पर्यावरण की संरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मत पर चर्चा की थी, इस बार हम पर्यावरण की संरचना पर विचार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


पर्यावरण की संरचना
( the structure of the environment )

2B093D8C00000578-0-image-a-35_1438513924830किसी महानगर की ऊंची इमारत की छत से दृश्यावलोकन करने पर क्षितिज तक फैला छतों का सागर, सड़कों व वीथियों पर चलती मोटरगाडियों की धाराएं और पैदल पथों पर चलते लोगों की छोटी-छोटी आकृतियां दिखायी देती हैं। विशाल नगर और इनकी लाखों की आबादी, जटिल तकनीकी प्रणालियां और शहरी परिवहन प्रत्येक नागरिक को अपने घेरे में लपेटे हुए हैं। यहां प्रकृति केवल पार्कों, हरी घास तथा हरियाली के अलग-अलग खंडों के रूप में ही विद्यमान है। विकसित एवं विकासशील देशों में अधिकांश आबादी नगरों में रहती है और मनुष्य द्वारा निर्मित नगरीय संरचनाओं तथा तकनीकी प्रतिष्ठानों ( installations ) से घिरी होती है। प्रकृति से सीधे संपर्क में रहनेवाले जंगलों, खेतों, स्वच्छ नदियों व झीलों से घिरे देहातवासियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

पर्यावरण एक जटिल प्रणाली ( complex system ) है, जिसमें सब वस्तुएं एक निश्चित ढंग से अंतर्संबधित और तदनुसारी नियमों से संचालित होती हैं। इसकी प्रमुख उपप्रणालियां मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम निवास स्थल ( habitat ) हैं।

प्राकृतिक पर्यावरण ( natural environment ) प्रकृति का एक भाग है जिसके साथ समाज अपने विकास तथा क्रियाकलाप के दौरान अंतर्क्रिया ( interact ) करता है। मानवजाति की शुरुआत में उसका प्राकृतिक निवास स्थल पृथ्वी की सतह का एक छोटा-सा हिस्सा भर था। परंतु अब इसमें पृथ्वी की सतह के साथ ही उसका अभ्यांतर ( interior ), विश्व महासागर, पृथ्वी निकट अंतरिक्ष तथा सौर मंडल का भाग शामिल हैं। इंजीनियरी और विज्ञान के विकास के साथ ही मनुष्य का प्राकृतिक निवास स्थल भी विस्तृत होता गया है एवं और विस्तार लेता जाएगा।

कृत्रिम पर्यावरण, ( artificial environment ) पर्यावरण का वह भाग है जिसे भौतिक उत्पादन के ऐतिहासिक विकास के दौरान मनुष्य ने बनाया ; यह उसकी जीवन क्रिया का उत्पाद है जो स्वयं अपने आप प्रकृति के रूप में विद्यमान नहीं है। कृत्रिम पर्यावरण में मनुष्य द्वारा निर्मित सारे मकानात, नगर, बस्तियां, सड़कें, परिवहन के साधन, औज़ार व उपकरण, तकनीकी यंत्र, कृत्रिम सामग्री, जिसका प्रकृति में अस्तित्व नहीं है, कारख़ाने और संयंत्र शामिल हैं।

इस प्रकार, समाज ऐसी जटिल भौतिक दशाओं ( complex material conditions ) में विकसित होता है, जिसमें मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों निवास स्थल शामिल हैं। इतिहास की भिन्न-भिन्न अवधियों में इन दो उपप्रणालियों की भूमिका और संबंध भिन्न-भिन्न थे और वे मनुष्य के जीवन के क्रियाकलाप को भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभावित करते थे। मनुष्य ने स्वयं भी विभिन्न तरीक़ों से पर्यावरण को प्रभावित किया और उसे बदला ; इस समय उसके जीवन का एक काफ़ी बड़ा भाग उस कृत्रिम माध्यम में गुजरता है जो ख़ुद भी प्राकृतिक पर्यावरण के रूपांतरण ( transformation ) तथा बदलावों ( alteration ) का उत्पाद है।

अब हम यहां कुछ अधिक विस्तार के साथ इस बात की जांच करेंगे कि इतिहास के दौरान समाज तथा पर्यावरण की विभिन्न उपप्रणालियों के बीच अंतर्क्रिया किस प्रकार संपन्न हुई और कैसे बदली।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
Advertisements

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Trackback: मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – १ | समय के साये में

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: