पूंजीवादी विरचना – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामंतवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम पूंजीवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


पूंजीवादी विरचना – १
(The Capitalist Formation – 1)

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति मूलतः सामंतवाद के अंदर ही एक विशिष्ट संरचना (structure) या रूप (form) की तरह उत्पन हुई। जब यह एक नयी सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) का आधार बनी, तो उसने सारे सामाजिक संबंधों के आमूल पुनर्निर्माण (radical restructuring)  तथा पुनर्संगठन (reorganisation) को प्रेरित किया। पूंजीवाद के अंतर्गत समाज का वर्गीय ढांचा बदल गया। सामंत और भूदास की जगह पूंजीपति और मज़दूर ने ले ली। उजरती मज़दूर (hired or waged labour) वर्ग और बुर्जुआ (bourgeoisie) वर्ग, प्रमुख वर्ग (classes) बन गये। पूर्णतः अधिकारहीन दास और सीमित अधिकारों वाले भूदास की तुलना में मज़दूर क़ानूनन स्वतंत्र होता है। किंतु पूंजीपति पर उसकी निर्भरता किसी तरह कम नहीं है, हालांकि इस निर्भरता का रूप ज़रूर भिन्न होता है। मज़दूर उत्पादन साधनों से वंचित होता है, उसके पास अपना कहने के लिए केवल उसकी श्रमशक्ति होती है, जिसे बेचकर ही वह जीवननिर्वाह कर सकता है। पूंजीवादी समाज में पूंजीपति ही श्रमशक्ति को ख़रीद सकता है और इस्तेमाल कर सकता है। अतः मज़दूर को मजबूर होकर उसके चंगुल में फंसना पड़ता है।

पूंजीवाद की स्थापना के साथ उत्पादक शक्तियां (productive forces) तेज़ी से बढ़ने लगीं। यह तीव्र विकास नये, पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के कारण हुआ। ये संबंध उत्पादन के साधनों (means of production) पर बुर्जुआ वर्ग के निजी स्वामित्व (private ownership) और उत्पादन साधनों से वंचित तथा अपनी श्रम शक्ति बेचने को विवश उज़रती मज़दूरों के श्रम के शोषण पर आधारित होते हैं। पूंजीपति, बेशी (surplus) मूल्य ( यानी वह मूल्य जिसे मज़दूर अपनी श्रम शक्ति के मूल्य के अतिरिक्त निर्मित करता है ) मुफ़्त में हस्तगत कर लेता है। इस तरह पूंजीवादी विरचना में वर्गों के बीच संबंध वैरभावपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे अमीरों द्वारा ग़रीबों के शोषण पर आधारित होते हैं।

परंतु विकसित होती हुई उत्पादक शक्तियां अपने स्वभाव बदलती थीं। मशीनी उत्पादन सामूहिक, संयुक्त श्रम की अपेक्षा करता था। पूंजीवादी विकास के साथ-साथ, उत्पादन अधिकाधिक सामाजिक स्वरूप ग्रहण करता जाता है। उत्पादक शक्तियों का सामाजिक स्वरूप और उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व के बीच बढ़ता हुआ तीव्र अंतर्विरोध पैदा हो गया। यह अंतर्विरोध, वर्ग संघर्ष की बढ़ती तीव्रता में व्यक्त हुआ।

पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप मज़दूर वर्ग में तेज़ी से वृद्धि हुई और समाज के जीवन में उसका सापेक्ष महत्व बढ़ गया। मज़दूर वर्ग की वर्ग चेतना भी बढ़ी। औद्योगिक उत्पादन, सर्वहारा (proletariat) से महती एकजुटता, संगठन, क्रियाकलाप के समन्वय (co-ordination) तथा उच्चस्तरीय व्यवसायिक प्रशिक्षण और ज्ञान की अपेक्षा करता था। पूंजीवाद ने सामंती फूट का, समाज के जटिल सोपानक्रमिक (hierarchical) संगठन, क़ानूनों की विभिन्नता का उन्मूलन कर दिया और श्रम तथा पूंजी के एक अविभक्त बाज़ार (market) की रचना की। इन सब बातों से मज़दूर वर्ग के लिए यह समझना अधिक आसान हो गया कि उसके हित पूंजीपतियों के हितों के आमूलतः विरोधी हैं। मार्क्स और एंगेल्स द्वारा विकसित वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत, यानी मौजूदा प्रणाली के क्रांतिकारी रूपांतरण (transformation) तथा एक वर्गहीन (classless) समाज के निर्माण के सिद्धांत ने सर्वहारा की वर्ग चेतना में वृद्धि को प्रोत्साहित किया। वैज्ञानिक समाजवाद, मज़दूर वर्ग की पार्टियों के ज़रिये मज़दूर आंदोलन के साथ जुड़ गया। इस तरह वैज्ञानिक समाजवाद ने सर्वसाधारण की क्रांतिकारी चेतना की बढ़ती में मदद की और फलतः वर्ग संघर्ष को विस्तृततर तथा गहनतर बनाया।

१९वीं सदी के अंत तथा २०वीं सदी के प्रारंभ में पूंजीवाद, प्रगतिशील तथा द्रुत गति से विकासमान विरचना नहीं रहा। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों और सामाजिक स्वरूप की उत्पादक शक्तियों के बीच गहरे अंतर्विरोधों के कारण उत्पादक शक्तियों का विकास उससे कहीं ज़्यादा मंद गति से होने लगा, जो निजी पूंजीवादी स्वामित्व के उन्मूलन के बाद होता। पूंजीवाद के विकास में एक नयी अवस्था, साम्राज्यवाद (imperialism) की अवस्था चालू हो गयी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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सामंतवादी विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत दास-स्वामी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामंतवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामंतवादी विरचना
(The Feudal Formation)

सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्पादन साधनों (means of production), मुख्यतः भूमि (land) पर पूर्ण निजी स्वामित्व (full private ownership) और उत्पादक पर, यानी किसान पर अपूर्ण स्वामित्व, सामंतवादी उत्पादन संबंधों (feudal relations of production) का आधार था।

इस प्रकार का स्वामित्व रोम के तथा पूर्व के कुछ दास-प्रथागत राज्यों के समाज में धीरे-धीरे उत्पन्न होने भी लगा था। दास केवल भौडे औज़ारों (rough tools) से ही काम कर सकते थे और नीची उत्पादकता (low productivity) के आदिम काम ही पूरे कर सकते थे। वे ग़ुलामी के जबरिया श्रम (forced labour) से नफ़रत करते थे और उन्हें अपने काम के परिणामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उत्पादन के साधनों में सुधार के बाद ग़ुलामों के बजाय, आश्रित उत्पादकों (dependent producers) के श्रम का उपयोग लाभदायी हो गया। उत्पादन के ऐसे नये संबंध बनने शुरू हो गये, जिनमें भूमि तथा उपकरणों के स्वामी ने उन्हें उत्पादक के उपयोग के लिए दे दिया और इस तरह, उत्पादक को अपने पर आश्रित बना दिया। इस प्रकार का क़ानूनन आश्रित कामगार पूर्णतः अपने मालिक की संपत्ति नहीं था और उत्पाद के कुछ अंश को स्वयं विनियोजित कर सकता था, अतः उसे अपने काम में दासों के बजाय अधिक दिलचस्पी थी।

यूरोप में तीसरी से पांचवीं सदियों के दौरान नये उत्पादन संबंधों के विकास को एशिया से आने वाले बर्बर क़बीलों के हमलों से बढ़ावा मिला। इन लोगों ने रोम के दास साम्राज्य को भंग करके उसके ध्वंसावशेषों पर कई नये राज्यों की स्थापना की, जिनके अध्यक्ष सैन्याधिकारी ( राजा, ड्यूक, बैरन ) होते थे। वे एक दूसरे पर निर्भर थे, वरिष्ठ अवस्थिति (senior position) के लोगों ने भूमि की जोतों को अपने योद्धाओं और सैनिकों के बीच बांट दिया। जोतदार (holders of fiefs) असामी, जागीरदार (vassals) बन गये और उन पर सैनिक सेवा की अनिवार्यता थोप दी गयी। निर्भरता की यह प्रणाली बड़ी जटिल और सोपानक्रमिक (hierarchical) थी। सबसे ऊपर थे सम्राट और राजा, उनके असामी थे ड्यूक और उनके नीचे के असामियों के रूप में थे काउंट, बैरन, आदि। सबसे नीचे के स्तर पर मेहनतकश, भूदास थे। कृषि सामंतवाद का आधार था, किंतु नगरों में भी सामंती संबंधों को सुदृढ़ बनाया गया, जिसके फलस्वरूप मध्ययुगीन दस्तकारी (craft) संगठनों ( गिल्डों, guilds ) का गठन हुआ। उनके भी अपने ही जटिल सोपानक्रमिक संबंध थे।

सारी श्रेणियों के सामंतों ने एक नये शासकीय प्रभावी वर्ग का गठन कर लिया, जबकि भूदास किसान तथा बहुत निर्धन दस्तकार शोषित वर्ग बन गये। भूदासों तथा दस्तकारों ने सामंती प्रभुओं के ख़िलाफ़ ज़ोरदार संघर्ष चलाया और अक्सर सशस्त्र विद्रोह भी किये। ये विद्रोह मेहनतकशों की पराजय में समाप्त हुए, क्योंकि उनकी जीत के लिए आवश्यक समुचित दशाओं का अस्तित्व नहीं था।

राज्य में घोर फूट और एकता के अभाव का होना सामंती समाज की लाक्षणिकता थी। प्रत्येक सामंत राजनीतिक स्वाधीनता पाने का प्रयास करता था। सामंतों के बीच अंतहीन युद्ध होते थे, जिनके कारण उत्पादक शक्तियों के विकास और उत्पादन संबंधों में सुधार में रुकावटें पैदा हो जाती थीं। सामंती समाज घोर रूढ़ीवादी (conservative), गतिरुद्ध (stagnant) था और उसके विकास की रफ़्तार बहुत धीमी थी। किंतु पूर्ण गतिरोध तथा सामाजिक विकास का पूर्ण-रोधन कभी नहीं हुआ।

यह बात मुख्यतः औज़ारों, उपकरणों तथा हस्तकला के मंद, किंतु अनवरत परिष्करण में प्रकट होती थी, इसका एक परिणाम था राज्यों के अंदर तथा राज्यों के बीच व्यापार का विस्तार। सामंती फूट, एक एकल मुद्रा प्रणाली (single monetary system) तथा संचार व्यवस्था का अभाव, क़ानूनों की विभिन्नता, आदि धीरे-धीरे उद्योग तथा व्यापार के विकास की बाधाएं बन गये। उत्पादक शक्तियों के और अधिक विकास तथा नयी उत्पादन पद्धति की रचना का तक़ाज़ा था कि समाज के आधार (basis) तथा अधिरचना (superstructure) का आमूल पुनर्संगठन तथा पुनर्निर्माण किया जाये।

१५वीं-१७वीं सदियों में पश्चिमी यूरोप के राज्यों में एक नयी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (capitalist mode of production) ने रूप ग्रहण करना शुरू कर दिया। विविध यांत्रिक विधियों और मशीनों के आविष्कार, औज़ारों व उपकरणों के परिष्करण, आदि के कारण भूदासों तथा गिल्ड दस्तकारों का श्रम अलाभकर हो गया। सामंती सामाजिक संबंध, समाज के विकास में बाधक बन गये। एक नया शोषक वर्ग, बुर्जुआ वर्ग (bourgeoisie, पूंजीपति वर्ग) सामंतवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेता बन गया ; इस वर्ग को किराये के श्रम (hired labour) तथा उजरती मज़दूरों (wage workers) के शोषण तथा नयी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के विकास में दिलचस्पी थी।

१७वीं-१८वीं सदियों में कई बुर्जुआ क्रांतियों के, जिनमें सर्वसाधारण ने सक्रिय रूप से भाग लिया, फलस्वरूप यूरोप और अमरीका के अनेक देशों में सामंती प्रणाली ध्वस्त हो गयी और सामंती राज्य ने बुर्जुआ राज्य के लिए रास्ता छोड़ दिया। उत्पादन की प्रणाली में, निजी स्वामित्व के पूंजीवादी रूप पर आधारित उत्पादन संबंध प्रभावी बन गये।


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दास-स्वामी विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत आदिम-सामुदायिक विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम दास-स्वामी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

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दास-स्वामी विरचना
(The Slave-Owning Formation)

जिस पहली सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) में निजी संपत्ति (private property) के संबंध प्रभावी थे वह दासों पर स्वामित्व वाली विरचना थी। ऐसी सबसे पुरातन विरचनाएं ईसापूर्व तीसरी से दूसरी सहस्त्राब्दियों में प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया, भारत तथा चीन में और ईसापूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी के अंत में यूनान में और पहली सहस्त्राब्दी में प्राचीन रोम में विकसित हुई। दासों के स्रोत थे युद्ध और ऋण। जहां आदिम समाज में युद्ध बंदियों को या तो क़बीले का सदस्य बना लिया जाता या क़त्ल कर दिया जाता, अथवा उनके लिए फिरौती मांगी जाती, वहीं दासों पर स्वामित्व वाले समाज में उन्हें दास बनाना लाभप्रद हो गया, क्योंकि उत्पादकता के उस स्तर पर दासों का श्रम, श्रम के बेशी उत्पादों (surplus products) की रचना के काम में लाया जा सकता था।

दासों पर स्वामित्व वाली उत्पादन पद्धति (mode of production) के उद्‍भव से समाज दो सर्वथा अनमेल वर्गों (classes) – दास तथा उनके स्वामी – में बंट गया। अपनी बारी में उनके बीच संघर्ष के फलस्वरूप एक विशेष सामाजिक संस्थान (social institution), दासों के स्वामियों के राज्य ( दास-प्रथागत राज्य ) की स्थापना हुई। यह राज्य दासों के प्रभुताशाली (dominant) स्वामियों के वर्ग की आर्थिक व राजनीतिक सत्ता को बनाये रखने के लिए शोषितों (exploited), सर्वोपरि दासों के राजनीतिक दमन (oppression) का एक अस्त्र था

दास-स्वामी प्रथा की प्रारंभिक अवस्थाओं में ही इस विरचना के सामान्य लक्षण, ठोस ऐतिहासिक दशाओं के अनुरूप, विशिष्ट रूप प्रदर्शित करने लगे थे। मिस्र, बेबीलोन, असीरिया व अन्य राज्यों में, जहां कॄषि के लिए आवश्यक विशाल सिंचाई तथा निकास नहरों का निर्माण किया गया था, दासों पर राजकीय स्वामित्व का बोलबाला था। प्राचीन पूर्व के देशों मे निर्मित सामाजिक-आर्थिक प्रणाली को मार्क्स ने ‘उत्पादन की एशियाई पद्धति’ कहा था।

इसका सबसे विशिष्ट लक्षण था एक ही तरह के उत्पादन संबंधों तथा रख-रखाव के पुनरुत्पादन की क्षमता, जिसमें उत्पादक शक्तियों (productive forces) का नीचा स्तर लगभग अपरिवर्तित रहता था। एक तरफ़, उससे समाज का निश्चित स्थायित्व (certain stability) तथा अपरिवर्तनीयता (immutability) सुरक्षित रहती थी, जो बाहरी शक्तियों के आक्रमण से ही ध्वस्त हो सकती थीं। दूसरी तरफ़, उत्पादन की एशियाई पद्धति संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक प्रणाली के गतिरोध (stagnation) को बढ़ावा देती थी, जो व्यक्ति की पहलक़दमी (initiative) तथा आत्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता की उसकी आवश्यकता को घटाकर न्यूनतम बनाते हुए, निराशावादी विश्वदृष्टिकोण (pessimistic world outlook) तथा पलायनवाद (escapism) को सुदृढ़ बनाते और वस्तुगत सामाजिक अन्याय (objective social injustice)  की दुनिया से भागकर आंतरिक अनुभवों तथा आत्मगत स्वसुधार (subjective self-improvement) एवं धार्मिक मनन-चिंतन और सन्यास-वैराग्य (asceticism) की दुनिया में जाने के प्रयत्नों को बढ़ावा देते हुए समाज के संपूर्ण आत्मिक जीवन पर भी प्रभाव डालती थी।

गतिरुद्ध एशियाई उत्पादन पद्धति, दास-स्वामी विरचना के बाद भी जीवित रही और एशिया के बहुत-से देशों में संपूर्ण मध्ययुग में भी जारी रही, जिसके फलस्वरूप उच्च कोटि की आत्मिक संस्कृति की रचना करने वाले ये देश आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में यूरोप और उत्तरी अमरीका के अधिक गतिशील देशों की तुलना में पिछड़ गये। पूरब के निरंकुश राजा, संपूर्ण प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की अकेले रक्षा करते थे। साथ ही पारिवारिक, पितृसत्तात्मक (patriarchal) दासता का अस्तित्व भी था। इसके विपरीत प्राचीन यूनान तथा रोम में दासों पर व्यक्तिगत स्वामित्व की प्रमुखता थी। दासों से कार्यशालाओं (ergasteria), पत्थर की खदानों, खानों, सड़कें बनाने तथा निर्माण के कार्यों, आदि में काम लिया जाता था। यूनान में तथा रोम में कुछ अवस्थाओं में लोकतांत्रिक दास-प्रथात्मक गणतंत्रों (slave republic) का प्रसार हुआ। किंतु उनमें लोकतंत्र (democracy) तथा राजनीतिक समानता (political equality) दासों के लिए नहीं, केवल स्वतंत्र नागरिकों के लिए थी।

एशियाई और यूरोपी राज्यों के बीच कुछ अंतरों के बावजूद दास-स्वामी विरचना के सामान्य लक्षण (general features) प्राचीन जगत के सारे राज्यों के लिए एक-से थे।

दासों की मेहनत ने दासों के स्वामियों को भारी दैनिक उत्पादक श्रम से मुक्त कर दिया। इसने शासकीय प्रभावी वर्ग के सदस्यों को कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, आदि के विकास की तरफ़ काफ़ी ध्यान देने में समर्थ बना दिया। प्रभावी वैचारिकी (dominant ideology) दासत्व को उचित ठहराती थी। अरस्तू ने कहा था कि दास, बोलनेवाले उपकरण मात्र हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक सत्व (social being), युग की चेतना (consciousness of epoch) को कैसे निर्धारित (determine) करता है।

दास-प्रथागत समाज में बौद्धिक क्रियाकलाप और शासन, शासक वर्ग (ruling class) का विशेषाधिकार था और दैहिक श्रम, दासों और निर्धनों की नियति थी। इसलिए दैहिक श्रम (physical labour) से नफ़रत की जाती थी ; केवल बौद्धिक, मानसिक क्रियाकलाप ही स्वतंत्र व्यक्ति के योग्य माने जाते थे। इस तरह दैहिक श्रम के प्रति घृणा, शोषक व शोषितों में समाज के ऐतिहासिक विभाजन का परिणाम थी।

दास और समाज के निर्धनतम संस्तर अपने उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ अक्सर विद्रोह कर देते थे। उन विद्रोहों का क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया जाता था। कुछ दुर्लभ मामलों में दास वर्ग विजयी हो जाता था, तो भी उसका मतलब दासता का ख़ात्मा नहीं था। विजेता स्वयं प्रभु बन जाते और विरोधियों को दस बना लेते थे। उस काल में विद्यमान उत्पादक शक्तियों के विकास तथा स्वभाव के स्तर पर इसके सिवा कोई और संभावना थी ही नहीं

उत्पादन के साधनों (means of production) के अत्यंत मंद सुधार के दौरान एक नये, सामंती (feudal) सामाजिक-आर्थिक विरचना की उत्पत्ति के लिए वस्तुगत अवस्थाओं का निर्माण भी धीरे-धीरे ही हुआ।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

आदिम-सामुदायिक विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत मानव समाज की रचना पर चर्चा की थी, इस बार हम आदिम-सामुदायिक विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आदिम-सामुदायिक विरचना
(the primitive communal formation)

आदिम सामुदायिक विरचना का आधार, उत्पादन के औज़ारों पर सामुदायिक स्वामित्व (ownership) था। पत्थरों के सरलतम औज़ारों ( कुल्हाड़ियां, छुरे, बाण, भाले आदि ), हड्डियों के उपकरणों, लकड़ी के तीरों तथा बल्लमों (javelins) ने मनुष्य को जंतु जगत से विलग (differentiated, separated) होने में समर्थ बनाया। साथ ही उनसे श्रम की नीची उत्पादकता हासिल होती थी। उनका उपयोग लोगों के संयुक्त क्रियाकलाप में ही कारगर (effective) होता था। उत्पादक शक्तियों (productive forces) के इस स्वभाव ने, उत्पादक शक्तियों के प्रकार (type) का भी पूर्वनिर्धारण किया। सारे औज़ार और अस्त्र आदिम समूह के सदस्यों के साझे स्वामित्व में थे। इस समूह का केंद्रक गोत्र (clan) था, जिसके सारे सदस्य रक्त संबंधों से परस्पर जुड़े थे। कालांतर में गोत्र समुदायों से जनजातियों ( क़बीलों ) तथा जनजातीय संघों (tribal unions) की रचना हुई।

प्रागऐतिहासिक (prehistoric) मानव प्राकृतिक शक्तियों के सामने निस्सहाय था। लोग मिलजुलकर ही उनका मुक़ाबला कर सकते थे। संयुक्त श्रम से प्राप्त भोजन गोत्र या जनजाति (क़बीले) के सारे सदस्यों के बीच वितरित किया जाता था। उत्पादन संबंधों के सारे तत्व, यानी स्वामित्व, कार्यकलाप का सीधा विनिमय और वितरण, उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास के स्तर के अनुरूप थे। आदिम-सामुदायिक विरचना की अधिरचना (superstructure) इन उत्पादन संबंधों के अनुरूप थी। गोत्र और क़बीलों का नेतृत्व मुखियों के हाथ में था, जो अपने बल, अनुभव और बुद्धिमता में विशिष्ट होते थे। सत्ता इन्हीं आधारों पर चयन के द्वारा प्राप्त होती थी। कभी-कभी और कहीं-कहीं यह पिता से पुत्र को वंशानुगत क्रम में भी मिलती थी। समुदाय के सारे सदस्य काम, कंद-मूलों के संचयन, शिकार, आदि में अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार भाग लेते थे। साथ ही सारे वयस्क, शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ पुरुष योद्धा भी होते थे। इसलिए आदिम समूह के सदस्यों के बीच कोई आंतरिक सामाजिक अंतर्विरोध (contradictions) नहीं थे। उनकी चेतना कठोर प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष में बनी थी।

प्राकृतिक घटनाओं ( वज्र घोष, तडित्छटा, प्रबल ताप, शीत, बाढ़, आदि ) के स्पष्टीकरण ने मिथकों का (mythological) रूप ग्रहण किया। विश्व के बारे में इन्ही स्पष्टीकरणों पर ही शुरुआती आदिम धर्म का उदय हुआ। साथ ही व्यवहार के लिए अनिवार्य सरलतम मानक (standards) तथा नियम, सामाजिक चेतना के अंग बने। वे आदिम नैतिकता और आचार के प्रारंभिक रूप थे। उनको भंग करने पर कठोर दंड दिया जाता था। उसी काल में आदिम कला का जन्म भी हुआ। चट्टानों तथा गुफ़ाओं की दीवारों में उस काल की रंगचित्रकला तथा रेखाचित्रों के अनेक नमूने हमारे युग तक सलामत रह गये। उनमें आखेट, लड़ाई, धार्मिक पंथों के तत्व, आदि प्रदर्शित किये गये हैं।

संपूर्ण आदिम प्रविधि (technique) तथा उत्पादन के विकास की एक बहुत बड़ी घटना आग का उपयोग था। इसके द्वारा लोगों ने खाना पकाना ही नहीं, बल्कि शरण स्थलों को गर्म रखना, चिकनी मिट्टी के बर्तन बनाना भी सीखा और बाद में धातुओं को गलाना और कांसे तथा लोहे के औज़ार तथा हथियार बनाना ही सीखा। उत्पादक शक्तियों के विकास में एक विराट छलांग इसका परिणाम थी। इसका एक नतीजा था लोगों का उष्णकटिबंधों में अपने मूल निवास स्थान से निकल कर तेज़ी के साथ दूसरी जगहों को फैलाव जिससे वे दुनिया के कठोर इलाक़ों तथा दुर्गम स्थानों में भी पहुंच गये।

उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही साथ श्रम विभाजन भी चलता रहा। ऐसे क़बीले बन गये, जो मुख्यतः शिकार खेलते या पेड़-पौधों से खाद्य बटोरते थे। पशुपालकों तथा ज़मीन पर काम करनेवालों के बीच विभाजन हो गया। दस्तकारियां (crafts) विविधीकृत हो गयीं : अस्त्र निर्माता, कुम्हार, मोची, आदि। इसके फलस्वरूप विभिन्न आदिम समुदायों के बीच श्रम के उत्पादों का विनिमय (exchange) होने लगा।

लगभग ६००० साल पहले उत्पादक शक्तियों का विकास ऐसे स्तर पर पहुंच गया कि लोगों ने पहली बार अपनी खाद्य, वस्त्र तथा शरण की प्रत्यक्ष ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक उत्पाद से अधिक का उत्पादन शुरू कर दिया। इन बेशी (surplus) उत्पादों को भंडारित करना तथा जमा करना संभव हो गया। वे गोत्र और क़बीलों के मुखियों के हाथों में संकेंद्रित थे। इसके फलस्वरूप संपदा (wealth) के संचय तथा संपत्ति की असमानता के पूर्वाधार बन गये। उत्पादन के बेशी साधनों को दूसरों के श्रम का शोषण करने के लिए उपयोग में लाया जाने लगा। इसका यह मतलब था कि नये उत्पादन संबंधों के ऐसे प्रारंभिक रूप उत्पन्न हो गये, जो अब सामूहिक स्वामित्व पर नहीं, निजी स्वामित्व पर आधारित थे। एक नयी उत्पादन पद्धति रूप ग्रहण करने लगी। पुरानी सामुदायिक समाज की संभावनाएं ख़त्म हो गयीं और इतिहास के वस्तुगत क्रम ने मानवजाति को नयी सीमा रेखा पर पहुंचा दिया। समाज का वर्गों में विभाजन हो गया और वर्ग समाज (class society) की रचना हो गयी।


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