साम्यवादी विरचना – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत साम्यवादी विरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समाहार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


साम्यवादी विरचना – २
(The Communist Formation – 2)

समाजवाद (socialism) के निर्माण के दौरान आत्मगत कारक (subjective factor) की, यानी समाजवादी चेतना, वैचारिकी और शैक्षिक कार्य की भूमिका में बहुत तेज़ी से बढ़ती होती है। समाजवाद एक ऐसा समाज है जहां :

(१) उत्पादन के साधन (means of production) जनता की संपत्ति होते हैं और आर्थिक व सामाजिक उत्पीड़न (oppression) और असमानता (inequality) का उन्मूलन कर दिया जाता है।

(२) उत्पादक शक्तियों (production forces) के द्रुत (rapid) विकास का कार्य-क्षेत्र खुल जाता है और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति, सारे जनगण की ख़ुशहाली में लगातार बढ़ती को सुनिश्चित बनाती है।

(३) काम का समान अधिकार तथा उसके लिए न्यायोचित पारिश्रमिक सुनिश्चित होते हैं।

(४) मज़दूर वर्ग, मेहनतकश किसानों और बुद्धिजीवियों का एक घनिष्ठ गठबंधन स्थापित हो जाता है।

(५) सारी राष्ट्रीयताओं तथा जनगण की, पुरुषों तथा नारियों की, समानता की तथा युवा पीढ़ी को एक विश्वसनीय और आशाप्रद भविष्य की गारंटी होती है जबकि वृद्ध श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाती है।

(६) वास्तविक लोकतंत्र (real democracy) का विकास होता है; औद्योगिक, सामाजिक और सार्वजनिक मामलों के प्रबंध व प्रशासन में नागरिकों की व्यापक सहभागिता की गारंटी की जाती है।

(७) मानवाधिकार पूर्णतः वास्तवीकृत (realised) होते हैं; प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ही नियम तथा नैतिकता और अनुशासन होता है।

(८) एक सच्ची मानवतावादी वैचारिकी का बोलबाला होता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण सर्वोपरि होता है। प्रगतिशील संस्कृति और विज्ञान की रचना तथा विकास किया जाता है।

(९) सामाजिक न्याय, सामूहिकतावाद तथा साथियों जैसी पारस्परिक सहायता पर आधारित समाजवादी जीवन पद्धति की रचना की जाती है।

वैश्विक अनुभव दर्शाते हैं समाजवादोन्मुख समाज, पिछड़ेपन को ऐतिहासिक दॄष्टि से अल्पकाल में ही दूर कर सकता है, शक्तिशाली औद्योगिक और तकनीकी आधार तथा आधुनिक विज्ञान की रचना कर सकता है

साम्यवादी विरचना की दूसरी अवस्था केवल तभी आयेगी जब कम्युनिज़्म की भौतिक-तकनीकी बुनियाद डल चुकेगी और उसके उपयुक्त सामाजिक जीवन और चेतना के संगठन के रूपों की रचना हो चुकेगी। साम्यवाद एक ऐसी वर्गहीन सामाजिक प्रणाली (classless social system) होगी, जिसमें उत्पादन के साधनों पर एक ही, सार्वजनिक स्वामित्व होगा और समाज के सदस्यों को पूर्ण समानता प्राप्त होगी; यह स्वतंत्र, सचेत श्रमिकों का ऐसा अतिसंगठित (highly organised) समाज होगा, जिसमें सामाजिक स्वशासन (social self-government) की स्थापना होगी और समाज के भले के लिए श्रम, प्रत्येक व्यक्ति की प्रमुख जीवंत आवश्यकता बन जायेगा। यह ऐसी उत्पादक शक्तियों की अपेक्षा करता है, जो समाज और व्यक्ति दोनों की तर्कबुद्धिसम्मत (rational) आवश्यकताओं की पूर्ण तुष्टि के अवसर मुहैया करेगा।

सारे उत्पादक क्रियाकलाप, उच्च कारगर प्रविधियों तथा तकनीक पर आधारित होंगे और मनुष्य तथा प्रकृति के सामंजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया (harmonious interaction) को सुनिश्चित बनायेंगे। तब क्रियाकलाप तथा भौतिक संपदा के उत्पादन और वितरण का बुनियादी उसूल होगा ‘प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार’। कम्युनिज़्म में संक्रमण (transition) एक जटिल, लंबी प्रक्रिया है, जिसके दौरान पूंजीवाद के मुक़ाबले कहीं अधिक ऊंची उत्पादकता हासिल करना, सामाजिक दृष्टि से समरूप (socially uniform) समाज की रचना करना, समाज की सामाजिक संरचना में और प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक, सांस्कृतिक छवि तथा संपूर्ण समाज में गहरे परिवर्तन लाना जरूरी हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता | समय के साये में

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