अधिरचना की प्रणाली में राज्य – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिरचना की प्रणाली में राज्य – २

( the state in the system of the superstructure – 2 )

समाजवादी समाज में संक्रमण (transition) के साथ एक नये प्रकार के राज्य – समाजवादी राज्य (socialist state) – का जन्म होता है। यह संपूर्ण जनता के राजनीतिक प्राधिकार (authority) का उपयोग करनेवाले संगठन होते हैं। देश की ठोस दशाओं के आधार पर तथा राजनीतिक शक्तियों की अवस्थिति और अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के अनुरूप पूंजीवादी समाज में निर्मित राजकीय तंत्र में कमोबेश गहरे रूपांतरण (transformation) होते हैं और नये क़ानून बनाये जाते हैं। किंतु राजकीय सत्ता के संगठन का कोई एकल (single), अनिवार्य नमूना (obligatory model) नहीं होता, जो सारे देशों और राष्ट्रों के लिए उपयुक्त हो। समाजवादी राज्य की स्थापना में, राष्ट्रीय परंपराओं, राजनीतिक संघर्ष की तीक्ष्णता (acuteness) तथा अन्य कारकों पर निर्भर करते हुए, ठोस रूपों की बड़ी विविधता की पूर्वापेक्षा की जाती है।

इसके अलावा, निर्णायक कारक (decisive factor) शोषक वर्गों के प्रतिरोध का दर्जा होता है। जब राष्ट्रीय बुर्जुआ (bourgeoisie), निम्न बुर्जुआ, किसान तथा बुद्धिजीवी, समाजवादी सुधारों के बुनियादी उसूलों (principles) को स्वीकार कर लेते हैं, तो उन्हे व्यापक जनवादी आधार पर, नयी राजकीय प्रणाली में सहयोग करने को तत्पर आबादी के सारे संस्तरों (strata) की सहभागिता के साथ शनैः शनैः संपन्न किया जा सकता है। किंतु अगर समाजवादी सुधारों के ख़िलाफ़ तीक्ष्ण प्रतिरोध होता है, तो राज्य को स्वभावतः पदच्युत शोषकों (overthrown exploiters) को दबाने के लिए नितांत उचित उपाय करने ही होते हैं। किंतु समाजवादी राज्य का मुख्य कार्य दमन (suppression) का नहीं, जो अस्थायी (temporary), क्षणिक (transient) तथा प्रतिरक्षात्मक (defensive) स्वभाव का होता है, बल्कि रचनात्मक (creative) होता है, सामाजिक न्याय, समानता, जनवाद तथा मानवतावाद के उसूलों के आधार पर नये समाज के निर्माण में जुटे अवाम का नेतृत्व होता है।

सर्वहारा अधिनायकत्व (dictatorship of proletariat) नये समाज के निर्माण में निर्णायक भूमिका अदा करता है और उसके दृढ़ीकरण (consolidation) के दौरान स्वयं भी परिवर्तित होता है। अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के बाद सर्वहारा का अधिनायकत्व, सारे मेहनतकशों के राजनीतिक संगठन में विकसित हो जाता है और सर्वहारा राज्य सारे जनगण का ऐसा राज्य बन जाता है, जो समस्त जनगण के हितों को व्यक्त करता है। समाज के साम्यवादी (communist) संगठन की ओर विकास के दौरान राज्य के प्रशासनिक, संगठक तथा शैक्षिक कार्य अधिक घनीभूत और विस्तृत हो जाते हैं। उनमें से कुछ कार्य विभिन्न सामाजिक संगठनों और श्रम समष्टियों के द्वारा संपन्न होने लगते हैं। इसमें समाजवादी समाज का जनवादी चरित्र अभिव्यक्त होता है।

जब समुचित सामाजिक-राजनीतिक और वैचारिक दशाओं का निर्माण तथा प्रशासन और प्रबंध में सारे नागरिकों की सहभागिता होने लगेगी तथा बाहरी ख़तरे समाप्त हो जाएंगे एवं समुचित अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां मौजूद होंगी, तब ही एक समाजवादी राज्य एक संक्रमणात्मक रूप ग्रहण करेगा – राज्य से राज्यहीनता (non-state) की तरफ़ जाने का – और अधिरचना के एक विशेष राजनीतिक तत्व के रूप में राज्य की आवश्यकता शनैः शनैः लुप्त हो जायेगी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: अधिरचना की प्रणाली में राज्य – ३ | समय के साये में

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