आर्थिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता पर चर्चा की थी, इस बार हम आर्थिक चेतना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आर्थिक चेतना

( Economic Consciousness )

मानव समाज की उत्पत्ति के समय से ही लोग भौतिक उत्पादन (material production) तथा आर्थिक क्रियाकलाप से संबंधित ज्ञान का संचयन (accumulation), विकास तथा परिष्करण (perfecting) करते आ रहे हैं। यह ज्ञान, भौतिक संपदा (wealth) का उत्पादन तथा वितरण करने की प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण पहलू को परावर्तित करता है और उत्पादन तथा आर्थिक क्रियाकलाप के संगठन व प्रबंध में लागू किया जाता है, सामाजिक चेतना का एक विशेष रूप, यानी आर्थिक चेतना है। वर्ग समाज (class society) में यह चेतना एक सुस्पष्ट वर्गीय स्वरूप (class character) को व्यक्त करती है और वैचारिक संघर्ष तथा क़ानूनी, राजनीतिक और नैतिक चेतना के साथ अविच्छेद्य (inextricably) रूप से जुड़ी होती है।

प्राचीन काल के महानतम चिंतक अरस्तु का विचार था कि दास मात्र बोलने वाले औजार हैं। श्रम, स्वतंत्र लोगों की नहीं, दासों की नियति है। अरस्तु आर्थिक क्रियाकलाप के महत्व को भली भांति समझते थे और उन्होंने मुद्रा के कार्य, आदि पर विचार किया था। पूंजीवाद के युग में आर्थिक चेतना विशेष तेज़ी से विकसित होने लगी थी। राजनीतिक अर्थशास्त्र – आर्थिक क्रियाकलाप, उत्पादन तथा प्रबंध के विज्ञान – के संस्थापकों, एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो तथा अन्य ने मूल्य के श्रम सिद्धांत का विकास किया, जिसका मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन ने ऊंचा मूल्यांकन किया था। लेनिन ने बताया कि इन अर्थशास्त्रियों के दृष्टिकोण, आलोचनात्मक अध्ययन के बाद मार्क्सवाद का एक स्रोत बन गये। परंतु प्रतिरोधी विरचनाओं (antagonistic formations) में अर्थशास्त्र पर जो विचार बने वे नियमतः प्रभुत्वशाली वर्गों (dominant classes) के दृष्टिकोण से बने थे। उनमें निजी स्वामित्व (private property) की भूमिका को अतिरंजित (exaggerated) किया गया और उसे किसी भी समाज का शाश्वत (eternal), आवश्यक और पवित्र आधार माना गया। पूंजीवादी समाज में, पूंजीवादी आर्थिक चेतना मेहनतकशों को शोषण के अंतर्गत लाने और उनकी वर्ग चेतना को अस्त-व्यस्त करने का एक सरल उपकरण है। पूंजीवादी आर्थिक चेतना, निजी स्वामित्व तथा संपत्ति के व्यक्तिगत उपार्जन (acquisition) को सारे आर्थिक क्रियाकलाप का आधार मानती है, चाहे उनके कारण प्रकृति का विनाश हो जाये और मेहनतकशों पर मुसीबत के पहाड़ टूट पड़ें।

समाजवादी समाज में आर्थिक चेतना का स्वरूप नितांत भिन्न होता है। सामाजिक चेतना के अन्य रूपों की ही तरह यह भी सामाजिक सत्व (social being) तथा उसमें होने वाले परिवर्तनों को परावर्तित (reflect) करती है। इसके अलावा, समाजवादी आर्थिक चेतना मुख्य रूप से समाजवादी अर्थव्यवस्था और उसके संगठन व प्रबंध के रूपों के विकास के प्रतिमानों (patterns) का एक परावर्तन तथा बोध है। क्योंकि मनुष्य, मेहनतकश लोग समाज की मुख्य उत्पादक शक्ति हैं, इसलिए उनकी आर्थिक चेतना का चौतरफ़ा विकास सारी उत्पादक शक्तियों के विकास में एक सबल कारक है।

