समाज के आधार और अधिरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के आधार और अधिरचना को समझने और सुपरिभाषित करने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के आधार और अधिरचना

( basis and superstructure of the society )

ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( historical idealism ) के दृष्टिकोण से समाज अलग-अलग व्यक्तियों और ऐसे एकल व्यक्तियों का समुच्चय है, जो निर्णय लेते हैं और ख़ुद जोखिम उठाकर लागू करते हैं। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति   जैसे एक वीरान द्वीप में अकेले रहनेवाला, एक प्रकार का रॉबिन्सन क्रूसो है। ऐसे विचार घोर व्यक्तिवाद ( extreme individualism ) को व्यक्त करते हैं। बेशक, समाज के मामलों में व्यक्तिगत पहल, अविष्कार तथा उद्यम ( enterprise ) ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनके द्वारा अनेक जटिल समस्याओं का समाधान हुआ है, किंतु व्यक्तिवाद का अर्थ, व्यष्टिक ( individual ) क्रियाकलाप के महत्व को मानने तथा उसे उचित ठहराने में नहीं, बल्कि उसे जनगण की सामूहिक, संयुक्त कार्र्वाइयों और जनता की एकजुटता की संभावना ही के ख़िलाफ़ खड़ा करने और सामूहिक/सामाजिक मूल्यों और आधारों को नकारने में निहित है। परंतु इसके बावजूद, वर्ग संघर्ष, ट्रेड-यूनियनों, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के कार्यों, आदि कि बुनियाद में समान लक्ष्यों तथा हितों के आधार पर निर्मित ऐसी ही एकजुटता अंतर्निहित होती है।

समाज की प्रत्ययवादी तथा व्यक्तिवादी संकल्पना के विपरीत ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) इसे एक जटिल प्रणाली ( complex system ) या एक ऐसा सामाजिक अंगी ( social organism ) मानता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न सामाजिक बंधनों और संबंधों के ज़रिये अन्य सबसे जुड़ा होता है। समाज को समझने और उसके विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) के नियमों का अध्ययन करने के लिए ज़रूरी है कि सबसे पहले मौजूदा सामाजिक बंधनों ( ties ), संबंधों और प्रक्रियाओं को समझा जाये। ऐसे स्थायी बंधनों और संबंधों ही के कारण, पीढ़ियों में परिवर्तन के बावजूद समाज की मुख्य विशेषताएं सदियों तक बनी रहती हैं, वह एक ही वस्तुगत प्रतिमान ( objective patterns ) से संचालित होता है। अतः समाज की जीवन को समझने की कुंजी अलग-अलग ‘रॉबिन्सन क्रूसोओं’ के अध्ययन में नहीं, बल्कि उन सामाजिक संबंधों व संयोजनों ( connections ) के अध्ययन में निहित है, जो लोगों के विभिन्न समूहों और अलग-अलग व्यक्तियों को अपने दायरे में ले लेते हैं।

इनमें से कौनसे संबंध निर्धारक ( determinant ) हैं? उत्पादन पद्धति ( mode of production ) को समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता के आधार के रूप में मान्यता देकर ऐतिहासिक भौतिकवाद इस बात को मान्यता देता है कि उत्पादन संबंध ( relation of production ) ही निर्धारक हैं। अन्य सारे संबंध और क्रियाकलाप के रूप ( मसलन, पारिवारिक-घरेलू, क़ानूनी, नैतिक, राजनीतिक, कलात्मक, सौंदर्यात्मक, सैनिक, राष्ट्रीय व अन्य संबंध ) और उनके अनुरूप चेतना भी, वस्तुतः उत्पादन संबंधों के आधार पर ठीक वैसे ही बनते हैं, जैसे आधारशिलाओं पर एक इमारत बनायी जाती है। इसलिए समाज की आर्थिक प्रणाली की रचना करनेवाले उत्पादन संबंधों को समाज का आधार ( basis ) और वैचारिक, क़ानूनी तथा राजनीतिक संबंधों तथा उन सार्वजनिक संगठनों व संस्थानों को, जिनके ज़रिये ये संबंध कार्यान्वित होते हैं, समाज की अधिरचना ( superstructure ) कहा जाता है। अधिरचना में सामाजिक चेतना के वे विभिन्न रूप भी शामिल हैं, जो वस्तुगत सामाजिक घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को परावर्तित ( reflect ) करते हैं।

अधिरचना, आधार पर निर्मित तथा उससे निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि आधार पर एक सक्रिय प्रतिप्रभाव ( active feedback effect ) भी डालती है। इसलिए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि वर्ग समाजों ( class societies ) की अधिरचना में वे सार्वजनिक संगठन व संस्थान शामिल होते हैं, जो विभिन्न सामाजिक समूहों तथा वर्गों के हितों ( interests ) को व्यक्त करते हैं और इस कारण से आधार पर भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभाव डालते हैं। कुछ, उन वर्गों और सामाजिक समूहों के हितों को व्यक्त करते हुए उसे मजबूत और ठोस बनाते हैं, जिनके लिए यह आधार समाज में प्रभावी स्थिति ( dominant position ) को सुनिश्चित बनाता है। अधिरचना के, अधिकारविहीन व सत्ताविहीन शोषित वर्गों और समूहों के हितों को व्यक्त करनेवाले अन्य तत्व, आधार को कमजोर बनाते हैं और उसे परिवर्तित करने तथा अंततः नये उत्पादन संबंधों, नयी उत्पादन पद्धति और फलतः एक नयी सामाजिक प्रणाली की स्थापना का प्रयास करते हैं। वर्ग समाजों में अधिरचना के सबसे महत्वपूर्ण तत्व राज्य और राजनीतिक पार्टियां हैं। अब हम अधिरचना की इन सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाओं की तरफ़ ध्यान देंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: समाज में वर्ग और वर्ग संघर्ष | समय के साये में

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