वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर चर्चा की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम – ३
( scientific and technological progress and its consequences – 3 )

images (4)(५) जैविकी ( biology ) के, विशेषतः जैव तकनीकी, आनुवंशिकी तथा जीन इंजीनियरिंग के विकास से अब जीवित अंगियों की आनुवंशिकता ( heredity ) को नियंत्रित करना संभव हो गया है। निकट भविष्य में जीन इंजीनियरिंग के उपयोग से लोग फ़सलों और पशुओं की उत्पादकता में तीव्र वृद्धि करने में कामयाब हो जायेंगे। इस क्षेत्र की उपलब्धियों से कई बीमारियों का उन्मूलन या रोकथाम करने, स्वास्थ्य में आम सुधार करने तथा जीवन को दीर्घ बनाने की दशाओं का निर्माण हो रहा है।

परंतु पूंजीवादी व्यवस्था में यह लाखों-करोड़ो लोगों को दीर्घकालिक भूख तथा कुपोषण से नहीं बचाता, क्योंकि खाद्य उत्पदन का मुख्य लक्ष्य मनुष्य का कल्याण नहीं, मुनाफ़ा कमाना है। इसके अलावा साम्राज्यवादी, इन जीन इंजीनियरिंग तथा अन्य जैविक विज्ञानों की उपलब्धियों को जैविक, रोगाणु युद्ध की तैयारी के लिए बेज़ा इस्तेमाल कर रहे हैं, मनुष्यजाति के सामने नये ख़तरे पैदा कर रहे हैं। अतः जैविकी का और अधिक सफल विकास, बहुसंख्या के हित में समाज द्वारा उसके नियंत्रण और प्रबंध को आवश्यक बना रहा है।

(६) वैज्ञानिक कृषि तकनीक आधुनिक समाज में अतिमहत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। बात यह है कि लोगों ने अनेक सहस्त्राब्दियों के दौरान कृषि तथा पशुपालन के क्षेत्र में विराट अनुभव अर्जित कर लिया है, जिससे उन्हें आवश्यक खाद्य प्राप्त होता रहा। किंतु अब तथाकथित जनसंख्या विस्फोट के कारण कई देशों में विशेषतः उपनिवेशवाद से मुक्त मुल्कों में परंपरागत ढंग से उत्पादित खाद्य रिज़र्व काफ़ी नहीं है।

आधुनिक विज्ञान ने कृषि के गहनीकरण के कई कारगर तरीक़ों का विकास किया है। उनमें शामिल हैं कारगर उर्वरकों, नवीनतम कृषि यंत्रों व इलेक्ट्रोनिकी का उपयोग, जल निकासी व सिंचाई की जटिल व्यवस्था करना तथा उच्च उत्पादकता वाले मवेशियों और पोल्ट्री तथा नये क़िस्म की फ़सलों का विकास करना। किंतु भिन्न-भिन्न सामाजिक प्रणालियों में इनके परिणाम भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं। मसलन, यूरोप और अमरीका के कुछ देश केवल अपनी ही आबादी के लिए नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भी पर्याप्त खाद्य का उत्पादन कर रहे हैं, परंतु वे खाद्य को अक्सर राजनीतिक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं; जो देश उनकी राजनीतिक नीति का अनुसरण करते हैं वे उन्हें ही अनुकूल और मनचाही शर्तों पर खाद्य की पूर्ति करते हैं।

इससे निम्नांकित निष्कर्ष निकलता है : आधुनिक वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के परिणामों का स्वभाव स्वयं यंत्रों व तकनीक पर या पृथक वैज्ञानिक नतीजों पर निर्भर नहीं होता। यह उनके अनुप्रयोग की परिस्थितियों तथा उसके उद्देश्य पर निर्भर होता है। इस विश्लेषण का दार्शनिक अर्थ यह है कि पर्यावरण के साथ मनुष्य का या प्रकृति के साथ समाज का संबंध, निश्चित सामाजिक दशाओं द्वारा व्यवहित और संनियमित ( governed ) होता है। यदि हम इस संबंध को प्रकृति में गड़बड़ी न करनेवाला और साथ ही मानवजाति के विकासार्थ अनुकूल दशाओं को सुनिश्चित बनानेवाला सांमजस्यपूर्ण और रचनात्मक संबंध बनाना चाहते हैं, यो सबसे पहले और सर्वोपरि समुचित सामाजिक दशाओं का निर्माण करना जरूरी है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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  1. Trackback: पारिस्थितिक चेतना और वैचारिक संघर्ष | समय के साये में

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