सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है ?

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत ‘व्यष्टिक, विशेष तथा सार्विक’ पर चर्चा की थी, इस बार हम समझने का प्रयास करेंगे कि सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है ?
( what is a socio-economic formation? )

जब हम अतीत, वर्तमान तथा भविष्य में मनुष्य की नियति, समाज में उसकी अवस्थिति (position) और परिवेशीय जगत के प्रति उसके रुख़ (attitude) पर विचार करते हैं, तो हमें ऐतिहासिक घटनाओं तथा मानवीय कारनामों, लोगों की पूरी जातियों तथा राज्यों के उत्थान, विकास तथा पतन की असीम विविधता से सामना पड़ता है। क्या इन सबके पीछे प्रकृति के जैसे कुछ सामान्य नियमों (general laws) को खोजा जा सकता है? ऐतिहासिक भौतिकवाद के सामाजिक दर्शन के उद्‍भव (rise) से पहले ऐसे नियमों को खोजने के सारे प्रयास विफल रहे।

ऐतिहासिक संवृत्तियों (events) तथा लोगों के कारनामों (deeds) की बाहरी विविधता तथा द्रुत (rapid) परिवर्तन के अंतर्गत किसी सार्विक (common) को, किसी ऐसी चीज़ को खोजने के लिए समाज की समझ में एक सच्चे क्रांतिकारी परिवर्तन की ज़रूरत थी, जो इन्हीं संवृत्तियों तथा क्रियाकलाप के रूपों को, परस्पर संबंधित तथा स्वयं उनकी संभावना को ही स्पष्ट कर सके। ऐसे सार्विक, सामान्य (general) को ही ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ कहा गया।

सामाजिक-आर्थिक विरचना वस्तुगत (objective), स्थायी सामाजिक संबंधों, प्रक्रियाओं, संस्थानों तथा सामाजिक समूहों और सामाजिक चेतना के उन सारे रूपों व प्रकारों का समुच्चय (aggregate) है, जो एक निश्चित ऐतिहासिक युग में प्रचलित उत्पादन पद्धति (mode of production) के आधार पर उत्पन्न तथा विकसित होते हैं

फलतः एक सामाजिक-आर्थिक विरचना अत्यंत जटिल प्रणाली है। प्रत्येक ऐतिहासिक युग में एक नहीं, अनेक उत्पादन पद्धतियां हो सकती हैं; मसलन, पूंजीवाद समाज में, प्रभुत्व प्राप्त पूंजीवादी उत्पादन के साथ ही टटपुंजियां (petty) पण्य उत्पादन (commodity production), पितृसत्तात्मक (patriarchal), यानी भरण-पोषण की उत्पादन व्यवस्था और सामंती (feudal) उत्पादन के अवशेष भी विद्यमान हो सकते हैं। इन गौण (subsidiary) या अप्रभावी (non-dominant) उत्पादन पद्धतियों को आम तौर पर क्षेत्रक (sectors) कहा जाता है। एक विरचना से दूसरी में संक्रमण (transition) की अवधि में ये विशेष विविधतापूर्ण होते हैं। किंतु क्षेत्रक स्वयं उत्पादन की प्रभावी पद्धति के अधीनस्थ (subordinate) होते हैं तथा उस पर निर्भर करते हैं। इसलिए प्रदत्त (given) विरचना के आधार (base) तथा उसकी अधिरचना (superstructure) को रूप प्रदान करनेवाले सारे सामाजिक संबंधों, प्रक्रियाओं, संस्थानों तथा चेतना के रूपों को यही प्रभावी पद्धति निर्धारित करती है।

समाज एक अविभक्त सामाजिक प्रणाली (system) या अंगी (organism) है, जो कई अंतर्संबंधित उपप्रणालियों (subsystems) से बना है। ये उपप्रणालियां एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं ; मिसाल के लिए, उनमें वर्ग (class), राजनीतिक पार्टियां, राज्य, धार्मिक संगठन, परिवार, आदि शामिल हैं, किंतु वे सब अंततः उत्पादन पद्धति पर निर्भर हैं। एक विरचना की रचना करनेवाली विभिन्न उपप्रणालियों का उत्पादन पद्धति के साथ संयोजन (link) किंचित जटिल होता है और विविध संबंधों तथा निर्भरताओं के ज़रिये मूर्त होता है।

‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ एक प्रवर्ग (category) है, जो सर्वाधिक समान व सामान्य, वस्तुगत और आवश्यक विशेषताओं और अनुगुणों (properties) को परावर्तित (reflect) करता है, जो प्रभावी उत्पादन पद्धति से निर्धारित होते हैं, किंतु विभिन्न देशों में ख़ास तौर से व्यक्त होते हैं। ये विशेषताएं राष्ट्रीय और ऐतिहासिक अवस्थाओं पर, और इस पर निर्भर करती हैं कि प्रदत्त विरचना कब और किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुई

सामाजिक-अर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत ने ऐतिहासिक प्रत्ययवाद (idealism) की सारी क़िस्मों पर क़रारी चोट की। इसलिए पूंजीवादी विचारकों, खासकर जर्मन सामाजशास्त्री माक्स बेबेर (१८६४-१९२०) के अनुयायियों ने इसका खंड़न करने के प्रयत्न में उसे ‘आदर्श प्रकार’ का यानी समाज का ऐसा काल्पनिक मॉडल बताया जिसका वस्तुगत ऐतिहासिक यथार्थता (reality) में कोई अस्तित्व नहीं है। प्रत्ययवादियों को जवाब देते हुए लेनिन ने लिखा था कि ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ की संकल्पना (concept) ने “सामाजिक घटनाओं के वर्णन ( और आदर्श दृष्टि से उनके मूल्यांकन ) से उनके विशुद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण की ओर अग्रसर होना संभव बनाया, उदाहरण के तौर पर कहा जाए तो ऐसा विश्लेषण जो एक पूंजीवादी देश को दूसरे से विभेदित (distinguish) करता है और उसकी जांच करता है जो उन सबमें समान (common) है।”

एक ही विरचना, मसलन, पूंजीवादी या समाजवादी विरचना, अपने को भिन्न-भिन्न मुल्कों में भिन्न-भिन्न ढंग से प्रकट कर सकती है, किंतु समान लक्षणों (common features) और स्थायी (stable), आवश्यक संयोजनों (necessary connections) के अस्तित्व से, सारे देशों तथा राष्ट्रों के लिए एक या दूसरी विरचना की कार्यशीलता (functioning) के नियमों और एक विरचना से दूसरी में संक्रमण के नियमों को निरूपित करना संभव हो जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: सामाजिक क्रांति | समय के साये में

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