समाज के भाववादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, हम यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद पर एक शृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश करते हुए, अगली बार से हम विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज की भौतिकवादी संकल्पना और इसका इतिहास

समाज के भाववादी/प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

( idealist and materialist conceptions of society )

जिस तरह कि हम भूतद्रव्य ( matter ) और चेतना ( consciousness ) के मामले में पहले देख चुके हैं, सामाजिकआस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) के बीच संबंध और प्राथमिकता वाले प्रश्न, यानी कि किस चीज़ को आद्य ( primitive ), प्राथमिक, निर्धारक, दुनिया का आधार माना जाये – सत्ता या चेतना को? का उत्तर सभी कालों के दार्शनिकों को दो मूल विरोधी शिविरों – भौतिकवादी और भाववादी – में विभाजित कर देता है। इन मूल धाराओं की कई थोड़ी अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आती जाती हैं जो कि कुछ सैद्धांतिक मत-भिन्नताएं रखती हैं फिर भी उनके सारतत्व ( essence ) के अनुसार वे अंततः किसी एक धारा के अंतर्गत पहचानी जा सकती है।

समाज के भौतिकवादी और भाववादी दृष्टिकोणों के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने के लिए हम यहां उनकी कुछ मूल प्रस्थापनाओं को देख सकते हैं।

आत्मगत भाववादियों ( subjective idealists ) के अनुसार भौतिक वस्तुएं एक दूसरे से मिलती जुलती होती हैं किंतु लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी अद्वितीय व्यष्टिकता ( inimitable individuality ) है, जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करती है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के क्रियाकलाप के कोई वस्तुगत ( objective ) नियम नहीं होते क्योंकि वे व्यक्तिगत अद्वितीय लक्ष्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। और जो भी अद्वितीय तथा सांयोगिक है, वह नियमों से संचालित नहीं हो सकता। इसलिए वे समाज में मुख्य चीज़, उसके लक्ष्य ( aims ), संकल्प ( will ) तथा अलग-अलग लोगों के इरादों को मानते हैं। यह धारा सबसे अधिक दिलचस्पी महान व्यक्तियों में दिखाती है क्योंकि वे समूहों को अपनी और आकृष्ट करते हैं, एक ऐसे चयनित पथ पर उनका नेतृत्व करते हैं जिसका कोई पूर्वज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वे रचनात्मक व्यक्ति होते हैं। इनका मानना है कि समाज के विकास के बारे में बातें करना निरर्थक है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के विकास की ही बातें की जा सकती हैं।

वस्तुगत भाववादी ( objective idealists ) उपरोक्त से भिन्न यह सोचते हैं कि लोग सामान्य नियमों के अधीन हैं और उनसे संचालित होते हैं। परंतु ये सामान्य नियम, विचारों के, सामाजिक चेतना के विकास के नियम हैं जो हर युग में व्यक्तियों, व्यष्टिक कामनाओं ( desires ) और संकल्पों को संचालित करते हैं। मसलन, मध्ययुग में लोग बड़े पैमाने पर धर्मप्रवण थे क्योंकि ईश्वर का प्रत्यय ( idea ) प्रभावी था। इंगलैंड और फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति की पूर्वबेला में स्वतंत्रता का विचार प्रमुख था और बुर्जुआ वर्ग ने सामंतवादी राज्य-तंत्रों के ख़िलाफ़ संघर्ष में इसका उपयोग किया। इनके अनुसार इसी तरह हमारे युग में यदि सार्विक कल्याण तथा वर्ग भ्रातृत्व ( class brotherhood ) के विचार आम हो जाते हैं और अगर वे लोगों के मन में घर कर लेते हैं, तो वर्ग संघर्ष ( class struggle ) सहित सारा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा और मौजूदा सामाजिक प्रणाली हमेशा के लिए अभिपुष्ट ( confirmed ) हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, लोग हमेशा किन्हीं विचारों के अनुसार व्यवहार करते हैं। जरूरी सिर्फ़ यह है कि इन विचारों को सही ढंग से समझा जाये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) इन दोनों मतों के अधिभूतवादी उपागम ( metaphysical approach ) को सामने लाता है। ये मत अधिभूतवादी इसलिए हैं कि ये यथार्थता ( reality ) के एक पक्ष ( aspect ) को लेकर उसे दूसरे पक्षों के मुक़ाबले में रख देते हैं और इस तरह यथार्थ को समग्रता ( totality ) में नहीं देख पाते। आत्मगत और वस्तुगत भाववाद यह नहीं समझा सकते हैं कि समाज दासप्रथात्मक, सामंतवादी, पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं से ही होकर क्यों गुजरता है? यदि समाज में वस्तुगत नियम और प्रतिमान ( pattern ) नहीं हैं, तो इंगलैंड, फ्रांस, अमरीका, नीदरलैंड आदि देशों में संपन्न पूंजीवादी क्रांतियों के लक्षणों की समानताओं का क्या कारण है? यदि सब कुछ व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता पर निर्भर है, तो विश्व में समाज के विकास का प्रतिरूप लगभग एक जैसा क्यूं है और क्यों कुछ देशों ने समाजवाद की राह पकड़ी?

भाववाद इस तथ्य का कोई सार्थक स्पष्टीकरण नहीं दे पाता है कि कि एक युग में कुछ विचार प्रमुख होते हैं और दूसरे युग में दूसरे विचार और बहुधा विरोधी विचार प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का विचार, प्राचीन काल में उत्पन्न क्यों नहीं हो सकता था? इसके अलावा, भाववादी विचार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अवाम एक ऐतिहासिक युग में कुछ नेताओं का अनुसरण ( follow ) करते हैं और अन्य के दृष्टिकोणों ( views ) तथा आह्वानों ( calls ) को ठुकरा देते हैं। इतिहास में ऐसी अवधियां थीं, जब अवाम ने स्वयं अपनी ही पांत के लोगों की अगुआई में चलनेवाले सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

आत्मगत और वस्तुगत भाववाद इनमें से किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देते हैं, जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो सामाजिक समस्याओं की अत्यधिक जटिलता ( complexity ) को मान्यता देता है, ऐसे सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है जो कि अपनी सक्रिय स्थिति को विकसित और विस्तारित ( elaborate ) कर सकते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय अविराम

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  1. Trackback: मनुष्य व उसके क्रियाकलाप | समय के साये में

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