सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत व्यष्टिक और सामाजिक चेतना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता के बारे में

(On the Relative Independence of Social Consciousness)

सामाजिक चेतना में होने वाले सारे परिवर्तनों तथा स्वयं उसके विकास की प्रक्रिया का निर्धारण अंततः सामाजिक सत्व (social being) में होने वाले परिवर्तनों से होता है। परंतु यह सोचना ग़लत होगा कि यह चेतना, हमेशा सामाजिक सत्व से पीछे (lags behind) होती है। राजनीतिक चेतना, नैतिकता, कलात्मक चेतना, धर्म और दर्शन लोगों की भौतिक यथार्थता (material reality), वर्ग संघर्ष (class struggle), विभिन्न घटनाओं, शनैः शनैः होनेवाले तथा क्रांतिकारी परिवर्तनों को एक दर्पण की तरह निष्क्रिय ढंग से परावर्तित (reflect) नहीं करते, बल्कि कुछ आदर्शों (ideals), मानकों (norms), मानदंडों (standards) ,व्यवहार के क़ायदों की रचना भी करते हैं और सामाजिक जीवन के संगठन की एक अधिक वांछित (desirable), वरेण्य (preferable) छवि का विकास भी करते हैं। सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता और तथाकथित पूर्वानुमानिक परावर्तन (anticipatory reflection) की उसकी क्षमता इसी में व्यक्त होती है।

अतीत काल की साहित्यिक कृतियों, दार्शनिकों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों तथा राजनीतिक चिंतकों की रचनाओं में हमें इस आशय की अनेक दलीलें मिलती हैं कि तर्कबुद्धिसम्मत (rational) न्यायोचित समाज कैसा होना चाहिए, राजकीय प्रशासन का संगठन कैसे किया जाना चाहिए, सबसे ज़्यादा न्यायोचित क़ानून और नैतिकता के सर्वाधिक मानवीय मानक कैसे होने चाहिए। बेशक, ये सारी दलीलें न सिर्फ सार्विक (universal), बल्कि सर्वथा निश्चित वर्गीय-सामूहिक आदर्शों, न्याय और मानवता की धारणाओं को भी परावर्तित करती है। इसके साथ ही वह इतिहासतः सीमित होती हैं। परंतु अतीतकाल के चिंतकों ने भविष्य में देखने के जो प्रयत्न किए और उन्होंने सामाजिक जीवन, आदर्शों तथा मानकों के जिन बिंबो की रचना की, व्यवहार में उन्हें जिस सामाजिक सत्व से वास्ता पड़ा और जो युग की सामाजिक चेतना में परावर्तित हुआ था – उस सब ने उनकी दलीलों की सामग्री का काम दिया। इसलिए पूर्वानुमानिक परावर्तन भी अंततोगत्वा सामाजिक सत्व से निर्धारित होता है।

पूर्ववर्ती आर्थिक-सामाजिक विरचनाओं (socio-economic formations) के स्वतःस्फूर्त विकास के यु्गों में सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता अक्सर विभिन्न प्रकार के यूटोपिया (utopias) बनाने में व्यक्त होती थी। न्यायोचित, तर्कबुद्धिसम्मत, मानवीय संगठनवाले ऐसे भावी समाज से संबंधित विचारों, बिंबों तथा सैद्धांतिक परावर्तनों को यूटोपियाई कहते हैं, जिसका वस्तुगत (objective) वैज्ञानिक आधार नहीं होता। यूटोपियाओं के रचयिता अक्सर जैसे चिंतक होते थे, जो सर्वाधिक उत्पीड़ित और शोषित वर्गों के हितों तथा मनोदशाओं को व्यक्त करते थे, हालांकि वे स्वयं कभी-कभी विशेषाधिकारप्राप्त वर्गों या सामाजिक श्रेणियों के लोग होते थे। इस प्रकार के दृष्टिकोणों का यह नाम १६वीं सदी के प्रारंभ के अंग्रेज़ राजनीतिज्ञ टॉमस मूर की ‘यूटोपिया’ शीर्षक पुस्तक से पड़ा। उसमें एक ऐसे काल्पनिक समाजवादी समाज का चित्रण था जिसमें सार्विक समानता, न्याय और समृद्धि का बोलबाला था।

१८वीं और १९वीं सदियों के दौरान मेहनतकशों के शोषण बढ़ने के साथ-साथ यूटोपियाई समाजवाद का बहुत प्रसार हो गया था। मार्क्स और एंगेल्स ने समाज के समाजवादी पुनर्संगठन तथा पुनर्रचना की आवश्यकता को प्रमाणित करने तथा, मुख्यतया, पूंजीवाद की तीखी आलोचना करने के प्रयत्नों के लिए १९वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों के यूटोपियाई समाजवाद के रचयिताओं फ़ुरिये, ओवेन और सेंट-सीमोन का बहुत ऊंचा मूल्यांकन किया। इसके साथ ही मार्क्स और एंगेल्स ने इस क़िस्म के समाजवाद के अवैज्ञानिक स्वभाव पर ज़ोर भी दिया। यह कल्पना प्रधान (imaginative), अतिकाल्पनिक (fantastic), अभिलाषा जनित समाजवाद था। उस के रचयिताओं ने सुझाया कि नया समाज तीव्र वर्ग संघर्ष के ज़रिये नहीं, बल्कि नैतिक स्वपूर्णता (self-perfection), परहितकारिता (benevolent), परोपकारी क्रियाकलाप तथा प्रबोधन (enlightenment) के द्वारा निर्मित होगा। ऐसी परियोजनाओं का अवैज्ञानिक तथा यूटोपियाई स्वभाव, उन्हें वास्तविक बनाने के अलग-अलग प्रयत्नों (मसलन, रॉबर्ट ओवेन द्वारा) की घोर विफलता से प्रमाणित हो गया।

सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता, वैज्ञानिक समाजवाद (scientific socialism) के सिद्धांत की रचना में विशेष स्पष्टता से व्यक्त हुई। मार्क्स तथा एंगेल्स द्वारा रचित तथा कालांतर में लेनिन द्वारा विकसित यह सिद्धांत, पूंजीवाद के सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों का सीधा सरल परावर्तन नहीं था, बल्कि सामाजिक सत्व के सच्चे वैज्ञानिक पूर्वानुमानिक परावर्तन का पहला उदाहरण था। इसने समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण (revolutionary transformation), निजी स्वामित्व के उन्मूलन (abolition of private property) तथा मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के ख़ात्मे की आवश्यकता को वैज्ञानिक ढंग से प्रमाणित ही नहीं किया, बल्कि ऐसे रूपांतरण के वास्तविक मार्गों तथा विधियों का संकेत भी दिया। पूर्वानुमानिक परावर्तन तथा संपूर्ण सामाजिक चेतना की सापेक्ष स्वाधीनता की स्वयं संभावना (possibility) का मूल क्या है?

मुद्दा यह है कि सामाजिक सत्व, प्रदत्त क्षण पर सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाओं की समग्रता (aggregate) मात्र नहीं है। यह कोई संघनित और अपरिवर्तनीय तत्व नहीं है। यह अनवरत विकास की अवस्था में होता है और इसमें विविध प्रवृतियां निरंतर पैदा होती तथा बढ़ती रहती हैं। फलतः, इसमें वस्तुगत नियमितताएं (objective patterns) होती हैं जो इन प्रवृतियों, प्रक्रियाओं और परिवर्तनों का नियमन (govern) करती हैं। इन प्रवृतियों तथा नियमितताओं को परावर्तित करके सामाजिक चेतना भविष्य में झांकने की, यानी आगे बढ़ निकलने की क्षमता अर्जित कर लेती है। इसकी सापेक्ष स्वाधीनता इसी में व्यक्त होती है।

चूंकि सामाजिक सत्व, स्वयं अंतर्विरोधी (contradictory) होता है और विभिन्न संघर्षरत वैचारिकियों (ideologies) के अंदर भिन्न-भिन्न वर्गीय स्थितियों से परावर्तित होता है, इसलिए सामाजिक तत्व का परावर्तन भी अंतर्विरोधी सिद्ध होता है। इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना (materialist conception) की रचना तक, यह पूर्वानुमानिक परावर्तन मूल रूप से अवैज्ञानिक होता था और कुछ सत्य अनुमानों के बावजूद इस में यूटोपियाई लक्षण विद्यमान रहते थे। इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना का निरूपण करनेवाले ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन की रचना से सामाजिक विकास की वस्तुगत प्रवृतियों तथा नियमसंगतियों की विशुद्ध वैज्ञानिक समझ की संभावना पहली बार प्रकट हुई।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: समाजवाद के अंतर्गत आत्मगत कारक की भूमिका | समय के साये में

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