मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक – २
( the biological and social in Man -2 )

tumblr_inline_novz3v6pqg1qkem9x_540सामाजिक और जैविक के संबंध की वास्तविक वैज्ञानिक समझ, प्रकृति और समाज की भौतिकवादी संकल्पना ही दे सकती है। मनुष्य एक जीवित प्राणी है, किंतु ऐतिहासिक विकास के दौरान उसकी जैविक प्रकृति में, श्रम तथा सामाजिक जीवन के उन्नत रूपों के ज़रिये आमूल परिवर्तन हो गया। हालांकि रुधिर परिसंचरण, श्वसन, पाचन, आदि जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं सामान्य जैविक नियमों या शरीरक्रिया के नियमों के अनुसार चलती हैं, फिर भी कुछ हद तक वे भी सामाजिक जीवन की परिस्थितियों पर निर्भर होती हैं।

मनुष्य के व्यवहार और क्रियाकलाप के रूप जितने उच्चतर तथा जटिल होते हैं, सामाजिक नियमों की भूमिका उतनी ही बड़ी होती जाती है। लोगों की अंतर्क्रिया, उनके चिंतन का विकास तथा उनका सामाजिक जीवन अंततोगत्वा उनके भौतिक उत्पादन तथा सामाजिक क्रियाकलाप द्वारा निर्धारित होते हैं। सामाजिक वर्गों तथा समूहों में विभाजन, युद्ध व शांतिपूर्ण सहयोग, पारिवारिक लालन-पालन और संस्कृति का विकास, जैविक नहीं, सामाजिक नियमों के अनुसार होता है। मनुष्य के व्यवहार में सामाजिक क्रियातंत्र के नियम, जैविक क्रियातंत्र के नियमों पर हावी होते हैं, हालांकि वे उनका उन्मूलन ( abolish ) नहीं करते।

इन क्रियातंत्रों ( mechanism ) का विनाशक नहीं, बल्कि सृजनात्मक व रचनात्मक होने के लिए सबसे पहले स्वयं समाज का आमूल रूपांतरण ( radical transformation ) आवश्यक है, न कि मनुष्य की जैविक प्रकृति का पुनर्निर्माण होना

मनुष्य के चरित्र, क्षमताओं तथा व्यवहार के रूपों और उसके रुझानों एवं दिलचस्पियों का बनना उस सामाजिक माध्यम से निर्धारित होता है, जिसमें वह रहता है। रुडयार्ड किपलिंग की एक कहानी का ‘मावग्ली’ में एक ऐसे लड़के की कहानी बतायी गयी है जो भेड़ियों के बीच पला और कालांतर में सामान्य जीवन की ओर लौट आया। अपनी कहानी ‘टार्ज़न आफ़ एप्स’ में एडगर बेरौज़ ने एक ऐसे आदमी की कथा कही है जो वानरों के बीच पला और बाद में पूंजीवादी व्यापार की दुनिया में बहुत सफल सिद्ध हुआ। वास्तव में, जैसा कि पूर्णतः साबित कर दिया गया है, ऐसी बातें नितांत असंभव हैं। वास्तविक मामलों में जो बच्चे जानवरों के बीच जा पड़े और किसी तरह से जीवित बचे रह गये, वे बच्चे कालांतर में सामान्य मानव जीवन बिताने में कभी भी समर्थ नहीं हो पाये।

मनुष्य एक वास्तविक मानवीय प्राणी के रूप में केवल सामाजिक पर्यावरण में ही पल और बढ़ सकता है। केवल इसी के ज़रिये वह भाषा, चेतना, संस्कृति, सामाजिक व्यवहार की आदतों, काम करने तथा विश्व को बदलने में पारंगत हो सकता है। बेशक, किसी भी अन्य जीवित प्राणी की तरह मनुष्य में भी कुछ जैविक सहजवृत्तियां ( instincts ), अंतर्जात ( inborn ) गुण तथा वंशानुगत ( inherited ) विशेषताएं अंतर्निहित होती हैं, किंतु वे मात्र जैविक क्रमविकास का परिणाम नहीं, बल्कि लाखों वर्षों के सामाजिक विकास का फल भी हैं, यही कारण है कि भौतिकवादी दर्शन मनुष्य की जीवन क्रिया के जैविक आधार से इनकार न करते हुए आधुनिक समाज की सारी समस्याओं के समाधान की कुंजी, जैविक के बजाय सामाजिक में खोजता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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  1. Trackback: नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) – १ | समय के साये में

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