आदिम-सामुदायिक विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत मानव समाज की रचना पर चर्चा की थी, इस बार हम आदिम-सामुदायिक विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आदिम-सामुदायिक विरचना
(the primitive communal formation)

आदिम सामुदायिक विरचना का आधार, उत्पादन के औज़ारों पर सामुदायिक स्वामित्व (ownership) था। पत्थरों के सरलतम औज़ारों ( कुल्हाड़ियां, छुरे, बाण, भाले आदि ), हड्डियों के उपकरणों, लकड़ी के तीरों तथा बल्लमों (javelins) ने मनुष्य को जंतु जगत से विलग (differentiated, separated) होने में समर्थ बनाया। साथ ही उनसे श्रम की नीची उत्पादकता हासिल होती थी। उनका उपयोग लोगों के संयुक्त क्रियाकलाप में ही कारगर (effective) होता था। उत्पादक शक्तियों (productive forces) के इस स्वभाव ने, उत्पादक शक्तियों के प्रकार (type) का भी पूर्वनिर्धारण किया। सारे औज़ार और अस्त्र आदिम समूह के सदस्यों के साझे स्वामित्व में थे। इस समूह का केंद्रक गोत्र (clan) था, जिसके सारे सदस्य रक्त संबंधों से परस्पर जुड़े थे। कालांतर में गोत्र समुदायों से जनजातियों ( क़बीलों ) तथा जनजातीय संघों (tribal unions) की रचना हुई।

प्रागऐतिहासिक (prehistoric) मानव प्राकृतिक शक्तियों के सामने निस्सहाय था। लोग मिलजुलकर ही उनका मुक़ाबला कर सकते थे। संयुक्त श्रम से प्राप्त भोजन गोत्र या जनजाति (क़बीले) के सारे सदस्यों के बीच वितरित किया जाता था। उत्पादन संबंधों के सारे तत्व, यानी स्वामित्व, कार्यकलाप का सीधा विनिमय और वितरण, उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास के स्तर के अनुरूप थे। आदिम-सामुदायिक विरचना की अधिरचना (superstructure) इन उत्पादन संबंधों के अनुरूप थी। गोत्र और क़बीलों का नेतृत्व मुखियों के हाथ में था, जो अपने बल, अनुभव और बुद्धिमता में विशिष्ट होते थे। सत्ता इन्हीं आधारों पर चयन के द्वारा प्राप्त होती थी। कभी-कभी और कहीं-कहीं यह पिता से पुत्र को वंशानुगत क्रम में भी मिलती थी। समुदाय के सारे सदस्य काम, कंद-मूलों के संचयन, शिकार, आदि में अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार भाग लेते थे। साथ ही सारे वयस्क, शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ पुरुष योद्धा भी होते थे। इसलिए आदिम समूह के सदस्यों के बीच कोई आंतरिक सामाजिक अंतर्विरोध (contradictions) नहीं थे। उनकी चेतना कठोर प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष में बनी थी।

प्राकृतिक घटनाओं ( वज्र घोष, तडित्छटा, प्रबल ताप, शीत, बाढ़, आदि ) के स्पष्टीकरण ने मिथकों का (mythological) रूप ग्रहण किया। विश्व के बारे में इन्ही स्पष्टीकरणों पर ही शुरुआती आदिम धर्म का उदय हुआ। साथ ही व्यवहार के लिए अनिवार्य सरलतम मानक (standards) तथा नियम, सामाजिक चेतना के अंग बने। वे आदिम नैतिकता और आचार के प्रारंभिक रूप थे। उनको भंग करने पर कठोर दंड दिया जाता था। उसी काल में आदिम कला का जन्म भी हुआ। चट्टानों तथा गुफ़ाओं की दीवारों में उस काल की रंगचित्रकला तथा रेखाचित्रों के अनेक नमूने हमारे युग तक सलामत रह गये। उनमें आखेट, लड़ाई, धार्मिक पंथों के तत्व, आदि प्रदर्शित किये गये हैं।

संपूर्ण आदिम प्रविधि (technique) तथा उत्पादन के विकास की एक बहुत बड़ी घटना आग का उपयोग था। इसके द्वारा लोगों ने खाना पकाना ही नहीं, बल्कि शरण स्थलों को गर्म रखना, चिकनी मिट्टी के बर्तन बनाना भी सीखा और बाद में धातुओं को गलाना और कांसे तथा लोहे के औज़ार तथा हथियार बनाना ही सीखा। उत्पादक शक्तियों के विकास में एक विराट छलांग इसका परिणाम थी। इसका एक नतीजा था लोगों का उष्णकटिबंधों में अपने मूल निवास स्थान से निकल कर तेज़ी के साथ दूसरी जगहों को फैलाव जिससे वे दुनिया के कठोर इलाक़ों तथा दुर्गम स्थानों में भी पहुंच गये।

उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही साथ श्रम विभाजन भी चलता रहा। ऐसे क़बीले बन गये, जो मुख्यतः शिकार खेलते या पेड़-पौधों से खाद्य बटोरते थे। पशुपालकों तथा ज़मीन पर काम करनेवालों के बीच विभाजन हो गया। दस्तकारियां (crafts) विविधीकृत हो गयीं : अस्त्र निर्माता, कुम्हार, मोची, आदि। इसके फलस्वरूप विभिन्न आदिम समुदायों के बीच श्रम के उत्पादों का विनिमय (exchange) होने लगा।

लगभग ६००० साल पहले उत्पादक शक्तियों का विकास ऐसे स्तर पर पहुंच गया कि लोगों ने पहली बार अपनी खाद्य, वस्त्र तथा शरण की प्रत्यक्ष ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक उत्पाद से अधिक का उत्पादन शुरू कर दिया। इन बेशी (surplus) उत्पादों को भंडारित करना तथा जमा करना संभव हो गया। वे गोत्र और क़बीलों के मुखियों के हाथों में संकेंद्रित थे। इसके फलस्वरूप संपदा (wealth) के संचय तथा संपत्ति की असमानता के पूर्वाधार बन गये। उत्पादन के बेशी साधनों को दूसरों के श्रम का शोषण करने के लिए उपयोग में लाया जाने लगा। इसका यह मतलब था कि नये उत्पादन संबंधों के ऐसे प्रारंभिक रूप उत्पन्न हो गये, जो अब सामूहिक स्वामित्व पर नहीं, निजी स्वामित्व पर आधारित थे। एक नयी उत्पादन पद्धति रूप ग्रहण करने लगी। पुरानी सामुदायिक समाज की संभावनाएं ख़त्म हो गयीं और इतिहास के वस्तुगत क्रम ने मानवजाति को नयी सीमा रेखा पर पहुंचा दिया। समाज का वर्गों में विभाजन हो गया और वर्ग समाज (class society) की रचना हो गयी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

Advertisements

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Trackback: दास-स्वामी विरचना | समय के साये में

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: