अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत अंतर्विरोधों के रूपों पर चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए अंतर्विरोधों के अन्य रूपों पर बात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – चौथा भाग
प्रतिरोधी और अप्रतिरोधी अंतर्विरोध

सामाजिक जीवन में अंतर्विरोध ( contradiction ) प्रतिरोधात्मक और ग़ैर-प्रतिरोधात्मक हो सकते हैं। सामाजिक अंतर्विरोधों को उनकी तीव्रता तथा उनके समाधान की विधि के अनुसार प्रतिरोधी ( antagonistic ) तथा अप्रतिरोधी ( non-antagonistic ) अंतर्विरोधों में विभाजित किया जाता है।

guernicaअंतर्विरोधों को प्रतिरोधात्मक बनाने वाली चीज़ है समाज का असंगत हितों ( inconsistent interests ) वाले वर्गों में विभाजन, ऐसा वह विभाजन जो उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व से उत्पन्न होता है। इन वर्गों के बीच के अंतर्विरोध प्रतिरोधी हुआ करते हैं। प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का विभेदक लक्षण ( distinguishing feature ) उनकी घोर तीव्रता और एक प्रदत्त समाज में विभिन्न समूहों तथा वर्गों के विरोधी हितों, लक्ष्यों तथा स्थितियों के पुनर्मेल ( reconciling ) की असंभाव्यता ( impossibility ) है। इसीलिए प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का समाधान उसी सामाजिक प्रणाली की दशाओं के अंतर्गत नहीं हो सकता है, जिसने उन्हें जन्म दिया है। उनका समाधान प्रबल तथा दृढ़ संघर्ष ( fierce and stubborn struggle ) के द्वारा होता है और नियमतः प्रतिरोधी पक्षों में से एक के उन्मूलन ( elimination ) से समाप्त होता है। यानि उन्हें वर्ग संघर्ष ( class struggle ) तथा ऐसी सामाजिक क्रांति ( social revolution ) से ही हल किया जा सकता है, जो पुरानी प्रणाली का मूलोच्छेदन तथा नयी की स्थापना करती है।

इस तरह के प्रतिरोधी अंतर्विरोध, वर्ग आधारित दास-प्रथात्मक, सामंती और पूंजीवादी समाजों के लाक्षणिक अंतर्विरोध हैं। इस तरह के हर समाज में ये अंतर्विरोध पनपते हैं, विकसित होते हैं और अंततः उसके अवश्यंभावी पतन तक पहुंचा देते हैं। मसलन, पूंजीवादी समाज में मजदूर वर्ग तथा पूंजीवादी वर्ग के बीच प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का समाधान एक वर्ग के रूप में पूंजीवादी वर्ग के उन्मूलन द्वारा समाजवादी क्रांति से ही हो सकता है। बेशक यहां ‘उन्मूलन’ का सरलीकृत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए। यह एक प्रदत्त वर्ग के सदस्यों के भौतिक विनाश, या शारीरिक उच्छेदन का मामला नहीं है, बल्कि समाज में पूंजीपति वर्ग के उन आर्थिक व राजनीतिक आधारों की समाप्ति है जो उन्हें प्रभुत्व ( dominance ) में बनाता है, एक वर्ग के रूप में उनके समग्र प्रतिरोध के खात्मे तथा उत्पादन के साधनों ( means of production ) पर निजी पूंजीवादी स्वामित्व ( private capitalist ownership ) के उन्मूलन का मामला है। इस प्रतिरोधी अंतर्विरोध के समाधान के रूप स्वयं भी बहुत भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि वे प्रत्येक देश विशेष में उसके विकास की निश्चित अवस्था में विद्यमान ठोस ऐतिहासिक दशाओं ( concrete historical conditions ) पर निर्भर होते हैं।

अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों की विशेषता उनकी कम तीक्ष्णता ही नहीं, बल्कि उनकी समाधेयता का ढंग भी है। अप्रतिरोधी अंतर्विरोध तब उत्पन्न होते हैं, जब एक समाज में विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के जीवन-हित सर्वनिष्ठ ( common ) होते हैं। मसलन, पूंजीवादी समाज के अंतर्गत किसानों और मजदूर वर्ग के बीच के अंतर्विरोध, प्रतिरोधी नहीं , बल्कि अप्रतिरोधी होते हैं। किसानों के पास भूमि, पशु और खेती के उपकरणों के रूप में उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है और वे उस संपत्ति को अपने पास बनाए रखने तथा बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी तरफ़, मजदूरों के पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते, उनके पास केवल अपनी श्रम-शक्ति होती है जिसे वे उत्पादन के साधनों के स्वामियों को बेचने के लिए मजबूर होते हैं, इसलिए उनका वर्गहित स्वाभाविक रूप से इनके उन्मूलन में दिलचस्पी रखता है। फलतः किसानों और मजदूरों के हितों के बीच एक निश्चित अंतर्विरोध होता है। लेकिन अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारण मुख्य मुद्दे पर इन सामाजिक श्रेणियों के हित समान हैं, क्योंकि दोनों ही पूंजपति वर्ग द्वारा शोषित हैं। इसीलिए पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में इनका एका बनता है, मजदूर वर्ग किसानों को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो जाता है, इनके संघर्ष साझे होने लगते हैं।

