क़ानूनी चेतना और क़ानून

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत राजनीतिक चेतना और राजनीति पर चर्चा की थी, इस बार हम क़ानूनी चेतना और क़ानून को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क़ानूनी चेतना और क़ानून
( Legal Consciousness and Law )

क़ानूनी चेतना और क़ानून, समाज के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। लोग सामाजिक मामलों में कुछ क़ायदों (rules) और व्यवहार के मानकों (norms) का पालन करते हैं, ये क़ायदे इतिहासाश्रित होते हैं और समाज के विकास के साथ परिवर्तित होते हैं। वर्गों (classes) के उद्‍भव के साथ मानकों और क़ायदों की एक विशेष प्रणाली ( साथ ही उन्हें तोड़ने पर दंड देने की प्रणाली भी ) बनी, जो प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) के लिए उपयोगी थी और जिसे राज्य (state) द्वारा अपनाया तथा स्वीकार किया गया था। ये मानक और क़ायदे ही क़ानून (law) हैं। फलतः क़ानून हमेशा अस्तित्व में नहीं था। यह केवल वर्ग समाज में बना और राज्य के क्रियाकलाप, राजनीति तथा राजनीतिक संघर्ष के साथ घनिष्ठता से जुड़ा था और जुड़ा है।

क़ानून, ऐसी विधियों (statutes, legislation) की राज्य द्वारा स्वीकृत प्रणाली है जो प्रदत्त (given) समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों के संकल्प (will) को व्यक्त करती है। राज्यत्व (statehood) के विकास के साथ ही साथ ऐसे विशेष निकाय (bodies) या एजेंसियां बनी, जो क़ानूनों का प्रारूप (draft) बनातीं तथा उन्हें जारी करतीं ( विधि निकाय legislative bodies ), उनके अनुपालन पर नज़र रखतीं ( दंडाधिकारी ), क़ानूनों के उल्लंघनों के लिए दंड देतीं ( अदालतें, सार्वजनिक व्यवस्था निकाय ) और क़ानून द्वारा स्वीकृत सार्वजनिक व्यवस्था (public order) को बनाये रखतीं। ये सारे संस्थान (institutions) और उनसे संबंधित क़ानूनी क्रियाकलाप तथा स्वयं क़ानून, सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप में परावर्तित (reflect) तथा अनुबोधित (comprehended) होते हैं, जिसे क़ानूनी चेतना कहा जाता है। यह क़ानूनी चेतना, ‘न्याय’ (justice), ‘वैधता’ (legality), ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘अपराध’, तथा ‘दंड’ जैसी संकल्पनाओं (concepts) और विभिन्न क़ानूनी दृष्टिकोणों तथा सिद्धांतों को विकसित करती है, जिनके द्वारा, प्रदत्त समाज में प्रचलित न्याय, वैधता, व्यवस्था, आदि की धारणाओं (notions) के अनुसार, क़ानूनी मानकों तथा क़ानूनों को प्रमाणित किया जाता है।

क़ानूनी चेतना, क़ानून तथा क़ानूनी संस्थान, तदनुरूप (corresponding) सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं (socio-economic formations) की अधिरचना (superstructure) के अंग हैं और उनके आधार को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

प्रभुत्वशाली वर्ग के विचारकों ने क़ानून को हमेशा एक ऐसी चीज़ के रूप में पेश करने का प्रयत्न किया है, जो मानो शाश्वत (eternal) और स्थायी (stable) हो। उनमें से कुछ ने, यह दावा किया कि यह मनुष्य के अपरिवर्तनीय सार (immutable essence) को व्यक्त करता है। अन्य ने दैवी मूल (divine origin) तथा पवित्र ग्रंथों के प्राधिकार (authority) को अपनी दलीलों का आधार बनाया, जबकि कुछ अन्य ने क़ानून को जन-इच्छा की एक ऐसी अभिव्यक्ति के रूप में देखा, जो हमेशा अपरिवर्तनीय तथा स्थिर है। क्या यह सत्य है ?

सबसे पहले इस बात की ओर ध्यान दिलाया जाना चाहिए कि ये दृष्टिकोण वस्तुगत यथार्थता (objective reality) और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। मसलन, हम जानते हैं कि बहुत-से जनगण, जिनका ऐतिहासिक विकास रुक गया था, वर्ग विभाजन (class division) से बचते थे। उनके यहां कोई राजकीय प्राधिकारी नहीं थे और फलतः कोई क़ानून नहीं था। अपने दैनिक जीवन में वे नैतिकता, रीति-रिवाज तथा परंपरा के मानकों के अनुसार चलते थे। हम यह भी जानते हैं कि नयाय, वैधता, आदि की घारणाएं युग प्रति युग बदलती रही हैं। दास-प्रथावाले समाज में दासों की ख़रीद-फ़रोख़्त न्यायोचित और वैध कर्म माना जाता था। आधुनिक समाज में मनुष्यों की ख़रीद-फ़रोख़्त क़ानून और न्याय का घोर उल्लंघन माना जायेगा। सामंती समाज में क़ानून का स्वभाव लोगों की श्रेणीगत हैसियत से संबंधित था। एक भूदास, स्वतंत्र किसान या शहरी की हत्या के लिए जो दंड दिया जाता, वह कुलीन वंश के व्यक्ति की हत्या के लिए दंड से बहुत कम होता था। एक ही श्रेणी के अपराध के लिए, अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग-अलग दंड विधान थे। इस तरह सामंती क़ानून, राजाओं और कुलीनों-भद्रजनों के प्राधिकार की रक्षा करता था। फलतः प्रत्येक एतिहासिक युग में क़ानूनी चेतना और क़ानून एक निश्चित सामाजिक सत्व (social being) के आधार पर उपजते और उसे परावर्तित करते थे और इसी कारण से उस पर एक सक्रिय प्रतिपुष्टिकारी (active feedback) प्रभाव डाल सकते थे।

पूंजीवादी व्यवस्था में क़ानून की एक लाक्षणिक विशेषता इसकी औपचारिकता (formality) है, जो इस तथ्य में निहित है कि यह क़ानून के सामने सारे नागरिकों की समानता, सभा, प्रदर्शन तथा निवास परिवर्तन की स्वतंत्रता, व्यक्ति की अनुल्लंघनीयता (inviolability) तथा अधिकांश जनता को मताधिकार देने, आदि की घोषणा तो करता है किंतु उनकी किसी भी तरह से गारंटी नहीं करता और घोषित ‘अधिकारों’ तथा ‘स्वतंत्रताओं’ के उपयोग की भी गारंटी नहीं देता है। अमीर और ग़रीबों में विभाजित समाज में, जहां अधिकतर आबादी बेरोज़गार और बेघर हैं, वहां वास्तविक समानता कैसे हो सकती है? यही कारण है कि पूंजीवादी क़ानून संकीर्ण और औपचारिक हैं। किंतु पूंजीवादी लोकतंत्र में इस सीमित क़ानून को भी मज़दूरों के हित में और उनके अपने ही क़ानूनी राजनीतिक तथा ट्रेड-यूनियन संगठनों के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसीलिए, जब वर्ग-संघर्ष (class struggle) तीक्ष्ण होता है और एक क्रांतिकारी स्थिति परिपक्व होती है, पूंजीवादी वर्ग एक फासीवादी (fascist) प्रकार की सैन्य-पुलिस तानाशाही स्थापित करने का प्रयास करता है, और इस तरह वह स्वयं ही पूंजीवादी-लोकतांत्रिक क़ानूनों तथा क़ानूनी चेतना को अस्वीकार कर देता है, स्थगित कर देता है। ऐसी परिस्थितियों में, लोकतांत्रिक अधिकारों (democratic rights) के लिए लड़ाई, श्रमिक वर्ग और सभी श्रमजीवी जनता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य बन जाता है

समाजवादी समाज के उद्‍भव के साथ क़ानून और क़ानूनी चेतना में मूलभूत परिवर्तन होते हैं। क़ानून निर्माण कार्य, मुख्यतः समाजवादी संपदा की रक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, व्यक्ति के अधिकारों और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता की रक्षा से संबंधित होता है। किंतु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि नयी क़ानूनी व्यवस्था द्वारा घोषित लक्ष्यों की उपलब्धि अपने आप हो जायेगी। समाजवादी सामाजिक संबंधों का निर्माण एक लंबी, जटिल और द्वंद्वात्मकतः अंतर्विरोधी (dialectically contradictory) प्रक्रिया है। अतः नैतिक व क़ानूनी उसूलों (principles) की संबद्धता (coherence) और व्यावहारिक अविभाज्यता (practical inseparability) की समझ, नूतन चिंतन की एक प्रमुख उपलब्धि और उसकी दार्शनिक गहराई तथा परिपक्वता (maturity) का प्रमाण हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता | समय के साये में

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