सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी
( ideology in the system of social consciousness )

वैचारिकी (ideology) समाज के निश्चित वर्गों (classes) के हितों को व्यक्त करती है और उनके वर्गीय लक्ष्यों से निर्धारित होती है। यह चेतना का एक विशेष स्तर है। चूंकि वर्ग समाज (class society) में प्रभावी वैचारिकी, प्रभुताशाली शासक वर्गों की वैचारिकी होती है, यह सामाजिक चेतना के सारे रूपों में पैठी हुई होती है और उनकी अंतर्वस्तु (content) को निर्धारित करती है। इसलिए यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रभावी वर्गों की वैचारिकी, कम्युनिज़्म से पहले की सारी विरचनाओं (formations) में हमेशा सामाजिक सत्व (social being) का विरूपित परावर्तन (distorted reflection) देती है। ऐसा इसलिए होता है कि शोषक वर्गों को अपनी अवस्थिति (position) बनाये रखने में दिलचस्पी होती है। वे उसे अवश्यंभावी, ईश्वर द्वारा स्थापित तथा स्वयं मनुष्य की प्रकृति के अनुरूप दिखलाने की कोशिश करते हैं। वे धर्म, नैतिकता, कला और राजनीति को उसी के अधीनस्थ रखते हैं।

समाज के शोषित (exploited) वर्ग, वर्ग संघर्ष (class struggle) के दौरान स्वयं भी अपनी ही वर्ग चेतना, अपनी ही वैचारिकी, मूल्यों की प्रणाली तथा सामाजिक विकास की संकल्पना (conception) का विकास करते हैं। किंतु औद्योगिक सर्वहारा ( industrial proletariat) के उद्‍भव से पहले मेहनतकश अवाम (working people) स्वयं अपनी वैज्ञानिक वैचारिकी और समाज की सही तथा गहरी समझ का विकास करने में अक्षम थे। उनकी वैचारिकी, संगत रूप से क्रांतिकारी नहीं थी। अपने आप को शोषण के किसी रूप से ( मसलन, दासता व भूदासत्व ) मुक्त कराने की कोशिश करते हुए वे मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को पूर्णतः ख़त्म करने का प्रयास नहीं करते थे। उसके लिए वस्तुगत (objective) ऐतिहासिक दशाओं की ज़रूरत थी। इसलिए उनकी वैचारिकी ने जीवन के बारे में अनेक असत्य, विरूपित, अतिकाल्पनिक विचारों को जन्म दिया और इस प्रकार अपनी इच्छा के बावजूद मौजूदा वस्तुस्थिति को और सुदृढ़ बना दिया।

वस्तुस्थिति में आमूल (radical) परिवर्तन मज़दूर वर्ग के उद्‍भव के बाद ही हुआ। सारे इतिहास में शोषण के सारे रूपों को ख़त्म करने, उनका पूर्ण उन्मूलन करने और मौजूदा वस्तुस्थिति को बनाये रखने की चाह न रखनेवाला पहला वर्ग होने के नाते सर्वहारा को ऐतिहासिक विकास की सटीक (correct) समझ में दिलचस्पी थी। इसलिए इसके विचारकों ने इतिहास में पहली बार एक वैज्ञानिक यानी सटीक वैचारिकी तैयार की तथा उसका विकास किया। चूंकि मज़दूर वर्ग तथा अधिकांश मानवजाति के हितों को व्यक्त करनेवाली कम्युनिस्ट वैचारिकी, पूंजीवादी वैचारिकी से मूलतः और सिद्धांततः असंगत (incompatible) होती है, इसलिए उनके बीच अशाम्य (irreconcilable) वैचारिक संघर्ष वस्तुगत है और यह सामाजिक चेतना के समस्त रूपों में व्यक्त होता है।

आधुनिक पूंजीपति वर्ग के विचारक विविध सिद्धांत पेश करते हैं और उनकी मदद से वैज्ञानिक कम्युनिस्ट वैचारिकी तथा अवैज्ञानिक बुर्जुआ वैचारिकी के पारस्परिक विरोध को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करते हैं। निर्वैचारिकीकरण (de-ideologisation) के पक्षपोषक यह दावा करते हैं कि आधुनिक समाज में सामान्यतः किसी वैचारिकी की कोई ज़रूरत नहीं है, यानी निर्वैचारिकी (no ideology) हो सकती है। वे दावा करते हैं कि वैचारिकी ने विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान के लिए रास्ता छोड़ दिया है, जिनके द्वारा मनुष्यजाति की सारी समस्याओं से निबटा जा सकता है तथा उन्हें हल किया जा सकता है।

किंतु वास्तविकता ऐसे दावों का खंडन करती है। विभिन्न सामाजिक प्रणालियों में एक ही तकनीकी उपलब्धि के भिन्न-भिन्न परिणाम होते हैं। स्वयं विज्ञान का अनुप्रयोग (application) तथा समाज में उसकी भूमिका (role) का निर्धारण काफ़ी हद तक विभिन्न वैचारिक समादेशों (precepts) से होता है। निर्वैचारिकीकरण के सिद्धांत के पतन के बाद पूंजीवादी/बुर्जुआ विचारक एक और सिद्धांत पेश करने को मजबूर हो गये, यह है पुनर्वैचारिकीकरण (re-ideologisation) का सिद्धांत। इसके पक्षपोषक समस्त मानवजाति के लिए एक ही एकल (single) वैचारिकी की रचना करने की ज़रूरत पर हर तरीक़े से बल देते हैं। परंतु वास्तव में वे एक ऐसी एक एकल बुर्जुआ वैचारिकी तैयार करने का प्रयत्न करते हैं, जो वैचारिकी के दायरे में विद्यमान अनेकों भिन्न-भिन्न प्रतिस्पर्धी प्रवृत्तियों का स्थान ग्रहण करेंगी। निर्वैचारिकीकरण की तरह, पुनर्वैचारिकीकरण का अंतिम उद्देश्य भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट वैचारिकी का, यानी आधुनिक युग की सर्वाधिक उन्नत और एकमात्र वैज्ञानिक वैचारिकी का विरोध करना है।

इसलिए सामाजिक चेतना के किसी भी रूप (form) का विश्लेषण करते समय इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि यह प्रचंड वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा है। इस संघर्ष में, ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन (historical materialistic philosophy) का उद्देश्य बुर्जुआ वैचारिकी का, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, मुखौटा उघाड़ना तथा उसका असली रूप दिखाना है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना | समय के साये में

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