समसामयिक समाजवादी समाजों की अर्थव्यवस्था की संरचना अत्यंत जटिल है। समाज के वास्ते अधिकांश उत्पादों का उत्पादन करने वाले राजकीय उद्यमों (enterprises) के अलावा सहकारी उद्यम और व्यक्तिगत स्वरोज़गार का अस्तित्व भी है। इनके अतिरिक्त देशी तथा विदेशी फर्मों द्वारा स्थापित मिश्रित उद्यम भी हैं। आर्थिक समीचीनता कि सबसे महत्वपूर्ण कसौटी उद्यम की लाभप्रदता, शीघ्रता से पुनर्गठित (reorganise) होने, विज्ञान व तकनीकि की नवीनतम उपलब्धियों को काम में लाने और श्रम की उत्पादकता को लगातार बढ़ाने तथा संसाधनों की बचत करने वाली ऐसी आधुनिकतम विज्ञान-सघन टेक्नोलॉजी का समावेश करने की उसकी क्षमता है, जिससे ऐसे उत्पादों व वस्तुओं का उत्पादन करना संभव हो जाता है, जो सर्वाधिक विविधतापूर्ण आवश्यकताओं और मांगों को संतुष्ट करना संभव बनाती है। आर्थिक कार्य, अलग-अलग उद्यमों, फ़र्मों, एसोशियेशनों और पूरे उद्योगों के प्रबंध तथा विकास के कामों का निर्णय, चंद व्यापारियों व प्रबंधकों की बजाय सारे मेहनतकशों द्वारा किया जाता है और समाजवादी जनवाद के आधार पर निबटाया जाता है। यहां प्रत्येक की प्रभावशालिता तथा महत्व, शेयरों के स्वामित्व से नहीं, बल्कि उसके अमुभव, ज्ञान तथा श्रम क्रियाकलाप में उसके योगदान से निर्धारित होते हैं।

दार्शनिक दृष्टिकोण से समाज के जीवन में, विशेषतः समाजवाद के अंतर्गत, आर्थिक चेतना तथा उसकी भूमिका की जांच इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि किसी अन्य के मुक़ाबले इसी में सामाजिक सत्व, समाज के आर्थिक आधार तथा उत्पादक शक्तियों पर सामाजिक चेतना के सक्रिय प्रभाव को अधिक अच्छी तरह से देखा जा सकता है। आर्थिक चेतना, वस्तुगत (objective) आर्थिक नियमों तथा सामाजिक-आर्थिक विकास की राह पर उत्पन्न होने वाले अंतर्विरोधों (contradictions) तथा कठिनाइयों को जितनी अधिक पूर्णता तथा यथार्थता (reality) और गहराई से परावर्तित करती है, यह प्रभाव उतना ही ज्यादा स्पष्ट और कारगर होता है तथा उनसे निबटने के साधन और अर्थव्यवस्था के सर्वाधिक द्रुत (rapid) व सामंजस्यपूर्ण (harmonious) विकास के तरीक़े खोजने में मदद देता है।

 


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सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत क़ानूनी चेतना और क़ानून पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता
(Morality as a form of Social Consciousness)

सामाजिक चेतना का एक और रूप ‘नैतिकता’ (morality) है जो क़ानून (law) तथा क़ानूनी चेतना (legal consciousness) के साथ घनिष्ठता के साथ जुड़ी है। नैतिकता क्या है ?

किसी भी व्यक्ति से पूछिये कि क्या झूठ बोलना, चोरी करना, कमज़ोर को सताना, ठगना या बड़े अधिकारियों की चापलूसी करना अच्छी बात है? उससे पूछिये कि क्या ग़द्दारी करना, दूसरे लोगों की कमाई खाना अच्छी बात है और कि क्या पाखंड, धृष्टता, लोभ तथा लोलुपता उचित है? व्यवहार, कर्म तथा चरित्र की इन विशेषताओं को अधिकांश लोग नकारात्मक, हानिकर तथा अत्यंत अवांछित (undesirable) मानते हैं। दूसरी तरफ़, उद्यमशीलता तथा अध्यवसाय (diligence), ईमानदारी, परोपकारिता, नम्रता, उदारता, मैत्रीपूर्णता, कर्तव्य के प्रति निष्ठा, देशभक्ति, समान उद्देश्य में दिलचस्पी, आदि को सकारात्मक कर्म तथा सद्‍गुण समझा जाता है। इस प्रकार के मूल्यांकन नैतिक माने जाते हैं और किसी भी समाज में, लोगों की हर समष्टि (collective) में विद्यमान नैतिक मूल्यों तथा व्यवहार के क़ायदों (rules) की प्रणाली के अंग हैं और इनकी उत्पत्ति मूलतः मानव समाज की रचना के दौरान हुई।

फलतः नैतिकता, लोगों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में एक दूसरे के, अपनी श्रम समष्टि के, वर्ग, राज्य और संपूर्ण समाज के प्रति उनके व्यवहार के क़ायदों, मानकों, मूल्यों और आदर्शों की एक प्रणाली है। क़ानून तथा क़ानूनी चेतना और नैतिकता के बीच क्या अंतर है? सबसे पहला अंतर तो यह है कि क़ानून, राज्य द्वारा निरूपित (formulate) तथा लागू किया जाता है, जबकि नैतिकता के मानक जनमत के प्राधिकार (authority of public opinion) पर आधारित होते हैं। क़ानून निश्चित ऐतिहासिक दशाओं में बनता है, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) के संकल्प (will) को व्यक्त करता है। इसके विपरीत, विगत, वर्तमान तथा भावी, कोई भी समाज नैतिकता के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकता है, क्योंकि लोग किन्हीं भी हालतों में विभिन्न कर्म करते हैं, भिन्न-भिन्न तरीक़ों से व्यवहार करते हैं, अन्य लोगों के व्यवहार का मूल्यांकन करते हैं और उन्हें स्वयं अपने व्यवहार का मूल्यांकन तथा उसका समर्थन करवाना होता है। किंतु इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि नैतिकता और उसकी मुख्य प्रस्थापनाएं शाश्वत (eternal) और अपरिवर्तनीय (immutable) हैं। नैतिकता के उसूल (principle), क़ायदे और मानदंड (norms) लोगों के सामाजिक सत्व (social being) द्वारा निर्धारित होते हैं और उसके साथ-साथ बदलते हैं

इस प्रकार के उसूलों, जैसे ‘हत्या मत कर’ और ‘चोरी मत कर’ का उद्‍गम ऐतिहासिक है। सामूहिकतावादी आदिम समाज में, जहां निजी स्वामित्व (private property) नहीं था, चोरी करना असंभव था और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात निरर्थक थी। कुछ जातियों में एक शत्रु की या अपने ही क़बीले के सदस्य की या सहधर्मी की ही हत्या करना ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में क़बीले के मुखिया की भी आनुष्ठानिक (ritual) हत्या करना बहुत समय तक नैतिकता के मानकों के विरुद्ध नहीं था। किंतु वर्गीय तथा ऐतिहासिक अंतरों के ( जिन्हें विभिन्न युगों और जातियों की प्रणाली में स्पष्टतः देखा जा सकता है, जैसे मध्ययुगीन कुलीनों की नैतिकता द्वारा व्यापार की भर्त्सना अथवा अन्य धर्मों के अनुयायियों के साथ कठोर बर्ताव को उचित ठहराना ) बावजूद सामान्य मानवीय नैतिक मूल्यों, मानदंडों और उपदेशों (precepts) का अस्तित्व भी है, जो विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं (socio-economic formations) तथा विभिन्न जातियों (nations) और समाज के वर्गों के लिए उचित हैं।

हमारे युग में ऐसे मूल्य हैं – व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा (dignity), व्यक्ति की अनुल्लंघनीयता (inviolability), स्वास्थ्य रक्षा, भावात्मक जगत और बच्चों की सुरक्षा, विश्व शांति का संरक्षण और नाभिकीय महाविनाश से मानवजाति का उच्छेदन (extinction) न होने देना। समान मानवीय हितों तथा स्थायी नैतिक मूल्यों का अस्तित्व ही वह चीज़ है, जो महत्वपूर्ण मानवीय लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए लोगों के सहयोग के आधार की रचना करती है। नैतिकता के वर्गीय स्वभाव (class nature) को मान्यता देने से, सामान्य मानवीय मूल्यों और हितों का अस्तित्व खारिज (rule out) नहीं होता है।

वर्ग समाज में नैतिक उसूलों का एक वर्गीय-समूहगत स्वरूप होता है। वर्ग की और सर्वोपरि शोषक वर्ग की स्थितियों की पेचीदगी (complexity) तथा आंतरिक अंतर्विरोधात्मकता (contradictoriness) के कारण प्रतिरोधी विरचनाओं (antagonistic formations) में नैतिकता भी आंतरिक रूप से अंतर्विरोधात्मक (contradictory) होती है। मसलन, ये उसूल कि ‘हत्या मत कर’, ‘आंख के बदले आंख’ और ‘दांत के बदले दांत’ एक दूसरे का ही खंडन ही नहीं करते, बल्कि धर्म-शास्त्रों के प्राधिकार द्वारा दोषमुक्त ठहराये जाते भी है। नैतिकता की यह अंतर्विरोधात्मक प्रकृति अक्सर ऐसी कार्रवाइयों व कर्मों को उचित ठहराने में समर्थ बना देती है, जो प्रदत्त स्थिति में किसी के हितों के सर्वाधिक अनुरूप हों। प्रभुताशाली, शासक वर्गों की नैतिक चेतना की सबसे लाक्षणिक विशेषता है नैतिक उसूलों, मानकों तथा मतों और वास्तविक, असली व्यवहार के बीच अंतर्विरोधों तथा गहरे विचलन (divergence) का होना। उदाहरण के लिए, पूंजीवादी नैतिकता शब्दों में अध्यवसाय, कठोर कार्य और व्यापारिक ईमानदारी को सर्वोच्च सद्‍गुण घोषित तो करती है, किंतु इस तथ्य के साथ अनायास समझौता कर लेती है कि पूंजीपति वर्ग का अधिकांश, भ्रष्टाचार, स्टॉक-एक्सचेंज की बेईमानियों में आकंठ डूबा है और अन्य लोगों के श्रम पर जीवित है।

इसके विपरीत, समाजवादी नैतिकता के मुख्य लक्षण हैं नैतिक उसूलों तथा नैतिक व्यवहार के बीच एकता और आंतरिक सहमति। यह नैतिकता मूल रूप से, मेहनतकशों के नैतिक उसूलों तथा व्यावहारिक मानकों की प्रणाली के रूप में उत्पन्न होने की वजह से समाजवादी समाज में सार्विकता (universality) का रूप ग्रहण करती है। निष्ठापूर्ण कार्य, ईमानदारी, परोपकारिता, पारस्परिक सम्मान, अपनी औक़ात का अहसास, मानवाधिकारों के लिए सम्मान, अंतर्राष्ट्रीयतावाद, सामूहिकता, व्यक्ति की क्षमताओं तथा प्रतिभाओं का आदर और पाखंड व ढोंगीपन का अस्वीकार, इसके सर्वोच्च सद्‍गुण तथा उसूल हैं। ऐसे उसूलों की घोषणा करना आसान है, किंतु उन्हें कार्यान्वित करना एक पेचीदा और अंतर्विरोधात्मक मामला है। इसलिए, समाजवादी समाज का एक मुख्य कार्य एक ओर, ऐसे नैतिक मानदंडो को कार्यान्वित करने के वास्तविक पूर्वाधारों का, यानी वस्तुगत दशाओं (objective conditions) का निर्माण व अंतर्विरोधों का समाधान करना और दूसरी ओर, प्रत्येक व्यक्ति को स्व-अनुशासन की तथा वास्तविक कर्मों व नैतिक उसूलों के बीच विचलन के प्रति असहिष्णुता (intolerance) की भावना में दीक्षित करना।


इस बार इतना ही।
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शुक्रिया।

समय अविराम

क़ानूनी चेतना और क़ानून

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत राजनीतिक चेतना और राजनीति पर चर्चा की थी, इस बार हम क़ानूनी चेतना और क़ानून को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क़ानूनी चेतना और क़ानून
( Legal Consciousness and Law )

क़ानूनी चेतना और क़ानून, समाज के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। लोग सामाजिक मामलों में कुछ क़ायदों (rules) और व्यवहार के मानकों (norms) का पालन करते हैं, ये क़ायदे इतिहासाश्रित होते हैं और समाज के विकास के साथ परिवर्तित होते हैं। वर्गों (classes) के उद्‍भव के साथ मानकों और क़ायदों की एक विशेष प्रणाली ( साथ ही उन्हें तोड़ने पर दंड देने की प्रणाली भी ) बनी, जो प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) के लिए उपयोगी थी और जिसे राज्य (state) द्वारा अपनाया तथा स्वीकार किया गया था। ये मानक और क़ायदे ही क़ानून (law) हैं। फलतः क़ानून हमेशा अस्तित्व में नहीं था। यह केवल वर्ग समाज में बना और राज्य के क्रियाकलाप, राजनीति तथा राजनीतिक संघर्ष के साथ घनिष्ठता से जुड़ा था और जुड़ा है।

क़ानून, ऐसी विधियों (statutes, legislation) की राज्य द्वारा स्वीकृत प्रणाली है जो प्रदत्त (given) समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों के संकल्प (will) को व्यक्त करती है। राज्यत्व (statehood) के विकास के साथ ही साथ ऐसे विशेष निकाय (bodies) या एजेंसियां बनी, जो क़ानूनों का प्रारूप (draft) बनातीं तथा उन्हें जारी करतीं ( विधि निकाय legislative bodies ), उनके अनुपालन पर नज़र रखतीं ( दंडाधिकारी ), क़ानूनों के उल्लंघनों के लिए दंड देतीं ( अदालतें, सार्वजनिक व्यवस्था निकाय ) और क़ानून द्वारा स्वीकृत सार्वजनिक व्यवस्था (public order) को बनाये रखतीं। ये सारे संस्थान (institutions) और उनसे संबंधित क़ानूनी क्रियाकलाप तथा स्वयं क़ानून, सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप में परावर्तित (reflect) तथा अनुबोधित (comprehended) होते हैं, जिसे क़ानूनी चेतना कहा जाता है। यह क़ानूनी चेतना, ‘न्याय’ (justice), ‘वैधता’ (legality), ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘अपराध’, तथा ‘दंड’ जैसी संकल्पनाओं (concepts) और विभिन्न क़ानूनी दृष्टिकोणों तथा सिद्धांतों को विकसित करती है, जिनके द्वारा, प्रदत्त समाज में प्रचलित न्याय, वैधता, व्यवस्था, आदि की धारणाओं (notions) के अनुसार, क़ानूनी मानकों तथा क़ानूनों को प्रमाणित किया जाता है।

क़ानूनी चेतना, क़ानून तथा क़ानूनी संस्थान, तदनुरूप (corresponding) सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं (socio-economic formations) की अधिरचना (superstructure) के अंग हैं और उनके आधार को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

प्रभुत्वशाली वर्ग के विचारकों ने क़ानून को हमेशा एक ऐसी चीज़ के रूप में पेश करने का प्रयत्न किया है, जो मानो शाश्वत (eternal) और स्थायी (stable) हो। उनमें से कुछ ने, यह दावा किया कि यह मनुष्य के अपरिवर्तनीय सार (immutable essence) को व्यक्त करता है। अन्य ने दैवी मूल (divine origin) तथा पवित्र ग्रंथों के प्राधिकार (authority) को अपनी दलीलों का आधार बनाया, जबकि कुछ अन्य ने क़ानून को जन-इच्छा की एक ऐसी अभिव्यक्ति के रूप में देखा, जो हमेशा अपरिवर्तनीय तथा स्थिर है। क्या यह सत्य है ?

सबसे पहले इस बात की ओर ध्यान दिलाया जाना चाहिए कि ये दृष्टिकोण वस्तुगत यथार्थता (objective reality) और ऐतिहासिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। मसलन, हम जानते हैं कि बहुत-से जनगण, जिनका ऐतिहासिक विकास रुक गया था, वर्ग विभाजन (class division) से बचते थे। उनके यहां कोई राजकीय प्राधिकारी नहीं थे और फलतः कोई क़ानून नहीं था। अपने दैनिक जीवन में वे नैतिकता, रीति-रिवाज तथा परंपरा के मानकों के अनुसार चलते थे। हम यह भी जानते हैं कि नयाय, वैधता, आदि की घारणाएं युग प्रति युग बदलती रही हैं। दास-प्रथावाले समाज में दासों की ख़रीद-फ़रोख़्त न्यायोचित और वैध कर्म माना जाता था। आधुनिक समाज में मनुष्यों की ख़रीद-फ़रोख़्त क़ानून और न्याय का घोर उल्लंघन माना जायेगा। सामंती समाज में क़ानून का स्वभाव लोगों की श्रेणीगत हैसियत से संबंधित था। एक भूदास, स्वतंत्र किसान या शहरी की हत्या के लिए जो दंड दिया जाता, वह कुलीन वंश के व्यक्ति की हत्या के लिए दंड से बहुत कम होता था। एक ही श्रेणी के अपराध के लिए, अलग-अलग श्रेणियों के लिए अलग-अलग दंड विधान थे। इस तरह सामंती क़ानून, राजाओं और कुलीनों-भद्रजनों के प्राधिकार की रक्षा करता था। फलतः प्रत्येक एतिहासिक युग में क़ानूनी चेतना और क़ानून एक निश्चित सामाजिक सत्व (social being) के आधार पर उपजते और उसे परावर्तित करते थे और इसी कारण से उस पर एक सक्रिय प्रतिपुष्टिकारी (active feedback) प्रभाव डाल सकते थे।

पूंजीवादी व्यवस्था में क़ानून की एक लाक्षणिक विशेषता इसकी औपचारिकता (formality) है, जो इस तथ्य में निहित है कि यह क़ानून के सामने सारे नागरिकों की समानता, सभा, प्रदर्शन तथा निवास परिवर्तन की स्वतंत्रता, व्यक्ति की अनुल्लंघनीयता (inviolability) तथा अधिकांश जनता को मताधिकार देने, आदि की घोषणा तो करता है किंतु उनकी किसी भी तरह से गारंटी नहीं करता और घोषित ‘अधिकारों’ तथा ‘स्वतंत्रताओं’ के उपयोग की भी गारंटी नहीं देता है। अमीर और ग़रीबों में विभाजित समाज में, जहां अधिकतर आबादी बेरोज़गार और बेघर हैं, वहां वास्तविक समानता कैसे हो सकती है? यही कारण है कि पूंजीवादी क़ानून संकीर्ण और औपचारिक हैं। किंतु पूंजीवादी लोकतंत्र में इस सीमित क़ानून को भी मज़दूरों के हित में और उनके अपने ही क़ानूनी राजनीतिक तथा ट्रेड-यूनियन संगठनों के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसीलिए, जब वर्ग-संघर्ष (class struggle) तीक्ष्ण होता है और एक क्रांतिकारी स्थिति परिपक्व होती है, पूंजीवादी वर्ग एक फासीवादी (fascist) प्रकार की सैन्य-पुलिस तानाशाही स्थापित करने का प्रयास करता है, और इस तरह वह स्वयं ही पूंजीवादी-लोकतांत्रिक क़ानूनों तथा क़ानूनी चेतना को अस्वीकार कर देता है, स्थगित कर देता है। ऐसी परिस्थितियों में, लोकतांत्रिक अधिकारों (democratic rights) के लिए लड़ाई, श्रमिक वर्ग और सभी श्रमजीवी जनता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य बन जाता है

समाजवादी समाज के उद्‍भव के साथ क़ानून और क़ानूनी चेतना में मूलभूत परिवर्तन होते हैं। क़ानून निर्माण कार्य, मुख्यतः समाजवादी संपदा की रक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, व्यक्ति के अधिकारों और उसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता तथा स्वाधीनता की रक्षा से संबंधित होता है। किंतु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि नयी क़ानूनी व्यवस्था द्वारा घोषित लक्ष्यों की उपलब्धि अपने आप हो जायेगी। समाजवादी सामाजिक संबंधों का निर्माण एक लंबी, जटिल और द्वंद्वात्मकतः अंतर्विरोधी (dialectically contradictory) प्रक्रिया है। अतः नैतिक व क़ानूनी उसूलों (principles) की संबद्धता (coherence) और व्यावहारिक अविभाज्यता (practical inseparability) की समझ, नूतन चिंतन की एक प्रमुख उपलब्धि और उसकी दार्शनिक गहराई तथा परिपक्वता (maturity) का प्रमाण हैं।


इस बार इतना ही।
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