पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष की चर्चा के साथ इस श्रृंखला का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष
( ecological consciousness and ideological struggle )

11-20प्रकृति के विकास तथा सामाजिक विकास के नियम वस्तुगत ( objective ) ढंग से संक्रिया करते हैं, किंतु उनका कार्यान्वयन सचेत ( conscious ) लोगों के क्रियाकलाप द्वारा होता है। प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), प्रकृति के विकास तथा समाज के विकास दोनों के नियमों के अनुसार, यानी सामाजिक चेतना के एक विशेष रूप अर्थात पारिस्थितिक चेतना के रूप में होना जरूरी है। मनुष्य और समाज को प्रकृति के महत्व का बोध धीरे-धीरे, सदियों के दौरान होता है। किंतु पारिस्थितिक चेतना सापेक्षतः हाल ही में, चंद दशकों के दौरान बनी है।

इसका विशेष लक्षण यह है कि यह एक प्रकार की सामूहिक सामाजिक चेतना है, जो उस वास्तविक, जटिल, अंतर्विरोधी तथा अत्यंत ख़तरनाक स्थिति को परावर्तित ( reflect ) करती है जो आधुनिक जगत में पारिस्थितिक संतुलन की गड़बड़ी, पर्यावरणीय प्रदूषण, प्राकॄतिक संसाधनों के ख़त्म होने के ख़तरे तथा वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक नतीजों के रूप में मनुष्यजाति के सामाजिक पतन की सम्भावना के परिणामस्वरूप बनी है। शुरू में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डाक्टरों, लेखकों व कलाकारों के अलग-अलह समूहों, विभिन्न जातीय समूहों, आदि द्वारा इन परिणामों के खिलाफ़ प्रतिरोध की शक्ल में उत्पन्न पारिस्थितिक चेतना ने अब सारे देशों के सैकड़ों लाखों के दिल-दिमाग़ों में घर कर लिया है।

इसके विकास का एक सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निष्कर्ष है कि पारिस्थितिक संतुलन की पुनर्स्थापना और प्रकृति की सुरक्षा तथा ‘पुनर्वास’ ( rehabilitation ) सार्विक ( universal ) दिलचस्पी और सार्विक मूल्य के हैं। किंतु इससे यह तथ्य अपवर्जित ( exclude ) नहीं होता कि पारिस्थितिक चेतना के दायरे के अंतर्गत तीव्र वैचारिक संघर्ष चलाया जा रहा है और उसका चलना जारी रहेगा। विकसित पूंजीवादी देशों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के उत्साही समर्थक पारिस्थितिक महाविपत्ति के ख़तरे को मान्यता देते हुए इसका दोष विकासमान देशों के जनगण पर उन मेहनतकशों पर मढ़ने की चेष्टा कर रहे हैं, जो, उनके कथनानुसार, प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।

इनके विपरीत ‘ग्रीन्स’ ( Greens ) के विचारक सारी पारिस्थितिक विपदाओं का दोष बड़े पैमाने के उद्योग, आधुनिक तकनीक और सारी वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को और साथ ही किसी भी क़ीमत पर ( यहां तक कि प्रकृति के विनाश की क़ीमत पर भी ) इसे आगे बढ़ाने में स्वार्थपूर्ण दिलचस्पी रखनेवाली इजारेदार पूंजी ( monopoly capital ) पर रखते हैं। इस आधार पर बनी तथा विकसित सामाजिक-दार्शनिक प्रवृत्ति को विज्ञान-विरोधवाद ( anti-scientism ) और तकनीक-विरोधवाद ( anti-technicism ) कहते हैं। इसके नेतागणों में आधुनिक समाज की सारी आपदाओं का स्रोत को विज्ञान और इंजीनियरी के विकास में देखने का रुझान ( trend ) है। इन कारकों ( factors ) की भूमिका की अतिरंजना ( exaggeration ) स्वतः ही उद्योग के अमानवीयकरण तथा प्रकृति के विनाश की ओर ले जाती है।

d415711b-d59f-4a28-9811-8e6a6131b1fa-2060x1273वे इस मुसीबत से निकलने का रास्ता वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के अस्वीकरण ( rejection ) में, पूर्व-औद्योगिक, पारंपरिक उत्पादन, वैकल्पिक तकनीकों ( जिनसे उनका तात्पर्य दस्तकारी, आदिम लकड़ी के हलों से खेती, आदि से है ) की ओर वापसी में देखते हैं। किंतु तथ्यतः ये रूमानी आह्वान उनके पीछे छुपे निश्चित वैचारिक उसूलों को परावर्तित करते हैं। मनुष्यजाति के सारे दुर्भाग्यों के स्रोत को विज्ञान व तकनीक में देखते हुए इस प्रवृत्ति के प्रतिपादक वस्तुतः इस मुख्य बात को जाने-अनजाने पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विनाशक परिणाम स्वयं विज्ञान तथा तकनीक पर निर्भर नहीं करते, बल्कि उन्हें इस्तेमाल करने, उनका अनुप्रयोग करने के तरीक़ों पर, उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होते हैं, जिसके अंतर्गत उन्हें काम में लाया जाता है

पारिस्थितिक चेतना में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक यह समझ है कि प्रकृति केवल आर्थिक संसाधनों की एक प्रणाली, मनुष्यजाति के जीवित रहने का केवल एक पूर्वाधार ही नहीं, बल्कि सौंदर्यबोधात्मक ( aesthetic ) तथा नैतिक शिक्षा का, समाज के मानवीकरण का एक सबल कारक भी है।

पर्यावरण की रक्षार्थ कारगर, युक्तिसंगत, सुआधारित ( well-grounded ) उपायों के विकास के लिए वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती – इससे संज्ञान की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी। बल्कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति को, निजी हितों के बजाय समाज के हितों को सर्वोपरि रखने वाली एक इस तरह की सामाजिक प्रणाली ( social system ) में ढालने की जरूरत है जिसमें वह पारिस्थितिक संतुलन के साथ आंगिक रूप से ( organically ) संयुक्त हो और पर्यावरण की अखंडता ( integrity ) था उसका साकल्य ( wholeness ) बरकरार रहे। विज्ञान के अनुप्रयोग तथा नयी तकनीकों के उपयोग के नकारात्मक परिणामों को, स्वयं विज्ञान तथा तकनीक से ही दूर किया जा सकता है। परंतु ऐसा करने के लिए, उनके कार्यान्वयन तथा उनकी कार्यात्मकता ( functioning ) के लिए यह ज़रूरी है कि समाज सबसे पहले महत्तर ( greater ) सामाजिक न्याय की उपलब्धि की ओर उन्मुख हो।

समसामयिक पारिस्थितिक चेतना के विश्लेषण से पता चलता है कि यह स्वयं वैचारिकी का एक विकल्प ( alternative ) या उसका प्रतिपक्षी ( opposite ) नहीं है, क्योंकि पारिस्थितिक चेतना के अंदर एक वैचारिक संघर्ष भी जारी है। केवल ऐसी ही पारिस्थितिक चेतना सामाजिक समस्याओं के रिश्ते की सुस्पष्ट समझ दे सकती है तथा सामाजिक न्याय ( social justice ) के पुनर्निर्माण की ओर ले जा सकती है ; अतंतः केवल यही मनुष्यजाति के एक सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, प्रकृति और समाज की सांमजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया की उपलब्धि करा सकती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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