अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन
( social organisations in the system of the superstructure )

वर्ग समाजों में राज्य और राजनीतिक पार्टियों के साथ ही साथ विभिन्न सामाजिक संगठन भी अधिरचना का अंग होते हैं। उनकी स्थापना शोषक और शोषित दोनों ही वर्गों द्वारा की जा सकती है। शोषकों के हितों की रक्षा करनेवाले संगठनों के उदाहरण हैं कुलीनों के संघ, धार्मिक संगठन, सामंती समाज में व्यापारियों के संघ और पूंजीवादी समाज में निजी संपत्ति के मालिकों तथा पूंजीपतियों के विभिन्न निगमित ( corporative ) संगठन ( जैसे उद्योगपतियों, बड़े किसानों के संघ, अन्य संस्थाएं )।

वर्ग संघर्ष के विकसित तथा तीक्ष्ण होने तथा मेहनतकशों की वर्ग चेतना बढ़ने के साथ ही साथ उन्होंने भी अपने हितों की रक्षार्थ संगठन बनाने शुरू कर दिये। पूंजीवादी समाज में ऐसे संगठनों में सबसे महत्वपूर्ण ट्रेड-यूनियनें हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए मज़दूर वर्ग के संघर्ष को संगठित करना होता है। ट्रेड-यूनियनों के क्रियाकलाप का स्वभाव इस बात पर बहुत निर्भर होता है कि कौनसी राजनीतिक पार्टियां उन पर प्रभाव डालती हैं। पूंजीवादी विचारक, सुधारक ( reformists ) और संशोधनवादी ( revisionists ), ट्रेड-यूनियनों को पूंजीवादी लक्ष्यों के अंतर्गत लाने और क्रांतिकारी संघर्ष के रास्ते से डिगाकर ऐसी छिटपुट आर्थिक लड़ाइयों की ओर ले जाने की कोशिश करते हैं, जिनसे पूंजीवाद की बुनियाद को कोई हानि नहीं होती। पूंजीवादी देशों में कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ट्रेड-यूनियन आंदोलन में अपने प्रभाव को बढ़ाना है। मज़दूरों की वर्ग चेतना को परिपक्व करने और क्रांतिकारी संघर्षों की राह पर ले जाने के लिए वे ट्रेड-यूनियनों में वैचारिक, शैक्षिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कामों पर बल देते रहते हैं।

समसामयिक पूंजीवादी समाज की अधिरचना में ट्रेड-यूनियनों के अलावा पुरुषों के , महिलाओं के, कलात्मक व साहित्यिक, संगीत, युद्ध विरोधी, खेलों के तथा बहुत सारे अन्य संगठन भी शामिल होते हैं। विभिन्न सामाजिक, सामूहिक और व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व करनेवाले यह संगठन सामाजिक घटनाओं के प्रति अपने रुख़ ( attitude ) में भिन्न-भिन्न होते हैं और समाज के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार का असर डालते हैं। परंतु जब उनके कार्यकलाप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीवादी वर्ग के मौलिक, मूलभूत हितों पर असर डालने लगते हैं, तो उन्हें पूंजीवादी राज्य और उसकी राजनीतिक पार्टियों के घोर विरोध का सामना करना पड़ता है

समाजवादी समाज में मेहनतकशों के हितों को व्यक्त करनेवाले सामाजिक संगठनों की भूमिका लगातार बढ़ती रहती है। उनके क्रियाकलापों का मक़सद समाजवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना, संस्कृति का विकास करना और सामाजिक जीवन के रूपों तथा दशाओं को बेहतर बनाना होता है। सहकारिता ( cooperation ) के विभिन्न रूपों की भूमिका बढ़ती है, जो सामाजिक स्वप्रबंध ( self-managements ) तथा अर्थव्यवस्था के विकास का कारगर साधन होते हैं। समाजवादी जनवाद के और अधिक विकसित होने के साथ-साथ सामाजिक संगठन समाज के प्रशासन में अधिक जटिल और सर्वसमावेशी ( all-embracing ) कार्य करने लगते हैं और अधिरचना में उनका महत्व लगातार बढ़ता जाता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस क्रियाकलाप में आत्मगत ( subjective ) और वस्तुगत ( objective ) कारकों को कैसे मिलाया जाता है और वे कैसे अभिव्यक्त होते हैं, सारे सामाजिक संस्थानों और संगठनों की कार्यात्मकता ( functioning ) में निर्धारक कारक कौनसे हैं और कि क्या उनके क्रियाकलाप में वस्तुगत नियमों ( laws ) और नियमितताओं ( patterns ) को देखा जा सकता है। इस स्थल पर हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के सबसे महत्वपूर्ण प्रवर्गों के, अर्थात ‘सामाजिक अस्तित्व या सत्ता’ ( social being ) और ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ) के निकट आ पहुंचते हैं। इन पर चर्चा अगली बार करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना | समय के साये में

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