प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से भिन्न अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों के समाधान में विरोधियों ( opposites ) में से किसी एक का उन्मूलन करने की जरूरत नहीं होती है। उनका समाधान नियमतः शांतिपूर्ण तरीक़े से विभिन्न सामाजिक समूहों की अवस्थितियों तथा हितों को शनैः शनैः, लगातार सचेत ढंग से एक दूसरे के निकटतर लाने के ज़रिये किया जाता है। किंतु यह ‘निकटतर आना’ विरोधियों के संघर्ष के बिना नहीं हो सकता। अंतर्विरोध अप्रतिरोधी ही सही परंतु अंतर्विरोध तो हैं ही, इसलिए उनके बीच भी विरोधियों की एकता और संघर्ष का द्वंद्ववाद का नियम लागू होता ही है। चूंकि अंतर्विरोध अप्रतिरोधी हैं तो उनके समाधान एकता की ओर हल किये जाने चाहिए। समाज में विभिन्न समूहों के बीच विशेष अप्रतिरोधी अंतर्विरोध होते है, जो उसके विकास से उत्पन्न होते हैं तथा उस विकास को प्रभावित करते हैं।

यदि ऐसे अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों को समय पर समुचित रूप से सुलझाया तथा हल नहीं किया जाये, तो वे अत्यंत तीक्ष्ण ( acute ) बन सकते हैं और समाज के विकास को रोकना आरंभ कर सकते हैं। जैसे कि हमारे भारतीय समाज की विविधता के रूपों में विभिन्न जातियो, धर्मों, क्षेत्रों, भाषा समूहों आदि के बीच के अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों की उपस्थिति से हम इसे समझ सकते हैं। इनका समाधान एकता की ओर हल करने में किया जाना चाहिए, परंतु कुछ शक्तियां इन्हें उभारने और तीक्ष्ण करने में ही अपने हित देखती हैं, और परिणाम ये सामने आता है कि मूल प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से समाज का ध्यान हटता है, उनके समाधानों में व्यवधान उत्पन्न होते हैं, गतिरोध पैदा होते हैं, और ये सापेक्षतः गौण अप्रतिरोधी अंतर्विरोध मुख्य से होने लगते हैं, समाज की ऊर्जा इनमें ही खपाने की कोशिशे होती हैं, स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होता है और यथास्थिति ना सिर्फ़ बनी रहती है बल्कि और भी खतरनाक प्रतिगामी ( regressive ) रूप अख़्तियार करने लगती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम पर चर्चा आगे बढ़ाई थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए अंतर्विरोधों के रूपों पर बात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – तीसरा भाग
अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप

contradictions-s14s15-wingsdomain-art-and-photographyविश्व में अंतर्विरोधों ( contradiction ) के अनेक और विविधतापूर्ण रूप ( forms ) पाए जाते हैं। वे विकास की प्रक्रिया पर विविध प्रकार का प्रभाव डालते हैं और अपने समाधान के विविध रूपों तथा साधनों की मांग करते हैं। लोग अपने दैनिक जीवन में उनसे टकराते रहते हैं, भरसक उनका विश्लेषण करते हैं और उनके समाधानों के लिए, तद्‍अनुकूल ही अपने व्यवहार का नियमन ( regulation ) करते हैं। अतः अंतर्विरोधों के सामान्य रूपों की गहरी समझ इस प्रक्रिया को बेहतर बनाती है और व्यक्ति को अपनी वस्तुस्थिति को जानने और इसमें अपनी एक निश्चित भूमिका को तय करने में मदद करती है। इसी उद्देश्य से हम यहां अंतर्विरोधों के उन सबसे महत्त्वपूर्ण और सामान्य रूपों का अध्ययन करेंगे, जिनका कि व्यावहारिक, वैज्ञानिक और सामाजिक-राजनीतिक महत्त्व बहुत अधिक है। ये हैं आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोध, बुनियादी और गैरबुनियादी अंतर्विरोध तथा प्रतिरोधी और अप्रतिरोधी अंतर्विरोध।

आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोध

जीवन में हमें आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के अंतर्विरोधों से वास्ता पड़ता है और ये दोनों ही विभिन्न घटनाओं के विकास पर निश्चित प्रभाव डालते हैं। आंतरिक अंतर्विरोध एक ही वस्तु या घटना के अंतर्निहित विरोधी पक्षों के बीच उत्पन्न होते हैं। बाहरी अंतर्विरोध एक विचाराधीन वस्तु या घटना के तथा अन्य वस्तु या घटना के बीच उत्पन्न होते हैं।

आंतरिक अंतर्विरोध ( internal contradiction ) किसी भी वस्तु या घटना के विकास में निर्णायक महत्त्व के होते हैं, क्योंकि वे उसकी अंतर्वस्तु ( content ) से जुड़े होते हैं और उसमें होनेवाले परिवर्तन तथा विकास का आधार होते हैं। वस्तु या घटना के आंतरिक अंतर्विरोध उसके सार व प्रकृति को परावर्तित ( reflect ) करते हैं, उद्‍घाटित करते हैं। बाहरी अंतर्विरोध ( external contradiction ) वस्तुओं और घटनाओं के अंतर्संबंधों और परस्पर निर्भरता को परावर्तित और उद्‍घाटित करते हैं। ये वस्तुओं और घटनाओं के विकास को बाहरी रूप से प्रभावित करते हैं और अक्सर आंतरिक अंतर्विरोधों के समाधान पर काफ़ी अधिक असर डालते हैं। इसलिए विभिन्न विकास-प्रक्रियाओं के अध्ययन में इन दोनों तरह के अंतर्विरोधों को ध्यान में रखा जाना चाहिए, साथ ही यह भी कि ‘आंतरिक’ और ‘बाहरी’ में अंतर्विरोधों का ऐसा विभाजन सापेक्ष ( relative ) है।

विकास की प्रक्रिया पर बाहरी और आंतरिक दोनों तरह के अंतर्विरोधों का निश्चित ही प्रभाव पड़ता तो है, किंतु विकास का मुख्य स्रोत ( main source ) आंतरिक अंतर्विरोधों के समाधान की प्रक्रिया है। द्वंद्ववाद की इस प्रस्थापना ( proposition ) का बहुत अधिक व्यावहारिक महत्त्व है : जब हमें किसी समस्या का सामना होता है, तो हमें पहले आंतरिक अंतर्विरोधों को प्रकाश में लाना चाहिए और उनके समाधान का सबसे अधिक सही तरीक़ा खोजना चाहिए। साथ ही हमें याद रखना चाहिए कि आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोध ख़ुद भी विरोधियों के पारस्परिक अंतर्वेधन ( interpenetration ) तथा रूपातंरण ( transformation ) की द्वंद्वात्मकता से संनियमित ( governed ) होते हैं। जो अंतर्विरोध एक स्थिति में बाहरी होते हैं, वे दूसरी स्थिति में आंतरिक हो सकते हैं। मसलन, दो विश्व प्रणालियों के बीच अंतर्विरोध इनमें से प्रत्येक के लिए बाह्य हैं, परंतु सारी मनुष्यजाति के लिए वे आंतरिक हैं। या और सरलता से समझें तो एक परिवार के सदस्यों के बीच अंतर्विरोध, एक दूसरे के सापेक्ष बाहरी हैं, परंतु उस परिवार के लिए वे आंतरिक अंतर्विरोध हैं।

बुनियादी और गैरबुनियादी अंतर्विरोध

आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोधों के अलावा बुनियादी और ग़ैरबुनियादी व्याघातों के बीच भी भेद ( distinguish ) किया जाना चाहिए। जो आंतरिक अंतर्विरोध किसी वस्तु अथवा घटना के विकास में निर्णायक भूमिका अदा करते है और जिनका समाधान मूलतः नयी घटनाओं व प्रक्रियाओं की उत्पत्ति की ओर ले जाता है, उन्हें मूलभूत, बुनियादी अंतर्विरोध ( basic contradiction ) कहते हैं। यह उस वस्तु या घटना के सार से संबद्ध होता है। इनके सिवा अन्य सारे अंतर्विरोध गौण और ग़ैरबुनियादी ( non-basic ) होते हैं।

मसलन, पूंजीवाद का बुनियादी अंतर्विरोध उत्पादन की सामाजिक प्रकृति और विनियोजन के निजी पूंजीवादी रूप के बीच होता है। उत्पादन की प्रकृति तो सामाजिक होती है, परंतु उसका नियोजन और वितरण निजी मुनाफ़ा केन्द्रित प्रणाली से होता है। यह बुनियादी अंतर्विरोध ही, पूंजीवाद के अन्य सभी प्रमुख अंतर्विरोधों का निर्धारण करता है।

बुनियादी अंतर्विरोध संबंधी प्रस्थापना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसका व्यावहारिक महत्त्व इस प्रकार है कि जब हमें किन्हीं सामाजिक-राजनीतिक, उत्पादकीय, वैचारिक या वैज्ञानिक-संज्ञानात्मक समस्याओं पर विचार करना होता है, उन्हें हल करना होता है, तो सबसे पहले अध्ययनाधीन प्रक्रिया के बुनियादी अंतर्विरोधों का पता लगाना जरूरी है। इनको निश्चित करने के बाद ही हम उन्हें सुलझाने के साधनों तथा रूपों के चयन में सटीकता ( accuracy ) पैदा कर सकते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय