व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित किया था, इस बार हम सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत ‘व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य’ को समझने का प्रयास करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं का सिद्धांत
(the theory of socio-economic formations)
व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य
(the individual, particular and general)

ह जानने के लिए अपने चारो तरफ़ की वस्तुओं पर एक नज़र डालना काफ़ी है कि वे सब, किसी न किसी तरह, एक दूसरे से भिन्न हैं। यहां तक की बिलियर्ड की दो समरूप गेंदें भी जब सूक्ष्मता से तोली जाती हैं तो उनके बीच एक ग्राम के हजारवें अंश का अंतर होता है। हालांकि क्‍वांटम यांत्रिकी इस बात की पुष्टि करती है कि एकसमान नाम के प्राथमिक कण एक दूसरे से अप्रभेद्य (indistinguishable) होते हैं, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी प्रदत्त (given) क्षण पर वे भिन्न-भिन्न स्थानों में हो सकते हैं और भिन्न-भिन्न परमाणुओं की रचना कर सकते हैं और परमाणु भिन्न-भिन्न अणुओं के अंश की तथा अणु भिन्न-भिन्न भौतिक वस्तुओं के अंश की। बेशक सर्वोपरि बात यह है कि लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं और ये भिन्नताएं हैं सूरत, चरित्र, कुशलताओं, नियतियों, जातीयता, भाषा, आदि की। संक्षेप में हमारे गिर्द सारी घटनाओं (phenomena) और प्रक्रियाओं (processes) में अनूठे लक्षण (features) और गुण-धर्म (attributes) होते हैं, जो उनमें अंतर्निहित (inherent) होते हैं, यानी उनमें व्यष्टिकता (individuality) होती है। यह अनुगुण (property), प्रवर्ग (category) “व्यष्टिक” (individual) ( या अनन्य unique, एकल single ) में परावर्तित होता है

इसके साथ ही ऐसी पूर्णतः व्यष्टिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं नहीं है, जो अन्य किसी से न मिलती-जुलती हों। मसलन, सारे कौव्वों के पंख काले होते हैं, सारे तरलों में तरलता का एक-सा अनुगुण होता है। लोगों को एक दूसरे से भिन्न बनानेवाले व्यष्टिक अंतरों के बावजूद उनमें एकसमान लक्षण तथा अनुगुण भी होते हैं, यानी ऐसे विशेष लक्षण होते हैं जिनके आधार पर उन्हें कई समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है। लोगों को उनकी आयु, लिंग, वर्ग, बालों के रंग, रुधिर-वर्ग, जातीयता, भाषा, आदि के अनुसार विभिन्न समूहों में बांटा जा सकता है। ठीक इसी तरह, रासायनिक तत्वों को उनकी रासायनिक संरचना में अंतर के बावजूद क्षारीय धातुओं, हैलोजनों तथा निष्क्रिय गैसों ( जिनमें से प्रत्येक के अपने विशेष रासायनिक अनुगुण होते हैं ) में विभाजित किया जा सकता है। उनकी नियतियां, रूपरंग तथा ठोस क्रियाकलाप कुछ भी क्यों न हो, सिकंदर तथा जुलियस सीज़र, नेपोलियन व सुवोरोव के व्यक्तित्वों में अनेक एकसमान लक्षण देखें जा सकते हैं : संकल्प, साहस, सैनिक प्रतिभा, संगठन की योग्यता, आदि जिनकी बदौलत उनका महान सेनापति बनना संभव हुआ।

इस तरह व्यष्टिक या एकल घटनाओं में ऐसे गुण-घर्म और अनुगुण होते हैं जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ही नहीं करते, बल्कि उन्हें एक दूसरे के समान भी बनाते हैंऐतिहासिक भौतिकवाद, । इस आधार पर हम उन्हें समूहों में रख सकते हैं और समूह के सामूहिक लक्षण निश्चित कर सकते हैं। घटनाओं और प्रक्रियाओं के कुछ समुच्चयों में अंतर्निहित वस्तुगत विशेषताओं (objective traits) तथा अनुगुणों ( properties) को प्रवर्ग “विशेष” (particular) से परावर्तित (reflected) किया जाता है

घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के पृथक समूहों में अंतर्निहित अनुगुणों और गुण-धर्मों के साथ ही वस्तुगत यथार्थता (objective reality ) में एक प्रदत्त क़िस्म की सारी घटनाओं तथा प्रक्रियाओं की सार्विक लाक्षणिक विशेषताएं, अनुगुण और संबंध भी होते हैं। उन्हें “सामान्य” (general) या “सार्विक” (common, universal) प्रवर्ग से परावर्तित किया जाता है। सारे रासायनिक तत्वों में सार्विक यह तथ्य है कि उनके परमाणुओं की संरचना में एक परमाणविक नाभिक तथा इलैक्ट्रोनों का खोल होता है। लिंग, भाषा, नस्ल, जाति, आदि के बावजूद सारे लोगों की सामान्य विशेषता यह है कि वे सब तर्कबुद्धिसंपन्न सामाजिक सत्व (rational social beings) हैं, जो औज़ारों के जरिये विविध वस्तुएं बनाने में समर्थ होते हैं। इस तरह, हम एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि प्रवर्ग “व्यष्टिक”, “विशेष” और “सामान्य” हमारे परिवेशीय जगत के वस्तुगत अनुगुणों को परावर्तित करते हैं

स्वयं यथार्थता (reality) में सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन (dialectical connections) होता है। सामान्य और विशेष, व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सामान्य विद्यमान होता है। यह कथन प्रकृति, समाज तथा चिंतन में अनुप्रयोज्य (applicable) है। प्रत्येक पौधा तथा जंतु सामान्य जैविक नियमों के अंतर्गत होता है और साथ ही ऐसे विशेष नियमों से भी संनियमित (governed) होता है, जो केवल उसकी प्रजातियों के लिए ही लाक्षणिक होते हैं। इसी प्रकार, प्रत्येक अलग-अलग व्यक्ति चाहे उसका व्यक्तित्व कितना ही मेधापूर्ण क्यों न हो, अपने व्यवहार तथा सामाजिक क्रियाकलाप में एक विशेषता को व्यक्त करता है, जो उसकी जाति, व्यवसाय और श्रम-समष्टि (work collective) की लाक्षणिकता होती है और साथ ही वह उन सामान्य गुणों को भी प्रदर्शित करता है, जो उसकी संस्कृति, उसके ऐतिहासिक युग और सामाजिक वर्ग (class) के लोगों में अंतर्निहित होते हैं। इसके साथ ही साथ सामान्य और विशेष, व्यष्टिक के बग़ैर तथा उससे पृथक रूप में विद्यमान नहीं होते हैं।

सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के संबंध को स्पष्ट करने तथा यह दर्शाने के बाद कि वह प्रकृति और समाज दोनों पर लागू होता है अब हम सामाजिक विकास के सबसे सामान्य नियमों की चर्चा कर सकते हैं। यह समस्या सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत से अविभाज्य है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा की थी, इस बार हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल
(the basic principle of historical materialism )

प्रवर्ग ( category ) ‘सामाजिक अस्तित्व’ ( social being ), सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘भूतद्रव्य’ ( matter ) को सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है, ठीक उसी तरह जैसे कि ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ), अधिक सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘चेतना’ ( consciousness ) का सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, दर्शन के बुनियादी सवाल का उत्तर देते हुए आधुनिक विज्ञान के साथ पूर्ण मेल सहित इस बात की पुष्टि करता है कि भूतद्रव्य प्राथमिक तथा चेतना द्वितीयक है। इसका तात्पर्य, सबसे पहले और सर्वोपरि, यह है कि क्रमविकास में भूतद्रव्य चेतना से पहले विद्यमान था और उससे स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान हो सकता है। इसके विपरीत चेतना भूतद्रव्य से स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान नहीं रह सकती है।

परंतु यह सोचना भ्रामक होगा कि सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से पहले तथा उससे स्वतंत्र रूप में विद्यमान हो सकता है। हालांकि जो सामाजिक संबंध तथा भौतिक घटनाएं, सामाजिक अस्तित्व का अंग हैं, उनका स्वतंत्र और वस्तुगत अस्तित्व है, उनकी रचना लोगों के द्वारा उनके सोद्देश्य क्रियाकलाप के, यानी चिंतनशील अस्तित्वों के क्रियाकलाप के दौरान होती है। ऐसे मानव समाज की कल्पना करना असंभव है, जिसमें सामाजिक अस्तित्व तो रूप ग्रहण कर चुका हो किंतु सामाजिक चेतना लापता हो। ऐसे समाज का क़तई अस्तित्व नहीं हो सकता है। इस हालत में सामाजिक जीवन तक विस्तारित दर्शन के बुनियादी सवाल का भौतिकवादी उत्तर कैसा है?

हम देख चुके हैं कि जिस प्रकार समाज का आर्थिक आधार, समाज की राजनीतिक और क़ानूनी अधिरचना ( superstructure ) का आधार है, उसी प्रकार भौतिक संपदा की उत्पादन पद्धति, आत्मिक क्रियाकलाप सहित सारे मानवीय क्रियाकलाप का आधार है। क्रियाकलाप के अन्य सारे रूप तथा सारी पद्धतियां जिस उत्पादन पद्धति पर आश्रित होती हैं, वह, अंततः, समाज के जीवन में गहनतम परिवर्तनों का और एक सामाजिक प्रणाली से दूसरे में संक्रमण ( transition ) का कारण है और इस अर्थ में ठीक उसी तरह निर्णायक भूमिका अदा करती है, जिस तरह से आधार में परिवर्तन अधिरचना के परिवर्तनों को नियंत्रित करते हैं, क्योंकि आधार इस तथ्य के बावजूद उनका पहला कारण होता है कि अधिरचना स्वयं आधार पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है। आधार की निर्णायक भूमिका इसी में व्यक्त होती है।

अब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन पर किस तरह से लागू किया जा सकता है और इसका भौतिकवादी उत्तर कैसे दिया जा सकता है। समाज के संबंध में इस प्रश्न का रूप ऐसा होगा : निर्धारक ( determinant ) कौन है – सामाजिक अस्तित्व या सामाजिक चेतना ? इसके उत्तर में ऐतिहासिक भौतिकवाद, ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) के विपरीत, इस बात की पुष्टि करता है कि लोगों के अस्तित्व को उनकी चेतना निर्धारित नहीं करती किंतु, इसके विपरीत, उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है। यह प्रस्थापना ( preposition ) मनुष्यजाति के संपूर्ण ऐतिहासिक अनुभव का वैज्ञानिक सामान्यीकरण ( scientific generalisation ) है और साथ ही समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) का बुनियादी नियम है। सामाजिक अस्तित्व इस अर्थ में भौतिक तथा प्राथमिक है कि केवल वही ऐसा है, जो सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु ( content ) और रूप ( form ) को और यहां तक कि सामाजिक अस्तित्व पर उसके प्रतिपुष्टिकारी ( feedback ) प्रभाव का भी निर्धारण करता है। यही कारण है कि सामाजिक चेतना के संबंध में सामाजिक अस्तित्व की निर्धारक भूमिका से संबंधित यह प्रस्थापना ऐतिहासिक भौतिकवाद का एक बुनियादी उसूल है।

इस उसूल ( principle ) से कई नतीजे निकलते हैं : (१) सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से बाहर वस्तुगत रूप से अस्तित्वमान होता है ; (२) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है ; (३) प्राथमिक तथा भौतिक होने की वजह से सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु तथा रूप, दोनों का नियमन करता है ; (४) सामाजिक चेतना में होनेवाले सारे परिवर्तन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः सामाजिक अस्तित्व में परिवर्तन के कारण होते हैं ; (५) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व के परिवर्तन तथा विकास पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है, किंतु अंततः यह प्रभाव स्वयं सामाजिक अस्तित्व के विकास तथा कार्यात्मकता के वस्तुगत नियमों से निर्धारित होता है ; (६) सामाजिक विकास के सारे नियम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल पर आधारित हैं और उनका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण इसी से मिलता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल इस प्रस्थापना की सटीकता पर बल देता है तथा उसे अभिपुष्ट करता है कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( formations ) के सिद्धांत में अत्यंत पूर्णता से मूर्त होता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना
( social being and social consciousness )

सामाजिक अधिरचना ( social superstructure ) के मुख्य तत्वों, यानी राज्य, पार्टियों तथा सामाजिक संगठनों के क्रियाकलाप में दो पक्षों, यानी आत्मिक ( spiritual ) और भौतिक ( material ), की अंतर्क्रिया ( interaction ) होती है। इस अंतर्क्रिया का नियमन ( regulation ) करनेवाली, सर्वाधिक सामान्य नियमितता ( pattern ) को निरूपित करने के लिए, ऐतिहासिक भौतिकवाद के इन दोनों प्रवर्गों ( categories ), यानी सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझना जरूरी है।

सामाजिक अस्तित्व में, उत्पादन के संबंधों के आधार पर उत्पन्न होनेवाले वस्तुगत ( objective ) सामाजिक और व्यावहारिक संबंधों की समग्रता ( totality ) तथा उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्व ( material elements ) शामिल होते हैं।

सामाजिक चेतना में, समाज के सदस्यों के उन सारे मतों, सिद्धांतों, दृष्टिकोणों, ज्ञान तथा अनुभवों की समग्रता शामिल होती है, जो सामाजिक अस्तित्व के परावर्तन ( reflection ) के ज़रिये उत्पन्न होते हैं। सामाजिक चेतना काल विशेष में समाज विशेष में रहनेवाले लोगों के मानसों ( minds ) का योग मात्र नहीं होती है। यह वह सामान्य ( general ), या वह सर्वनिष्ठ ( common ) है, जो किसी एक प्रदत्त ऐतिहासिक युग में समाज, वर्गों तथा सामाजिक समूहों के सदस्यों की चेतना में निहित होता है।

ये प्रवर्ग, ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के लिए केंद्रीय महत्व के हैं। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों ने अनेक बार कहा है कि वह सामाजिक चेतना को सीधे-सीधे अर्थव्यवस्थाओं से व्युत्पन्न करता है तथा सामाजिक जीवन के सारे पक्षों को महज़ आर्थिक उत्पादन कार्यों तक सीमित करता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद इस तरह की एकांगी और अधिभूतवादी ( metaphysical ) व्याख्याएं प्रस्तुत नहीं करता है, वास्तव में, ये स्वयं पूंजीवादी अध्येता ही हैं, जो ऐसे आदिम ‘आर्थिक भौतिकवाद’ के दोषी हैं। मसलन, अमरीकी समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री वाल्ट रोस्टो ने बुद्धि की अवस्थाओं का सिद्धांत पेश किया, जिसमें यह दावा किया गया कि समाज का सारा विकास उद्योग के विकास द्वारा निर्धारित होता है, कि सारे सामाजिक अंतर्विरोधों ( वर्गों के बीच अंतर्विरोधों सहित ) को आर्थिक क्रियाकलाप में सुधार भर करके तथा भौतिक संपदा की प्रचुरता से सुलझाया जा सकता है। हालांकि यह दृष्टिकोण जीवन के अनुभव से असत्य साबित हो गया है, क्योंकि पूंजीवादी देशों में सर्जित विराट संपदा मेहनतकशों ( working people ) की पहुंच से बिल्कुल बाहर है। फिर भी यह सिद्धांत अब भी बहुत प्रचलन में है।

