गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण पर चर्चा की थी, इस बार हम आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान
( application of mathematics and modern science )

math.jpg__800x600_q85_cropएक चौकोर मैदान के क्षेत्रफल को नापने के वास्ते एक मापने के दंड का उपयोग करने के बजाय हम केवल उसकी दो समलंब भुजाएं माप सकते हैं और फिर प्राप्त अंकों को गुणा करके पल भर में सारे मैदान का क्षेत्रफल नाप सकते हैं।

विज्ञान, इंजीनियरी तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में गणित का महत्व और अनुप्रयोग इस तथ्य पर आधारित है कि हम नापजोख के विभिन्न साधनों के द्वारा भौतिक वस्तुओं तथा उनके अनुगुणों पर कुछ अंकों को आरोपित कर सकते हैं और उसके उपरांत वस्तुओं के साथ श्रमसाध्य क्रियाएं करने के बजाय कुछ गणितीय नियमों के अनुसार इन अंकों के साथ संक्रियाएं ( operations ) कर सकते हैं। उसके पश्चात हम प्राप्त अंकों को पुनः भौतिक वस्तुओं पर लागू कर सकते हैं और उन्हें वस्तु के अन्य अनुगुणॊं तथा विशेषताओं को जानने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। परिमाण ( quantity ) और गुण ( quality ) का द्वंद्वात्मक संयोजन इस बात में स्पष्टतः अभिव्यक्त होता है। गणित कुछ सीमाओं के अंदर वस्तुओं के परिमाणात्मक लक्षणों के ज़ारिये उनकी असीम व विविधतापूर्ण गुणात्मक विशेषताओं का वर्णन करना संभव बना देता है। चूंकि परिमाणात्मक लक्षणों का वर्णन सापेक्षतः सुस्पष्ट, सरल सूत्रों तथा समीकरणों में व्यक्त गणितीय क़ायदों से किया जा सकता है, इसलिए वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) के संज्ञान की प्रक्रिया सरलीकृत, द्रुत और सुविधापूर्ण हो जाती है।

हमारे युग में गणित ने विज्ञान की अनेक शाखाओं में पैठ बना ली है। अब वैज्ञानिकगण ऐसे अधिकाधिक जटिल अमूर्तों, अपकर्षणों ( abstractions ) का उपयोग करने लगे हैं, जिन्हें संवेद बिंबों ( sensory images ) में परिणत नहीं किया जा सकता है, इसलिए नियमों तथा सिद्धांतों को जटिल गणितीय समीकरणों के ज़रिये निरूपित करना होता है। बीसवीं सदी के मध्य से कंप्यूटरों का बहुत तेज़ी से विकास हुआ और अब उनकी बदौलत अत्यंत जटिल गणनाओं को पूर्वलिखित कार्यक्रमों ( programmes ) के ज़रिये शीघ्रता से और विश्वसनीय ढंग से करना और उन समस्याओं को हल करना संभव हो गया है जो पहले व्यक्ति के लिए या तो बेहद कठिन या अत्यंत श्रमसाध्य होती थीं।

गणित, ऐसे पूर्णतः प्रमाणित प्रमेयों ( theorems ) तथा क़ायदों ( rules ) पर आधारित है, जो वस्तुगत सत्य हैं, किसी के संकल्प या इच्छाओं पर निर्भर नहीं है और इसीलिए हमारे परिवेशीय जगत के बारे में निश्चित ज्ञान हासिल करना संभव बनाता हैं। किंतु जिस प्रकार परिणाम को गुण से विच्छेदित नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार संज्ञान की गणितीय विधि को विभिन्न विज्ञानों की गुणात्मकतः भिन्न अन्य विधियों से विच्छेदित नहीं किया जा सकता है। समसामयिक वैज्ञानिक ज्ञान की सारी विधियों का एकत्व ( unity ) ही, उनके वस्तुगत सत्य की और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर उनके प्रभाव की गारंटी करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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  1. Trackback: द्वंद्ववाद श्रॄंखला – समाहार | समय के साये में

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