प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत किया था, इस बार हम उसी संवाद के दूसरे हिस्से से गुजरेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद – २
( a dialogue about nature and society – 2 )

lascaux-redआशावादी – आपका पूर्वानुमान क्या है?

निराशावादी – दशकों पहले १९६८ में, रोम में एक स्वैच्छिक सार्वजनिक संगठन ‘ रोम क्लब’ की स्थापना हुई। उसमें सर्वोच्च स्तरीय वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री तथा राजनीतिज्ञ शामिल हैं। उनका पहला निष्कर्ष यह था कि उत्पादन की वृद्धि को रोकना, समाज के विकास की रफ़्तार को रोकना, अनेक देशों में भूखमरी पैदा करनेवाली आबादी की तीव्र बढ़ती को घटाना, अपशिष्ट रहित उत्पादन प्रक्रिया की रचना करना और ‘शून्य वृद्धि’ ( zero growth ) की स्थापना करना आवश्यक है। यह सच है कि बाद में इस क्लब तथा ऐसे ही अन्य संगठनों ने अपने विचार बदल दिये और वे सोचने लगे कि नयी आधुनिक तकनीकें स्थिति को सुधार सकती है, बशर्ते कि ऐसे उद्यम ( industries ) बनाये जायें, जो प्राकृतिक संसाधनों को बचाते हैं और उनकी किफ़ायत करते हैं।

आशावादी – क्या इसका तात्पर्य है कि अगर हम इन सिफ़ारिशों पर ध्यान दें तो मनुष्य को मौत से बचाया जा सकता है और प्रकृति का विनाश रोका जा सकता है? क्या बात ऐसी ही है? तो हमें ऐसा करने से कौन रोक रहा है?

निराशावादी – पहली बात तो यह कि मैंने यह दावा नहीं किया कि ‘रोम क्लब’ तथा प्रकृति की सुरक्षा के अन्य संगठनों की सिफ़ारिशों पर अमल करके मनुष्यजाति को बचाया जा सकता है। इससे प्रकृति को शायद ही मदद मिले। जो नष्ट हो गया है, इस्तेमाल हो गया है और जला दिया गया है, उसे फिर से वापस नहीं लाया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि मनुष्यजाति ने अक़्लमंदी की आवाज़ कभी नहीं सुनी। आज के लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रयत्नों में वह कल के बारे में नहीं सोचती है।

आशावादी – मैं सोचता हूं कि आप ग़लती पर हैं। मनुष्य का सार ( essence ) अपरिवर्तनीय नहीं है, यह बदलता रहता है। लोग जिन सामाजिक दशाओं, सामाजिक प्रणाली और उत्पादन पद्धति के अंतर्गत रहते हैं, उन्हीं के अनुरूप एक या दूसरे ढंग का आचरण करते हैं। जब ये बदल जायेंगी, तो कार्य पद्धति और प्रकृति के प्रति उनके रुख़ ( attitude ) में भी बदलाव हो जायेंगे। मैं सोचता हूं कि तब काफ़ी कुछ को सही करना और स्थिति को आज के मुक़ाबले बेहतर बनाना संभव हो जायेगा।

निराशावादी – परंतु अगर यह किया जा सकता है, तो पिछले कई हज़ार वर्षों के दौरान इस तरह का कुछ क्यों नहीं किया गया?

आशावादी – क्योंकि इन सारे वर्षों में निजी स्वामित्व ( private property ) का बोलबाला रहा और व्यक्तिगत, समूहगत तथा वर्ग हितों और सर्वोपरि निजी उद्यमियों तथा बड़ी इजारेदारियों के हितों को समाज के हितों के ऊपर रखा गया। इस तरह की सामाजिक प्रणालियां और राजनैतिक सत्ताएं रही जो यह सब संभव बनाती रहीं।  इस स्थिति में लोग उन दृष्टिकोणों, मानकों, मूल्यों तथा वैचारिकियों से निर्देशित होते रहे, जिनमें सारी मानवजाति के हितों को और फलतः प्रकृति के साथ तर्कबुद्धिसम्मत, ध्यानयुक्त, औचित्यपूर्ण संबंध के हितों को ध्यान में नहीं रखा गया।

निराशावादी – लेकिन क्या इस स्थिति को बदला जा सकता है?

आशावादी – निस्संदेह।

निराशावादी – कैसे?

आशावादी – मेरा विचार है कि इसका मानवजाति के सबसे बुनियादी हितों, यों कहें कि पर्यावरण के प्रति उसके रुख़ के सार से संबंधित सर्वोत्तम उत्तर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दर्शन ने दिया है। वह क्या है जो इसे अन्य दार्शनिक प्रस्थापनाओं से भिन्न बनाता है? इसका सकारात्मक कार्यक्रम तथा उसके कार्यान्वित करने की संभावनाएं क्या हैं?

इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में हम आगे थोड़ा विस्तार से विचार करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
Advertisements

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Trackback: प्रकृति और समाज पर प्राचीन विचार | समय के साये में

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: