प्रकृति और समाज – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधों पर चर्चा की शुरु की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रकृति और समाज – २
( nature and society – 2 )

_atmospheric_winds__by_karla_nolan__palette_knife__f670f86cf1c8cc9e85345cfde32038ddयह बात आसानी से ध्यान में आ जाती है कि भूतद्रव्य ( matter ) तथा चेतना ( consciousness ) के संबंध का प्रश्न, जिससे हम पहले से ही परिचित हैं, मनुष्य और प्रकृति के अंतर्संबंध में पुनः प्रकट होता है। लेकिन हम अभी इसकी एक विशेष दृष्टिकोण से जांच करेंगे। यह दृष्टिकोण क्या है? बात यह है कि लोग प्रकृति में प्रबल परिवर्तन करते समय प्राकृतिक हालतों को गड़बड़ा देते हैं, जिनमें बहुधा प्रकृति का विनाश होता है और अपनी बारी में यह स्वयं लोगों की जीवन दशाओं पर नकारात्मक, अवांछित असर डालती है

पिछले कई दशकों में आधुनिक उपकरणों की शक्ति में भारी वृद्धि, विशाल शहरों, सड़कों, औद्योगिक उद्यमों तथा परिवहन प्रणालियों के निर्माण से पर्यावरण पर मनुष्य का प्रभाव अनेक बार बढ़ा और इतना विनाशक हो गया है कि लोगों के बीच प्रकृति की मौत तथा पर्यावरण के संकट की बातें आम हो गई हैं। विचारों की प्रवृत्ति – संत्रासवाद ( alarmism ) – भी पैदा हो गयी है, जो यह दावा करती है कि समाज का विकास हमारे प्राकृतिक पर्यावरण के पूर्ण विनाश और फलतः स्वयं मानवजाति की मौत की तरफ़ ले जा रहा है। संत्रासवादियों की राय में एक ऐसी अंधी गली आ पहुंची है, जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। कुछ धार्मिक कार्यकर्ताओं को तो इसमें विश्व की आसन्न समाप्ति के चिह्न दिखायी देते हैं। संत्रासवाद, ऐतिहासिक निराशावाद ( historical pessimism ) का एक आधुनिक रूप है।

लेकिन हमारे युग में ऐतिहासिक आशावाद ( historical optimism ) का अस्तित्व भी है, जिसके प्रतिपादकों का विश्वास है कि मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) और सद्‍भावना, प्रकृति को संरक्षित ( preserve ) तथा पुनर्जीवित ( restore ) करने में सहायता दे सकती है, बशर्ते कि उन्हें सही दिशा में लगाया जाये और कि समुचित सामाजिक स्थितियां हों तथा भविष्य में प्रकृति व समाज के बीच अधिक सही और सामंजस्यपूर्ण ( harmonious ) संबंध क़ायम किये जायें।

प्रकृति और समाज के अंतर्संबंध तथा अंतर्विरोधों ( contradictions ) को लेकर चलनेवाले विवाद अधिकाधिक तीव्र होते जा रहे हैं और मनुष्य के परिवेशीय जगत के साथ उसके संबंधों तथा स्वयं मानव समाज के अस्तित्व से संबंधित अत्यंत गहन समस्याओं को छूने लगे हैं। सारे देशों की आबादी के अधिकाधिक व्यापक अंचल ( मज़दूर, इंजीनियर, किसान, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक व कलाकार ) उनमें शामिल होने लगे हैं। इन मामलों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन किये जा रहे हैं। कई देशों में प्रकृति के साथ समाज के संबंधों का नियमन ( regulate ) करने के लिए विशेष क़ानून बनाये गये हैं। इन सब बातों से यह प्रदर्शित होता है कि आधुनिक काल के बौद्धिक सारतत्व के रूप में तथा प्रकृति, समाज और चिंतन के सर्वाधिक सामान्य नियमों की शिक्षा के रूप में दर्शन ( philosophy ) को इस जीवंत महत्व की समस्या के वैज्ञानिक, भौतिकवादी समाधान में सक्रिय भूमिका अदा करनी ही चाहिए।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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प्रकृति और समाज – १

हे मानवश्रेष्ठों,

दर्शन पर यहां प्रस्तुत की गई अभी तक की सामग्री में हम भूतद्रव्य और चेतना के संबंधों पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं और द्वंद्ववाद पर भी। अब हम समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिश करेंगे। इसी हेतु यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला की शुरुआत की जा रही है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रकृति और समाज – १
 ( nature and society – 1 )

idabagusnadera_pitamaha2_traditionalbalinesepainting_balibravo_masterpiecemuseum_balipainting_auctionhouse_tegalinggah_gianyar_prewarart_asianart_komangaryartइस चर्चा के संदर्भ में प्रश्न यह उठता है कि प्रकृति और समाज के अंतर्संबंध पर बहस का दर्शन से क्या रिश्ता है। मामले के सार को समझने के लिए हमें सबसे पहले प्रकृति की परिभाषा करनी चाहिए और यह जानना चाहिए कि इस संकल्पना ( concept ) को उपयोग में लाते समय हमारा दृष्टिकोण और अभिप्राय क्या होता है।

प्रकृति संपूर्ण ब्रह्मांड नहीं है और हमें ज्ञात सारा विश्व नहीं, बल्कि उसका वह भाग है, जिसका मनुष्य से सामना पड़ता है और वह एक या अन्य ढंग से उसके साथ प्रतिक्रिया करता है और जो कमोबेश स्पष्ट ढंग से समाज के विकास पर प्रभाव डालता है। बेशक, प्रकृति की व्याख्या इससे ज़्यादा विस्तृत रूप में की जा सकती है, लेकिन तब शुरुआत में उठाया गया हमारा प्रश्न अपनी स्पष्टता गंवा देता है। इसलिए प्रकृति से हमारा तात्पर्य मुख्यतः उस हर वस्तु से होगा, जो पृथ्वी की सतह पर अस्तित्वमान है, उसके आभ्यंतर ( interior ) में और पृथ्वी के इर्दगिर्द अंतरिक्ष ( अंतरिक्ष के उस भाग सहित, जिसके साथ मनुष्य अंतर्क्रिया करने लगा है तथा जिसमें वह विज्ञान व इंजीनियरी की उपलब्धियों की बदौलत अधिकाधिक प्रविष्ट होने लगा है ) में होती है। इस अर्थ में मानव समाज स्वयं प्रकृति के विकास का एक उत्पाद है।

परंतु प्रकृति और समाज के बीच एक बुनियादी, गुणात्मक ( qualitative ) अंतर है। यह अंतर इसमें निहित है कि प्रकृति अपने ही वस्तुगत नियमों ( objective laws ) से, जो व्यष्टिक ( individual ) और सामाजिक चेतना से परे स्वतंत्र रूप से संक्रिया करते हैं, विकसित होती तथा कार्य करती है। परंतु समाज के क्रियाकलाप के नियम वस्तुगत होने के बावजूद तर्कबुद्धिसंपन्न मनुष्य की चेतना तथा क्रियाकलाप से जुड़े होते हैं। यह अंतर हमें प्रकृति और समाज के अंतर्संबंध के सवाल के दार्शनिक महत्व को समझने में मदद देता है।

मनुष्य अपने क्रियाकलाप में प्रकृति को आधार बनाता है, प्रकृति में रहता है, उसके प्रभावों का पात्र होता है और उससे प्राप्त हुई संपदा, साधनों तथा जीवन की दशाओं का उपयोग करता है। साथ ही अपने लक्ष्यों का अनुसरण करते हुए लोग ऐसी नयी चीज़ों व औज़ारों, संरचनाओं तथा परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, जो प्रकृति में मनुष्य के बिना अस्तित्वमान नहीं होती और मनुष्य के उद्‍भव से पहले अस्तित्वमान नहीं हो सकती थीं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम