीं है, केवल एक शरीर नहीं है, वह जैसा कि प्राचीन काल में कहा जाता था, एक “आत्मा” से भी संपन्न है। सारे विशेष प्रश्नों का उत्तर इस बात पर पूर्णतः निर्भर है कि इस मुख्य प्रश्न का उत्तर किस तरह से दिया जाता है कि आत्मा, चित्त या चेतना क्या है? यह कहां से आती है और अजैव प्रकृति से किस प्रकार जुड़ी है? परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या वह उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है?

यही दर्शन के बुनियादी सवाल का सार है। चूंकि अन्य प्राणियों से भिन्न चिंतनशील, तर्कबुद्धिसंपन्न, सचेत सत्व होने की अपनी विशेषता को लोग बहुत पहले ही जान गए थे, इसलिए विश्व के साथ मनुष्य के संबंध की समस्या को आम तौर पर इस प्रकार निरुपित किया जाता था: सत्व के साथ आसपास की वास्तविकता के या भूतद्रव्य के साथ चेतना और चिंतन का संबंध।

अतः दर्शन का मूल प्रश्न मन और प्रकृति, चेतना और पदार्थ के अंतर्संबंध का प्रश्न है। दर्शन के उपरोक्त बुनियादी सवाल के दो पक्ष हैं जिनके आधार पर दर्शन के क्षेत्र की दिशाओं का निर्धारण होता है। आइए उन्हें समझने की कोशिश करते हैं।
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दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष:

भूतद्रव्य तथा चिंतन के संबंध पर विचार व्यक्त करते समय यह समुचित प्रश्न पैदा होता है कि इनमें से प्राथमिक कौन है? निर्धारक तत्व कौनसा है? भौतिक जगत या चिंतन और चेतना? दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष यही है।

हमारा जीवन अनुभव यह दर्शाता है कि प्रत्येक ठोस मामले में इस प्रश्न का उत्तर देना बिल्कुल सहज है। मसलन, चंद्रमा की संकल्पना ( विचार ) तथा उसके कविता बिंबों के प्रकट होने से बहुत पहले ही चंद्रमा विद्यमान था। फलतः यह कहा जा सकता है भौतिक वस्तु ( चंद्रमा ) अपने वैज्ञानिक या कवित्वमय रूप की, यानि चंद्रमा के प्रत्यय ( संकल्पना ) की पूर्ववर्ती थी।

इसके विपरीत चंद्रमा पर साक्षात पदार्पण करने से पहले वहां पहुंचने की कल्पना, साधनों के अभिकल्पन ( design ) का विचार निश्चय ही पहले पैदा हुआ और इसके बाद ही इन्हें मूर्त रूप दिया जा सका। फलतः इस मामले में यह कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक प्रत्यय ( विचार ), रॉकेटों तथा स्वचालित प्रयोगशालाओं के रूप में भौतिक वस्तुओं की रचना का पूर्ववर्ती था।

यदि यह ऐसी ही स्थितियों का मामला होता, तो दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष निहायत ही सरल होता। लेकिन दर्शन में ऐसे सरल मामलों की पड़ताल नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के प्रति मनुष्य के रुख़ पर विचार किया जाता है। यह स्पष्ट है कि सवाल के इस पहले भाग को समझना और सार्विक रूप में व्याख्यायित करना इतना आसान नहीं है। वास्तव में यह स्पष्ट करना आवश्यक है के ब्रह्मांड़ के संपूर्ण ऐतिहासिक क्रमविकास के पैमाने पर प्राथमिक और निर्धारक है: चिंतन या भौतिक जगत, और मनुष्य के क्रियाकलाप के किसी भी रूप में निर्धारक कौन है? केवल इसी संदर्भ में यह प्रश्न सार्थक है।

इस प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिकगण दो बड़े शिविरों या प्रवृत्तियों – भौतिकवाद ( Materialism ) और प्रत्ययवाद ( Idealism ) – में बंटे हुए हैं। भौतिकवादी इस बात पर जोर देते हैं कि भूतद्रव्य, पदार्थ प्राथमिक व निर्धारिक है और चेतना द्वितीयक तथा निर्धारित है। प्रत्ययवादी ( भाववादी, आदर्शवादी पर्याय शब्द भी काम में लिए जाते हैं ) विचार, चेतना को प्राथमिक और भूतद्रव्य, पदार्थ को द्वितीयक मानते हैं।

दर्शन के इतिहास में ऐसे भी चिंतक हुए हैं, जिन्होनें एक मध्यवर्ती स्थिति अपनाने की कोशिश की। उन्होंने दोनो विश्व तत्वों , अर्थात भूतद्रव्य तथा चेतना के बीच एक प्रकार की समांतरता, स्वाधीनता तथा समानता को मान्यता दी। इन्हें द्वेतवादी कहा जाता है। द्वेतवाद का कोई स्वाधीन महत्व नहीं है क्योंकि इसके महान प्रवक्ता देर-सवेर या तो प्रत्ययवाद की स्थिति पर जा पहुंचे या भौतिकवाद की।

दर्शन के बुनियादी सवाल का दूसरा पक्ष:

जब हम भूतद्रव्य और चिंतन तथा चेतना के बीच संबंध की जांच करते हैं, तो यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या हमारा चिंतन बाह्य जगत का सही-सही संज्ञान प्राप्त कर सकता है, क्या हम अपने आसपास की घटनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में सही अंदाज़ा लगा सकते है और कि क्या हम उनके संबंध में सच्ची राह जाहिर कर सकते हैं और अपने निर्णयों तथा कथनों के आधार पर सफलतापूर्वक कर्म कर सकते हैं?

यह प्रश्न कि क्या विश्व संज्ञेय है और अगर ऐसा है, तो किस सीमा तक तथा क्या मनुष्य बिल्कुल सही या लगभग सही ढ़ंग से अपने आसपास की यथार्थता का संज्ञान प्राप्त कर सकता है, उसे समझ तथा उसकी छानबीन कर सकता है। यही दर्शन के बुनियादी सवाल का दूसरा पक्ष है।

विश्व की संज्ञेयता के प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिक दो प्रवृत्तियों में विभाजित हो जाते हैं। एक प्रवृत्ति में विश्व की संज्ञेयता के समर्थक शामिल हैं ( भौतिकवादियों तथा प्रत्ययवादियों की एक विशेष धारा, वस्तुगत प्रत्ययवादियों की एक बड़ी संख्या ) ; दूसरी प्रवृत्ति में इस संज्ञेयता के विरोधी शामिल हैं, जो यह मानते हैं कि विश्व पूर्णतः या अंशतः अज्ञेय है ( वे प्रत्ययवादियों की एक विशेष धारा, आत्मगत प्रत्ययवादी होते हैं )। विश्व की ज्ञेयता के विरोधियों को सामान्यतः अज्ञेयवादी कहते हैं।
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अधिकांश लोग साधारण जीवन के व्यवहार में स्वाभाविक तथा अचेतन रूप से भौतिकवादी होते हैं। वे ज़िंदगी के भौतिक पक्ष से भली-भांति परिचित होते हैं और अपने दैनन्दिनी कार्यकलापों में भौतिक सिंद्धांतों से परिचालित होते हैं। यह बात दीगर है कि जब जीवन से जुड़ी जिन चीज़ों में अनिश्चितता या असुरक्षा शामिल हो जाती है, तब वे पारंपरिक रूप से प्राप्त अपनी समझ के हिसाब से प्रत्ययवादी चिंतन का सहारा लेते हैं।

इसलिए समस्त भौतिकवादी गतिविधियों के बाबजूद, प्रत्ययवादी चिंतन के अस्तित्व में कोई आश्चर्य की बात नहीं है। प्रत्ययवाद के उद्‍भव का कारण सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियां हैं। प्राचीन काल में जिन प्रांरभिक दार्शनिक मतों का जन्म हुआ, वे उन दशाओं में विकसित हुए, जब धर्म का प्रभाव बहुत ही प्रबल था। अधिकांश धार्मिक मतों के अनुसार, विश्व की रचना एक ईश्वर या देवताओं के द्वारा, अभौतिक, आध्यात्मिक, सर्वशक्तिमान सत्वों के द्वारा हुई। विश्व के धार्मिक-प्रत्ययवादी स्पष्टीकरण को स्वीकारने वाले अनेक दार्शनिक मतों पर इन विचारों का निश्चित प्रभाव पड़ा था।

फिर क्या कारण है कि वर्तमान युग में जब विज्ञान तथा इंजीनियरी के विकास ने भौतिकवाद की सत्यता की अनगिनत अकाट्य पुष्टियां कर दी हैं, तब भी प्रत्ययवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है? मुद्दा यह है कि स्वयं मानव जीवन में और सामाजिक जीवन की दशाओं में प्रत्ययवाद की निश्चित जड़ें विद्यमान हैं। प्रत्ययवाद, प्रभावी वर्गों के विश्वदृष्टिकोण तथा वैचारिकी के साथ जुड़ा है और कुछ सामाजिक शक्तियों के लिए उपयोगी है, क्योंकि यह मौजूदा विश्व व्यवस्था की शाश्वतता तथा निरंतरता के पक्ष में दलीले मुहैया कराता है। यथास्थिति को बनाए रखने और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों को गैरजरूरी सिद्ध कर उनकी धार को कुंद करने के लिए कटिबद्ध होता है। यह सत्ता से नाभिनालबद्ध है इसीलिए उसे भरपूर प्रश्रय, संजीवनी और प्रचार मिलता है।
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आज के लिए काफ़ी हो गया।
अब काफ़ी आधारभूत सामग्री हो गई है जो दर्शन के अवबोध के लिए एक सुसंगत स्थिति पैदा करने में सक्षम लगती है।

अगली बार दर्शन की अध्ययन विधियों पर चर्चा करते हुए आगे बढ़ेंगे।
जिज्ञासाओं और संवाद का स्वागत है।

समय