कलात्मक चेतना और कला – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में धर्म पर चर्चा की थी, इस बार हम कलात्मक चेतना और कला को समझने की कोशिश शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कलात्मक चेतना और कला – १
( Artistic Consciousness and Art – 1 )

कला, मानव क्रियाकलाप का एक सबसे पुराना और सर्वाधिक सार्विक (universal) रूप है। `कला‘ (art) पद केवल क्रिया का ही नहीं, बल्कि उसके परिणाम का, अर्थात कलाकृति का द्योतक भी है। कला क्या है? समाज के, और अलग-अलग लोगों के जीवन में कला की भूमिका (role) क्या है?

लोग अपने दैनिक उत्पादक क्रियाकलाप (production activity) में अपनी भौतिक आवश्यकताओं (material wants) की पूर्ति के लिए ही वस्तुओं का ( भोजन मकान आदि ) ही निर्माण नहीं करते, बल्कि उन्हें जितना संभव हो, उतना ही निर्दोष (perfect) तथा सोद्देश्य (purposeful) भी बनाते हैं। वस्तुएं जितनी अच्छी और उपयुक्त हों, उन्हें बनाने के लिए उतनी ही अधिक कुशलता (skill) की ज़रूरत होती है, उत्पादन प्रक्रिया का स्वभाव जितना ज़्यादा रचनात्मक (creative) हो, उसके सर्जक (creator) से उतनी ही अधिक प्रतिभा (talent) तथा कल्पनाशीलता (inventiveness) की अपेक्षा की जाती है। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य की तर्कबुद्धि (reasoning) और संकल्प (will), उसकी विशिष्ट मानवीय शक्ति परिष्कृत हो गये। मनुष्य, प्रकृति से जितना पृथक हुआ और उसने अपने को उससे जितना ऊपर उठा लिया, उतना ही उसने अपने को और अपनी कुशलताओं, ज्ञान तथा व्यवहार के मानकों को परिष्कृत बनाया और फलत:, स्वयं को एक सामाजिक प्राणी के रूप में ढाल लिया।

मनुष्य की यह सारी विशेषताएं और, सर्वोपरि, उसका सारा सामाजिक सार (social essence), उसके ज्ञान का बल, कल्पना और संस्कृति की शक्ति और साथ ही क्रियाकलाप का परिष्करण (perfection) और पारंगति (mastery) उन वस्तुओं में, संरचनाओं में, औज़ारों में और सुधरी हुई, रूपांतरित (transformed), मानवीकृत प्रकृति में मूर्त (embodied) हुए जिन्हें उसने बनाया। यह मूर्तता (embodiment) जितनी ज्यादा और पूर्ण होती है, उसके श्रम तथा उसकी रचनात्मक क्रिया की भौतिक वस्तुएं उतनी ही उत्कृष्ट और सुंदर होती हैं। इतिहासाश्रित श्रम विभाजन के ज़रिये उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन, सुंदर वस्तुओं के उत्पादन से पृथक हो गया। क्रियाकलाप के एक विशेष रूप में कला, ‘सुंदर का उत्पादन’ भौतिक उत्पादन से पृथक हो गयी। लोगों के एक ऐसे विशेष समूह का उद्भव हुआ, जिनके लिए कला व्यवसाय (profession) बन गई – कलाकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, लेखक, कवि, संगीतज्ञ, अभिनेता तथा अन्य।

वर्ग समाज (class society) में, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant classes) कला के विशेष उपभोक्ता होते हैं। वे कलाकारों, लेखकों और अभिनेताओं को वित्तीय सहायता देते हैं, उनका रचनात्मक श्रम ख़रीदते हैं और साथ ही उन्हें निश्चित वर्गों के उद्देश्यों की सेवा करने तथा एक विश्वदृष्टिकोण और वैचारिकी का सचेतन या अचेतन वाहक बनने को बाध्य करते हैं। परंतु यह सोचना गलत होगा की कला, यानी कलात्मक क्रियाकलाप भौतिक उत्पादन से पूर्ण तरह अलग हैं। यहां तक कि शोषक समाजों में भी कारीगरों, दस्तकारों और किसानों के कृतित्व में पूर्णता के लिए प्रयत्न निहित होते हैं तथा उसमें रचनात्मक मानवीय तत्व अभिव्यक्त होते हैं। जिस सीमा तक काम में स्वतंत्रता तथा रचनात्मकता के तत्व होते हैं, उस सीमा तक उसमें कलात्मक गुण भी होते हैं। काम जितना स्वतंत्र और रचनात्मक होता है, वह कला के उतने ही निकट होता है।

श्रम के आधार पर विकसित होने वाले सारे मानवीय क्रियाकलाप की सब अभिव्यक्तियों में कलात्मक क्रियाकलाप के तत्व निहित होते हैं। मनुष्य का संपूर्ण सामाजिक सत्व (social being), जो इस क्रियाकलाप का एक उत्पाद है, कमोबेश रचनात्मक, कलात्मक तत्वों से व्याप्त (permeated) होता है और यह भी सामाजिक चेतना के, अर्थात कलात्मक चेतना के एक विशेष रूप में परिवर्तित होता है, जो कलात्मक बिंबों की एक प्रणाली मैं हमारे गिर्द की यथार्थता (reality) को परावर्तित (reflect) करती है। ये बिंब, व्यष्टिक और सामान्य (individual and general) को, प्रकृति और समाज की लाक्षणिक विशेषताओं, अनुगुणों (properties) और अवगुणों (peculiarities) तथा मनुष्य के आंतरिक जगत को परावर्तित करते हैं। इसके उपरांत उन्हें तदनुरूप (corresponding) भौतिक वस्तुओं व प्रक्रियाओं, संगीत की रचनाओं, चित्रों, मूर्तियों, वास्तुकला संरचनाओं, रंगमंचीय प्रस्तुतियों तथा फ़िल्मों में मूर्त रूप दिया जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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सामाजिक चेतना के रूप में धर्म

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत आर्थिक चेतना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना के रूप में धर्म को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना के रूप में धर्म
(Religion as a form of Social Consciousness)

धर्म, सामाजिक चेतना का एक रुप है जिसने मानव जाति के आत्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया है। कुछ ऐतिहासिक अवधियों में यह ऐसी चेतना का सार्विक (universal) रूप था। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह हमेशा विद्यमान था। आधुनिक विज्ञान इसका प्रारंभ आदिम-सामुदायिक समाज के उत्तरकाल को मानता है। तब परिवेशीय जगत की घटनाओं तथा मनुष्य के क्रियाकलाप को समझने और उनका स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता पैदा हो गई थी। समुचित ज्ञान के अभाव तथा आर्थिक व सामाजिक विकास के निम्न स्तर की अवस्था में लोग अपने परिवेशीय जगत का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं दे सकते थे और उन्होंने वस्तुतः स्वयं के साथ सादृश्य (analogy) के अनुसार उसका स्पष्टीकरण देना शुरू कर दिया। उन्होंने उसे अलौकिक अनुगुण (supernatural properties) प्रदान किए और उस पर रहस्यमय आत्मिक शक्तियों को आरोपित (ascribed) कर दिया। अपने सम्मुख विद्यमान प्राकृतिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में कमजोर और निस्सहाय होने के कारण प्राचीन मानव ने प्राकृतिक घटनाओं, यानी वर्षा, तड़ित, वज्रघोष, नदियों, जलधाराओं, वृक्षों, पत्थरों, आदि का दैवीकरण (deification) कर दिया। वह अलग-अलग वस्तुओं की पूजा करता, चापलूसी करता तथा उनकी संरक्षता (patronage) हासिल करने का प्रयत्न करता। धीरे-धीरे ऐसी धारणाएं बनीं जिन्होंने प्रकृति की घटनाओं पर मनुष्य की ही जैसी आत्मा तथा संकल्प का आरोपण कर दिया, किंतु वे मनुष्य की आत्मा व संकल्प से अधिक भयावह, रहस्यमय और अबोधगम्य (incomprehensible) थे।

वर्ग समाज (class society) में प्राकृतिक शक्तियों के साथ ही साथ, वर्गीय शोषण की इनसे भी अधिक पराई (alien), निर्मम (remorseless) शक्तियों ने मनुष्य का विरोध करना शुरू कर दिया। मनुष्य की दुर्बलता तथा निस्सहायता (helplessness) की घोषणा करते तथा उसे पवित्र बताते हुए धर्म ने इन शक्तियों के सम्मुख दीनता (humility) तथा अधीनता का आह्वान किया। इस प्रकार उसे प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) की वैचारिकी के फैलाव, दृढ़ीकरण तथा दूसरों के मन में पैठाने का काम करनेवाली चेतना के एक रूप में परिणत कर दिया गया। प्रतिरोधी वर्ग विरचनाओं (antagonistic class formations) की दशाओं में बौद्ध मत, इसाई धर्म तथा इस्लाम जैसे एकेश्वरीय धर्म व्यापक रूप से फैल गये।

धर्म का संगठनकारी रूप (organised), यानी धार्मिक पंथ को बनाए रखने, धार्मिकता को फैलाने, धर्मानुयायियों को एक सूत्र में बांधने का सामाजिक संस्थान, एक धार्मिक केन्द्र, जैसे कि चर्च, होता है। भिन्न-भिन्न ठोस दशाओं में, विकास की विभिन्न अवस्थाओं पर भिन्न-भिन्न समाजों के इतिहास के दौरान धर्म और धार्मिक केन्द्रों की सामाजिक भूमिका बदली है। प्रभावी धार्मिक केंद्रों ने, कमोबेश (more or less) सीमा तक, उन वर्गों के हितों की सेवा की है, जिनके हाथों में राजकीय और आर्थिक सत्ता थी।

किंतु सामाजिक जीवन के गहन अंतर्विरोधी (contradictory) स्वभाव तथा परिवर्तनशीलता की वजह से अक्सर ऐसा हुआ कि कुछ धार्मिक धाराओं ने (तथा उनके अनुरूप धार्मिक संगठनों ने), तत्समय प्रभावी धार्मिक केंद्रों तथा धर्म का विरोध किया। अक्सर ऐसा हुआ कि ऐसी धाराओं ने उत्पीड़ितों या उन समूहों व वर्गों के हितों को अभिव्यक्ति दी जो सत्ता के लिए और मौजूदा सामाजिक प्रणाली में परिवर्तन के लिए लड़ रहे थे, किंतु कुछ कारणों से वे स्वयं अपने हितों को और सार्वजनिक मामलों की वस्तुगत अवस्था (objective state) को वैज्ञानिक ढंग से जानने-समझने में असमर्थ थे। कुछ राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों या शोषण के विरुद्ध लड़नेवालों ने, अपने क्रांतिकारी व मुक्तिकारी आकांक्षाओं को धार्मिक रंग दे दिया और देते हैं। ऐसे मामलों में वर्ग या मुक्ति संघर्ष, और उसके अनुरूप वैचारिकी, एक उप धर्म की शक्ल में या वैकल्पिक धार्मिक केंद्र के लिए आंदोलन में प्रकट हुए और उन्होंने प्रभावी धार्मिक केंद्रों तथा धर्म के ख़िलाफ़ विरोध का रूप ग्रहण किया और अंतःकरण (conscience) की स्वतंत्रता के लिए लड़ना शुरू कर दिया। धर्म के वेश में राजनीतिक विरोध का प्रकट होना ऐसी घटना है, जो सभी जनगण के विकास की किसी एक अवस्था की विशेषता रही है

आधुनिक दुनिया में, विकट सामाजिक अंतर्विरोधों से भरी दुनिया में, धर्म और धार्मिक संगठन भिन्न भूमिका अदा कर सकते हैं। मार्क्सवादी विचारों के प्रवक्ता धर्म के जबरिया मूलोच्छेदन (forcible extirpation) का आह्वान नहीं करते, जैसा कि उसके विरोधी उस पर आरोप लगाते हैं, बल्कि उन सामाजिक-धार्मिक नेताओं तथा धाराओं के साथ बातचीत का आह्वान करते हैं, जो तापनाभिकीय युद्ध के ख़तरे के ख़िलाफ़ शांति के संघर्ष में, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों में और निरंकुशता तथा उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में, सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा नवउपनिवेशवाद से छुटकारा पाने के संघर्ष में भाग ले रहे हैं। वे एक मुख्य अधिकार के रूप में अंतःकरण की स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं। समसामयिक समाजवादी समाजों में प्रत्येक नागरिक अनीश्वरवादी हो सकता है या धर्म पर विश्वास रख सकता है धर्म के आधार पर किसी प्रकार का वैरभाव या उत्पीड़न वर्जित है और धार्मिक केंद्र राज्य से पृथक होते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम