मानव समाज की रचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामाजिक क्रांति की संरचना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम मानव समाज की रचना पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मानव समाज की रचना
(the forming of Human Society)

जिस प्रक्रिया के दौरान कोई घटना उत्पन्न होती, रूप ग्रहण करती तथा विरचित (formed) होती है, किंतु अभी परिपक्व (matured) तथा पूर्ण नहीं हुई है और उसने अपने ठोस लक्षण उपार्जित (acquired) नहीं किये हैं, उस प्रक्रिया को उसकी रचना या संभवन (becoming) कहते हैं। जो घटना संभवन या विकास के क्रम में, यानी विरचित होने की प्रक्रिया में है, उसके बारे में विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि उसका अस्तित्व नहीं है, फिर यह कहना भी ग़लत है कि वह पूर्ण विकसित रूप में विद्यमान है। संभवन या विरचित होने की संकल्पना (concept) एक दार्शनिक प्रवर्ग (category) है। इसे सारी विकासमान घटनाओं के अध्ययन पर, विशेषतः उनकी उत्पत्ति (origin) की प्रारंभिक अवस्था में लागू किया जाता है। आइये, अब हम मानव के विरचित होने के क्रम पर विचार करते हैं।

मानवजाति की उत्पत्ति की प्रारंभिक अवस्था के बारे में जो कुछ हम जानते हैं, वह पुरातत्वीय उत्खननों ( archaeological excavations) से प्राप्त होता है। मनुष्य के सर्वाधिक प्राचीन पुरखों की खोज पिछली सदी में ही हुई है। अपनी जैविक लाक्षणिकताओं में वे जानवरों के निकटतर हैं, किंतु साथ ही उन्होंने भोजन प्राप्त करने तथा विविध वस्तुएं बनाने के लिए पहली बार पत्थर के निहायत सरल औज़ारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। वैज्ञानिकगण इन प्राणियों को ‘प्राक्-मानव’ (prehuman) कहते हैं। उनकी जीवन पद्धति जानवरों के झुंड की जीवन पद्धति से बहुत मिलती-जुलती थी। उनके मस्तिष्क का आकार उच्चतर मानवसम (anthropoid) वानरों के मस्तिष्क से शायद ही बड़ा था।

प्राक्-मानव की अवस्थाओं में उत्पादन के संबंध (पद के शुद्ध अर्थ में) अभी नहीं बने थे और, फलतः, ऐसे कोई सामाजिक संबंध तथा संस्थान (institutions) भी नहीं थे, जो मानव समाज की विशेषता होते हैं। प्राक्-मानव लगभग ५५ लाख वर्ष पूर्व रहते थे और इसके बाद की क़रीब-क़रीब ३५ लाख वर्ष की अवधि को मानव समाज के विरचित होने की अवधि माना जा सकता है। उस अवधि के दौरान औज़ारों का परिष्करण और उत्पादन क्रियाकलाप का विकास अत्यंत मंद गति, स्वतःस्फूर्त (spontaneously) ढंग तथा प्रयत्न-त्रुटि (trial and error) के द्वारा होता रहा।

किंतु इस अवधि के अंत तक, समाज की उत्पादक शक्तियां (production forces) उस हद तक विकसित हो गयीं कि उनकी आगे की वृद्धि, सारी श्रम व सामाजिक प्रक्रियाओं के किंचित संगठन की मांग करने लगी। इस तरह, मनुष्य के आर्थिक क्रियाकलाप तथा सामाजिक संबंधों के और मुख्यतः उत्पादन संबंधों के बनने के पूर्वाधार, उत्पादक शक्तियों के विकास के ज़रिये सर्जित हुए। मनुष्य का सत्व, सामाजिक सत्व (social being) बन गया और उसके आधार पर सामाजिक चेतना का बनना शुरू हो गया।

मानव समाज के विरचित होने की प्रक्रिया लगभग १०-१५ लाख साल पहले पूरी हुई, जब पुरातनतम आदिम मानव ( Pithecanthropus ) का आविर्भाव हुआ था। इन्हें पुरा मानव या Palaeanthropos भी कहते हैं। अपनी दैहिक बनावट में वे ‘प्राक्-मानवों’ और जानवरों से बहुत ज़्यादा भिन्न थे। मानवीय नस्ल के विरचित होने की प्रक्रिया तब पूर्ण हुई, जब पहली सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) – आदिम सामुदायिक प्रणाली – बनी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: आदिम-सामुदायिक विरचना | समय के साये में

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