वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? – १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा की थी, इस बार से हम वर्तमान वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज के संबंधो को समझने की कोशिश शुरू करेंगे और इसी क्रम में आज देखेंगे कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति से क्या तात्पर्य है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? – १
( what is scientific and technological progress – 1 )

the-progress-of-the-century-the-lightning-steam-press-the-electric-telegraphआज भौतिक संपदा का उत्पादन तथा सेवा क्षेत्र इतनी तेज़ी से विकसित हो रहे हैं कि उत्पादित वस्तुओं की क़िस्में तथा उन्हें बनाने की तकनीक और लोगों की उत्पादन कुशलताएं एक ही पीढ़ी में तीव्रता से बदल जाती है। पूर्ववर्ती अवस्थाओं में से अनेक में स्थिति नितांत भिन्न थी। एक ही उत्पाद को तैयार करने के लिए एक ही तकनीक को कई पीढ़ियों तक इस्तेमाल किया जाता था और पीढ़ी-दर-पीढी काम के संगठन की एक ही विधि का उपयोग होता था। तकनीक में द्रुत ( rapid ) परिवर्तन के साथ होनेवाले उत्पादन के वर्तमान रूप को, वस्तुओं के उत्पादन के पारंपरिक रूप के विपरीत, अनवरत वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति कहा जा सकता है। इस अक्सर वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति भी कहा जाता है। इसके विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उत्पादन में विज्ञान निर्णायक शक्ति और निर्धारक कारक है। पहले भी उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) की रचना करनेवाले लोगों का ज्ञान और अनुभव, औज़ारों को और उत्पादन क्रिया को परिष्कृत बनाने का एक महत्वपूर्ण प्रेरक हुआ करता था, किंतु ज्ञान और अनुभव स्वयं उत्पादन के स्वीकृत और स्थापित रूपों और विधियों के सामान्यीकरण ( generalization ) हुआ करते थे। उत्पादन की नयी खोजें तथा अविष्कार विरल घटनाएं थीं। यहां तक कि जब आधुनिक विज्ञान का उद्‍भव होना शुरू हुआ, तो भौतिक उत्पादन – उद्योग और कृषि – की निर्णायक भूमिका थी।

विज्ञान मुख्य रूप से व्यवहार की मांगों तथा अपेक्षाओं का जवाब देने का प्रयत्न करता था, किंतु यह काम हमेशा पूरा नहीं कर पाता था क्योंकि विज्ञान के विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में ज्ञान का संचय और परिष्करण बेहद मंद गति से होता था। २०वीं सदी के मध्य में इस स्थिति में आमूल परिवर्तन हो गया। ज्ञान के परिमाण में विराट बढ़ती हुई और यह बढ़ती तूफ़ानी वेग से जारी है। साठोत्तरी दशक के अंत और सत्तरोत्तरी दशक के प्रारंभ में वैज्ञानिक ज्ञान का परिमाण प्रति पांच-सात वर्षों में दो गुना होने लगा। अब यह लगभग हर साल दो गुना होता जाता है। इसकी वज़ह से स्वयं विज्ञान, उत्पादन का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेरक बल बन गया है। यह वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति का पहला विशिष्ट लक्षण है।

दूसरा विशिष्ट लक्षण यह है कि प्रकृति के गहनतम रहस्यों की खोज पर आधारित बुनियादी अन्वेषण ( research ) की भूमिका लगातार बढ़ रही है। नये प्रकार के उत्पाद व तकनीक, सतर्कतापूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणन ( substantiation ) की मांग करते हैं और विज्ञान के सर्वाधिक जटिल बुनियादी नियमों पर आधारित हैं। मसलन, परमाणु ऊर्जा के उपयोग, जीन इंजीनियरी, कृत्रिम भूउपग्रहों, मूलतः नयी सामग्रियों, आदि की याद कीजिये। इनमें से किसी को भी मात्र पूर्ववर्ती अनुभव के आधार पर नहीं रचा जा सकता था, उनके लिए बुनियादी वैज्ञानिक ज्ञान की ज़रूरत थी।

तीसरा लक्षण यह है कि किसी वैज्ञानिक खोज या अविष्कार के होने तथा उद्योग में उसका उपयोग करने के बीच का समयांतराल घटता जा रहा है। जहां पहले नये वैज्ञानिक-तकनीकी विचारों के फैलाव तथा कार्यान्वयन में दसियों वर्ष नहीं, सदियों तक लग जाती थी, वहां अब यह अंतराल चंद वर्षों और यहां तक कि चंद महिनों में नापा जाता है।

अंतिम और चौथा विशिष्ट लक्षण पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की एक नयी अवस्था में संक्रमण ( transition ) से संबद्ध है। पारंपरिक उत्पादन में तकनीक क्या है? उत्पादन की किसी भे प्रक्रिया में केवल औज़ार, मशीनें, यांत्रिक विधियां ही आवश्यक नहीं हैं, बल्कि कार्य प्रक्रिया को सही ढंग से संगठित ( organize ) करना भी ज़रूरी है। इसके लिए यह निर्धारित करने में समर्थ होना महत्वपूर्ण है कि ठीक कौनसी संक्रिया ( operation ) कब संपन्न की जाये तथा किस क्रम में की जाये और विभिन्न संक्रियाएं किस रफ़्तार से की जानी चाहिए तथा अमुक-अमुक उत्पाद के विनिर्माण ( manufacturing ) में विभिन्न उपकरणों, यंत्रों और मध्यवर्ती अवस्थाओं द्वारा क्या अपेक्षाएं पूरी की जानी चाहिए। समुचित ज्ञान सहित इन सबको समग्र रूप में तकनीक कहा जाता है


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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  1. Trackback: वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? – २ | समय के साये में

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