विश्व में कई देशों की परिस्थितियों के विश्लेषण हमें बताते हैं कि, कई देशों में क्रांतियों और गृहयुद्धों के बाद वहां की उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) तबाह हो गयी थीं, अधिकांश कारखाने और मिलें काम नहीं कर रही थीं, कृषि की उत्पादकता नीचे गिर गयी थी। यानी अर्थव्यवस्था संकटापन्न थी। परंतु इस सबके बावजूद उन देशों में सर्वसाधारण की चेतना क्रांतिकारी थी, वह ऐतिहासिक आशावाद ( optimism ), नयी राजनैतिक व्यवस्था की संभावना पर विश्वास और नये समाज के निर्माण की चाह से ओतप्रोत थी। साथ ही ऐसे कई देशों में, जहां कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं बेहतर स्थिति में थीं, उनकी उत्पादक शक्तियों का स्तर सापेक्षतः ऊंचा था, लेकिन उनकी सामाजिक चेतना आम निराशावादी स्वभाव की थी और सारी आत्मिक संस्कृति संकट में थी। यदि सामाजिक चेतना की अवस्था तथा अंतर्वस्तु केवल उत्पादक शक्तियों तथा अर्थव्यवस्था की हालत से ही निर्धारित होती, तो वस्तुस्थिति बिल्कुल उल्टी होनी चाहिये थी।

वर्तमान हालात में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पूंजीवादी औद्योगिक देशों में संकट की घटनाओं पर क़ाबू पाने, मुद्रास्फीति की दरों में अंशतः घटती होने, बेरोजगारी की बढ़ती बंद होने तथा किंचित आर्थिक उत्थान की उपलब्धि के बाद सार्वजनिक समझ तथा सार्वजनिक मनोदशा सार्विक, प्रशांत ( serene ) आशावाद के अनुरूप हो जाती होगी। लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी कदापि नहीं होती। गहन वैज्ञानिक-तकनीकि क्रांति और समाज में सूचना प्रणाली का द्रुत विकास, जनता के कुछ संस्तरों और व्यावसायिक समूहों के बीच काफ़ी अधिक अस्थायित्व ( instability ) और भविष्य पर अविश्वास को जन्म दे रहे हैं। उद्योगों के स्वचालन ( automation ), रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के सिलसिले में कई कर्मचारियों के सिर पर बेरोज़गारी का खतरा लगातार मंडराता रहता है। नयी तकनीकों से अतिरिक्त धंधों के निकलने का तथ्य भी इस बात की गारंटी नहीं है कि अनेक लोग काम से निकाले नहीं जायेंगे, बेरोजगार नहीं होंगे और सामाजिक संरचना में ‘फालतू’ नहीं हो जायेंगे। इसलिए देशों की ऐसी परिस्थितियों की सामाजिक चेतना में निराशावादी स्वर हावी होता जाता है।

उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि सारे सामाजिक दृष्टिकोणों, सारे मतों, आदर्शों और राजनीतिक सिद्धांतों को प्रत्यक्षतः आधार से, यानी उत्पादन संबंधों से निगमनित ( deduce ) नहीं किया जा सकता है। ये संबंध तथा उनके अनुरूप भौतिक, व्यावहारिक क्रियाकलाप, वास्तव में अन्य सारे संबंधों व क्रियाकलाप के रूपों और सामाजिक प्रक्रियाओं की बुनियाद में निहित होते हैं। किंतु इसका मतलब यह है कि सामाजिक चेतना में केवल उत्पादन संबंध तथा उत्पादन के क्रियाकलाप ही परावर्तित नहीं होते, बल्कि अन्य वस्तुगत सामाजिक संबंध, क्रियाकलाप के रूप ( और उनसे जुड़ी हुई सामाजिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं, यानी सामाजिक अस्तित्व ) भी परावर्तित होते हैं। इस तरह, प्रवर्ग ‘आधार’ और ‘अधिरचना’ यह समझने के लिए अभी भी पर्याप्त नहीं है कि सामाजिक चेतना क्या और कैसे परावर्तित करती है और लोगों के सामाजिक क्रियाकलाप को कैसे प्रभावित करती है।

प्रवर्ग ‘सामाजिक अस्तित्व’, ‘आधार’ ( basis ) से अधिक विस्तृत है, क्योंकि वह केवल उत्पादन संबंधों को ही नहीं, बल्कि उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्वों तथा अन्य सामाजिक संबंधों व संस्थानों और विविध प्रकार के क्रियाकलाप को भी अपने में समेट लेता है। इसके विपरीत प्रवर्ग ‘सामाजिक चेतना’, ‘अधिरचना’ से संकीर्णतर है क्योंकि अधिरचना में सामाजिक चेतना के अतिरिक्त राज्य, पार्टियां तथा वे अन्य संस्थान तथा संगठन भी शामिल हैं, जो सामाजिक चेतना के ‘उत्पादन’ तथा विभिन्न सिद्धांतों, विचारों तथा मतों के सर्जन में लगे हैं और उन्हें कार्यान्वित करने और जीवनीशक्ति प्रदान करने के लिए संघर्ष करते हैं। किंतु ये संस्थान और संगठन स्वयं चेतना से परे वस्तुगत रूप से विद्यमान हैं और उनके भौतिक तत्व सामाजिक चेतना द्वारा परावर्तित होते हैं। इस तरह, सामाजिक चेतना और सामाजिक अस्तित्व का रिश्ता सीधा-सादा नहीं है, यह विभिन्न सामाजिक समूहों, वर्गों तथा सामाजिक संस्थानों के क्रियाकलाप के द्वारा व्यवहित ( mediated ) है।

सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को सिर्फ़ परावर्तित ही नहीं करती, बल्कि प्रतिपुष्टिकर ( feedback ) प्रभाव भी डालती है। मसलन, पूंजीवादी अवधि की सामाजिक चेतना की प्रणाली में और दृष्टिकोणों तथा मतों के साकल्य ( aggregate ) में पूंजीवाद के आंतरिक संकट को परावर्तित करनेवाले क्रांतिकारी विचार उत्पन्न हो सकते हैं। जब ये विचार सर्वसाधारण में घर कर लेते हैं, तो वे क्रांतिकारी क्रियाकलाप में मूर्त हो सकते हैं और स्वयं अपने अस्तित्व या सत्ता को ही परिवर्तित कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप पूंजीवादी अस्तित्व या सत्ता के स्थान पर एक नया अस्तित्व या सत्ता – समाजवादी समाज – उत्पन्न हो सकता है। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को जितनी सटीकता से परावर्तित करती है, उतनी ही अधिक प्रबलता से सामाजिक अस्तित्व को प्रभावित करती है।

ऊपर कही गयी सारी बातों का समाहार करते हुए अब हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूलों ( basic principles ) को निरूपित कर सकते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन
( social organisations in the system of the superstructure )

वर्ग समाजों में राज्य और राजनीतिक पार्टियों के साथ ही साथ विभिन्न सामाजिक संगठन भी अधिरचना का अंग होते हैं। उनकी स्थापना शोषक और शोषित दोनों ही वर्गों द्वारा की जा सकती है। शोषकों के हितों की रक्षा करनेवाले संगठनों के उदाहरण हैं कुलीनों के संघ, धार्मिक संगठन, सामंती समाज में व्यापारियों के संघ और पूंजीवादी समाज में निजी संपत्ति के मालिकों तथा पूंजीपतियों के विभिन्न निगमित ( corporative ) संगठन ( जैसे उद्योगपतियों, बड़े किसानों के संघ, अन्य संस्थाएं )।

वर्ग संघर्ष के विकसित तथा तीक्ष्ण होने तथा मेहनतकशों की वर्ग चेतना बढ़ने के साथ ही साथ उन्होंने भी अपने हितों की रक्षार्थ संगठन बनाने शुरू कर दिये। पूंजीवादी समाज में ऐसे संगठनों में सबसे महत्वपूर्ण ट्रेड-यूनियनें हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए मज़दूर वर्ग के संघर्ष को संगठित करना होता है। ट्रेड-यूनियनों के क्रियाकलाप का स्वभाव इस बात पर बहुत निर्भर होता है कि कौनसी राजनीतिक पार्टियां उन पर प्रभाव डालती हैं। पूंजीवादी विचारक, सुधारक ( reformists ) और संशोधनवादी ( revisionists ), ट्रेड-यूनियनों को पूंजीवादी लक्ष्यों के अंतर्गत लाने और क्रांतिकारी संघर्ष के रास्ते से डिगाकर ऐसी छिटपुट आर्थिक लड़ाइयों की ओर ले जाने की कोशिश करते हैं, जिनसे पूंजीवाद की बुनियाद को कोई हानि नहीं होती। पूंजीवादी देशों में कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ट्रेड-यूनियन आंदोलन में अपने प्रभाव को बढ़ाना है। मज़दूरों की वर्ग चेतना को परिपक्व करने और क्रांतिकारी संघर्षों की राह पर ले जाने के लिए वे ट्रेड-यूनियनों में वैचारिक, शैक्षिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कामों पर बल देते रहते हैं।

समसामयिक पूंजीवादी समाज की अधिरचना में ट्रेड-यूनियनों के अलावा पुरुषों के , महिलाओं के, कलात्मक व साहित्यिक, संगीत, युद्ध विरोधी, खेलों के तथा बहुत सारे अन्य संगठन भी शामिल होते हैं। विभिन्न सामाजिक, सामूहिक और व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व करनेवाले यह संगठन सामाजिक घटनाओं के प्रति अपने रुख़ ( attitude ) में भिन्न-भिन्न होते हैं और समाज के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार का असर डालते हैं। परंतु जब उनके कार्यकलाप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीवादी वर्ग के मौलिक, मूलभूत हितों पर असर डालने लगते हैं, तो उन्हें पूंजीवादी राज्य और उसकी राजनीतिक पार्टियों के घोर विरोध का सामना करना पड़ता है

समाजवादी समाज में मेहनतकशों के हितों को व्यक्त करनेवाले सामाजिक संगठनों की भूमिका लगातार बढ़ती रहती है। उनके क्रियाकलापों का मक़सद समाजवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना, संस्कृति का विकास करना और सामाजिक जीवन के रूपों तथा दशाओं को बेहतर बनाना होता है। सहकारिता ( cooperation ) के विभिन्न रूपों की भूमिका बढ़ती है, जो सामाजिक स्वप्रबंध ( self-managements ) तथा अर्थव्यवस्था के विकास का कारगर साधन होते हैं। समाजवादी जनवाद के और अधिक विकसित होने के साथ-साथ सामाजिक संगठन समाज के प्रशासन में अधिक जटिल और सर्वसमावेशी ( all-embracing ) कार्य करने लगते हैं और अधिरचना में उनका महत्व लगातार बढ़ता जाता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस क्रियाकलाप में आत्मगत ( subjective ) और वस्तुगत ( objective ) कारकों को कैसे मिलाया जाता है और वे कैसे अभिव्यक्त होते हैं, सारे सामाजिक संस्थानों और संगठनों की कार्यात्मकता ( functioning ) में निर्धारक कारक कौनसे हैं और कि क्या उनके क्रियाकलाप में वस्तुगत नियमों ( laws ) और नियमितताओं ( patterns ) को देखा जा सकता है। इस स्थल पर हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के सबसे महत्वपूर्ण प्रवर्गों के, अर्थात ‘सामाजिक अस्तित्व या सत्ता’ ( social being ) और ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ) के निकट आ पहुंचते हैं। इन पर चर्चा अगली बार करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम