सिद्धांत और प्राक्कल्पना – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना – २
( theory and hypothesis – 1 )

2-knowledge-leon-zernitskyवैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) के अन्य फ़ायदे ( advantages ) भी हैं। वे हमें जैसे व्यावहारिक क्रियाकलाप के लिए हिदायतें ( instructions ) और विश्वसनीय क़ायदे ( rules ) प्रदान करते हैं और वस्तुगत जगत ( objective world ) की घटनाओं को प्रणालीबद्ध ( systematize ) तथा वर्गीकृत ( classify ) करना संभव बनाते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांतों में निहित नियमों की इन संभावनाओं का कारण क्या है? बात यह है कि विज्ञान के नियम वस्तुगत यथार्थता ( reality ) के नियमों का परावर्तन ( reflection ) हैं। यथार्थता के नियमों का, चाहे उन्हें मनुष्य ने खोजा हो या न खोजा हो, स्वतंत्र ( independent ) अस्तित्व है। लेकिन हम अपने क्रियाकलाप में उन पर तभी भरोसा कर सकते हैं तथा उन्हें समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जब उनकी खोज कर ली गयी हो, वे ज्ञात हों और विज्ञान के नियमों की शक्ल में निरूपित ( formulated ) कर दिये गये हों।

एक उदाहरण से यह बात अधिक स्पष्ट हो सकती है। हम जानते हैं कि रासायनिक तत्वों ( elements ) का आवर्तता ( periodic ) नियम, विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की भौतिक संरचना के वस्तुगत, आवश्यक आंतरिक संयोजनों ( necessary inter connections ) तथा रासायनिक अनुगुणों ( chemical properties ) को परावर्तित करता है। इस नियम के आधार पर हम किसी भी रासायनिक तत्व के अनुगुणों को स्पष्ट कर सकते हैं, बशर्ते कि हमें तालिका में उसके स्थान की जानकारी हो और हम इस नियम से अभी भी अज्ञात तत्वों के अनुगुणों का पूर्वानुमान ( prediction ) लगा सकते हैं। स्वयं मेंदेयलेव ने कुछ अज्ञात तत्वों के अनुगुणों की भविष्यवाणी की थी और तत्पश्चात इसी के आधार पर कई और पूर्वानुमान लगाये गये, उनकी और कई नये तत्वों की खोज की गई। इसके अलावा, इस वैज्ञानिक सिद्धांत ने नये तत्व के संश्लेषण ( synthesis ) के प्रायोगिक कार्यों के वास्ते जैसी हिदायते भी दीं। हम समझ सकते हैं कि इस मामले में प्रयत्न और त्रुटि ( trial and error ) की उस विधि का इस्तेमाल करना और नई खोज करना असंभव होता, जिसे हज़ारों वर्ष पहले आसान सी, मामूली समस्याओं को हल करने के लिए उपयोग में लाया जाता था। आधुनिक खोजें केवल गंभीर वैज्ञानिक सिद्धांत के द्वारा ही की जा सकती हैं। क्वांटम यांत्रिकी तथा सापेक्षता के विशेष सिद्धांत के बग़ैर बिजली इंजीनियरी के लिए वांछित, नियंत्रित तापनाभिकीय क्रियाएं ( controlled thermonuclear processes ) करना असंभव है। इसी प्रकार, सैद्धांतिक अणुजैविकी ( molecular biology ) के बिना जीन इंजीनियरी तथा नयी जैविक जातियों ( biological species ) की रचना असंभव है।

इस तरह, वैज्ञानिक सिद्धांत संज्ञान ( cognition ) को सुविधाजनक बनाता है और उसकी रफ़्तार को दसियों और सैकड़ों गुना बढ़ा देता है, हमारे ज्ञान को गहरा व विश्वसनीय बनाता है और हमारे सारे व्यावहारिक क्रियाकलाप की बुनियाद की भांति हमें उस पर निर्माण करने में मदद देता है। यही कारण था कि भौतिकीविद लुडविग वोल्ट्ज़मान साधिकार यह कह सके थे कि, “अच्छे सिद्धांत से ज़्यादा व्यावहारिक और कुछ नहीं है।” वैज्ञानिक सिद्धांतों तथा उनके घटक नियमों की रचना कैसे की जाती है?

प्राक्कल्पना ( hypothesis ), वैज्ञानिक नियमों और सिद्धांतों के मूल का सबसे महत्त्वपूर्ण रूप ( form ) है। एक वैज्ञानिक प्राक्कल्पना सामान्य अटकल ( ordinary guess ) से भिन्न होती है और पूर्वापेक्षा ( presuppose ) करती है कि यह तथ्यों ( facts ), प्रेक्षणों ( observations ) व प्रयोगों ( experiments ) पर सुआधारित और पहले से ही प्राप्त, सुस्थापित वैज्ञानिक उपलब्धियों  के अनुरूप हो। प्राक्कल्पनाएं दो तरह से बन सकती हैं। प्रथम, यह ऐसे प्रेक्षणों की कमोबेश काफ़ी बड़ी संख्या के सामान्यीकरण के रूप में बनती है, जिन्हें किसी कारणवश पहले से विद्यमान सिद्धांतों के द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ऐसी प्राक्कल्पनाओं को आनुभविक ( यानी अनुभव आधारित ) सामान्यीकरण ( empirical generalization ) कहा जाता है। सागर के ज्वार-भाटे का हज़ारों बार प्रेक्षण करके वैज्ञानिकों ने बहुत समय पहले यह प्राक्कल्पना पेश की कि यह घटना चंद्रमा की स्थिति ( position ) पर निर्भर होती है। कालांतर में इस प्राक्कल्पना को सटीक गणनाओं व प्रेक्षणों से परखा गया और यह एक वैज्ञानिक नियम बन गयी। द्वितीय, एक प्राक्कल्पना किसी वैज्ञानिक की ऐसी सैद्धांतिक अटकल ( theoretical guess ) या अनुमिती ( surmise ) के रूप में प्रकट होती है, जिसमें अन्य सुस्थापित नियमों और सिद्धांतों का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है।

प्राक्कल्पनाओं की उत्पत्ति और उनमें से सर्वाधिक सत्य ( true ) तथा सटीक ( exact ) की परख तथा चयन वैज्ञानिक प्रेक्षणों और प्रयोगों के ज़रिये होता है। प्रेक्षणों और प्रयोगों से परीक्षित ( checked ) तथा परिपुष्ट ( confirmed ) प्राक्कल्पना को महज़ अटकल नहीं, बल्कि कमोबेश सत्य प्रस्थापना ( preposition ) माना जाने लगता है। वैज्ञानिक इसे विज्ञान का नियम समझने लगते हैं, यानी ऐसा वस्तुगत सत्य ( objective truth ) मानने लगते हैं जो स्वयं अध्ययन की गयी वास्तविकता के स्थायी, आवश्यक संपर्कों ( connections ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। प्राक्कल्पना का, विज्ञान के नियम में संपरिवर्तन ( conversion ) विश्व के वैज्ञानिक संज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण क़दम है। यह संपरिवर्तन व्यवहार ( practice ) के दारा संभव होता है, वैज्ञानिक प्रेक्षण और प्रयोग जिसके अनिवार्य तत्व होते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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सिद्धांत और प्राक्कल्पना – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार किया था, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों के अंतर्गत सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना – १
( theory and hypothesis – 1 )

1-knowledge-leon-zernitskyविज्ञान ( science ) संज्ञान ( cognition ) का उच्चतम रूप है। हमारे सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इस प्रभाव का आधार उद्योग तथा सामाजिक प्रशासन में वैज्ञानिक उपलब्धियों का अनुप्रयोग ( application ) है, जिससे वैज्ञानिक-तकनीकि प्रगति होती है। वैज्ञानिक संज्ञान की सबसे महत्त्वपूर्ण और लाक्षणिक ( characteristic ) विशेषता क्या है ?

प्राचीन बेबीलोन खगोलविद ( astronomers ) तारों और ग्रहों की संस्थिति ( location ) के बारे में अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने सूरज और चंद्रमा के दर्जनों ग्रहणों ( eclipses ) का प्रेक्षण किया था। किंतु वे उनकी गति के प्रक्षेप पथों ( trajectories ) की गणना नहीं कर पाये, यानी भावी ग्रहणों का पूर्वानुमान नहीं लगा पाये। कमोबेश यही स्थिति प्राचीन विश्व में हर सभ्यता में थी। यही नहीं, वे यह भी नहीं बता पाये कि आकाशीय पिंड क्यों घूमते हैं और ग्रहण क्यों होते हैं। आज बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी ही नहीं, स्कूली छात्र भी इन प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं और खगोलविद केवल अलग-अलग ग्रहों की गति की अति सटीकता से भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि सारे नक्षत्रों की गति की गणना भी कर सकते हैं और दूरस्थ तारों में जारी भौतिक प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण भी दे सकते हैं।

ऐसा क्योंकर हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि आधुनिक विज्ञान, वैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) पर भरोसा करता है और ये सिद्धांत पहले से ही विद्यमान घटनाओं का स्पष्टीकरण देने तथा नयी घटनाओं का पूर्वानुमान ( prediction ) लगाने में समर्थ होते हैं। बेबीलोन के खगोलविदों के जमाने में वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं थे और वे स्वयं उनकी रचना करने में अक्षम थे। वैज्ञानिक सिद्धांत क्या होता है ?

एक विकसित वैज्ञानिक सिद्धांत, विज्ञान के अंतर्संबंधित नियमों ( interconnected laws ) की एक प्रणाली ( system ) या श्रृंखला ( chain ) होता है। नियमों को तर्कशास्त्र के नियमों तथा गणितीय रूपांतरणों ( transformations ) के ज़रिये अन्य नियमों से निगमित ( deduce ) किया जा सकता है। इन रूपांतरणों के दारा हमें अंततः प्रकृति की उन घटनाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है जो प्रस्तुत क्षण पर अस्तित्वमान हैं या भविष्य में होंगी। वैज्ञानिक सिद्धांत का एक सरल उदाहरण है केपलर द्वारा निरूपित सूर्य के गिर्द ग्रहों के घूमने का सिद्धांत। इसमें गणित में व्यक्त तीन नियम शामिल हैं। प्रेक्षणों से प्राप्त कुछः निश्चित प्रारंभिक आधार-सामग्री होने पर एक खगोलविद को नये प्रेक्षण करने की ( जैसा कि बेबिलोनियाइयों को करने होते थे ) कोई आवश्यकता नहीं होती। वह इस आधार सामग्री को केपलर के नियमों को व्यक्त करने वाले सूत्रों में रखकर कुछ गणनाएं कर सकता है और सही-सही बता सकता है कि प्रदत्त क्षण पर अमुक-अमुक ग्रह कहां होगा।

जब न्यूटन द्वारा अन्वेषित ( discovered ) गुरुत्व के नियमों को केपलर के नियमों से जोड़ दिया जाता है, तो हमें एक नये, अधिक शक्तिशाली सिद्धांत की प्राप्ति होती है, जिसकी सहायता से हम आकाशीय पिंडों की संस्थिति का स्पष्टीकरण तथा उसकी भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि उनकी गति के कारण, आदि के बारे में भी जान सकते हैं। इसलिए, सिद्धांत भौतिक जगत की घटनाओं के कमोबेश विस्तृत क्षेत्रों को अपने में सम्मिलित ( embrace ) करते हैं, उनके बारे में अत्यंत गहन, विश्वसनीय ज्ञान प्रदान करते हैं, जिससे हम फ़िलहाल जटिल और थका देने वाले प्रेक्षणों का उपयोग किये बिना सारी अपेक्षित सूचना प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

संज्ञान में व्यवहार की भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम सत्य के ही संदर्भों में संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञान में व्यवहार की भूमिका
( the role of practice in knowing )

images (3)यह समझने के बाद कि सत्य क्या है, अब यह पूछा जा सकता कि वस्तुगत सत्य ( objective truth ) को कैसे प्रमाणित किया जाता है, उसे कैसे परखा जाता है और उसे किससे निष्कर्षित ( drawn ) किया जाता है तथा सत्य और असत्य ज्ञान ( knowledge ) के बीच कैसे भेद किया जाता है। हालांकि हम यहां पहले ही इस पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं फिर भी एक बार पुनः संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का इस उदेश्य से भी समाहार कर लेते हैं।

मानव क्रियाकलाप का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूप व्यवहार ( practice ) है। यह हमारे परिवेशीय जगत, प्रकृति और समाज को रूपांतरित ( transform ) करने की ओर लक्षित, संवेदनात्मक भौतिक क्रिया ( sensual material activity ) है और संज्ञान की प्रक्रिया सहित सामाजिक व बौद्धिक क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों ( forms ) का आधार है। फलतः व्यवहार में केवल श्रम ( labour ) की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि समाज को रूपांतरित करने के जनगण के सारे कार्यकलाप भी शामिल हैं। हम व्यवहार को मुख्यतः इस दृष्टिकोण से तो समझते ही हैं कि यह मानव चिंतन और सामाजिक क्रियाकलाप की क्षमता के विकास तथा परिष्करण ( perfecting ) को कैसे प्रभावित करता है। व्यवहार का दूसरा पहलू ( aspect ) यह है कि संज्ञानात्मक ( cognitive ) क्रियाकलाप में व्यवहार की बुनियादी ( fundamental ) भूमिका होती है, यह व्यवहार ही है जो इस क्रियाकलाप को संभव बनाता है और सत्य ज्ञान को असत्य ज्ञान से विभेदित ( distinguish ) करता है

मनुष्य बाह्य जगत का महज़ प्रेक्षण ( observation ) या चिंतन-मनन ( contemplation ) मात्र नहीं करता, बल्कि अपनी जीवन क्रिया के, और सर्वोपरि श्रम की प्रक्रिया के दौरान उसे परिवर्तित तथा पुनर्निर्मित ( remake ) करता है। इसी प्रक्रिया में, समाज सहित भौतिक जगत के सारे अनुगुणों ( properties ) और संयोजनों ( connections ) का गहनतम ज्ञान प्राप्त होता है। अगर मनुष्य केवल चिंतन-मनन तथा निष्क्रिय प्रेक्षण तक सीमित रहता, तो यह ज्ञान मानव संज्ञान के लिए अलभ्य ( inaccessible ) होता। चूंकि मनुष्य का व्यवहार सतत गतिमान, परिवर्तनशील तथा निरंतर विकासमान है, इसलिए व्यावहारिक क्रियाकलाप में प्राप्त हमारा ज्ञान अधिक जटिल, सटीक ( exact ) और विकसित होता जाता है। फलतः व्यवहार ज्ञान का स्रोत ( source ) मात्र नहीं है, बल्कि उसके विकास और परिष्करण का आधार भी है

पिछली प्रविष्टियों में हम भली-भांति देख समझ चुके हैं कि वस्तुगत जगत के संवेदनात्मक बिंबों ( sense images ) की रचना ख़ुद ही, काफ़ी हद तक, मनुष्य के व्यावहारिक क्रियाकलाप पर और सारी संस्कृति पर निर्भर होती है। इस तरह व्यवहार, संज्ञान की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है और संवेदनात्मक ( sensory ) और अनुभवात्मक ( empirical ) ज्ञान के बनने के स्तरों पर प्रभाव डालने लगता है। संकल्पनाओं ( concepts ) और निर्णयों ( judgments ) की रचना पर तो इसका प्रभाव और भी स्पष्ट हो जाता है। हर मानसिक ( mental ) या बौद्धिक ( intellectual ) क्रिया, भौतिक वस्तुओं के साथ किये जानेवाले क्रियाकलाप यानी व्यवहार के प्रभावांतर्गत ही रूपायित ( shaped ) और विकसित होती है। जब संकल्पनाएं ( अपकर्षण abstraction ) तथा उनमें निहित कथनों ( statements ) की रचना प्रक्रिया पूरी हो जाती है और हमें यह फ़ैसला करना होता है कि कौनसे कथन सत्य हैं और कौनसा असत्य, तो हम फिर व्यवहार का सहारा लेते हैं, जो इस बार हमारे ज्ञान की सत्यता को परखने के साधन, यानी सत्य की कसौटी ( criterion of truth ) के रूप में काम करता है।

व्यवहार, क्रियाकलाप का विशिष्ट मानवीय ( human ) रूप है। जानवरों के सबसे ज़्यादा जटिल क्रियाकलाप भी व्यवहार नहीं माने जा सकते, क्योंकि व्यवहार का मूलाधार श्रम है। यही वजह है कि जानवरों को केवल सतही वस्तु-उन्मुख संयोजनों ( object-oriented connections ) की समझ ही उपलब्ध है, जबकि गहन संयोजनों, यानी वस्तुगत नियमों की समझ उन्हें उपलब्ध नहीं है। हम जानते हैं कि चींटियों का क्रियाकलाप अत्यंत जटिल होता है। ख़ास तौर पर वे अन्य कीटों ( एफ़िड़ों aphides ) की प्रतिरक्षा करती हैं और पालती भी हैं। इन कीटों को कभी-कभी ‘चींटियों की गाय’ भी कहा जाता है। वे इन्हें खिलाती-पिलाती हैं और इनके द्वारा स्रावित ( excreted ) पोषक मधु का उपयोग करती हैं। किंतु करोड़ों वर्षों की इस ‘बिरादरी’ ( community ) में, जिसे जैवसहचारिता ( biocenosis ) कहते हैं, चींटियों ने एफ़िड़ों की एक भी अधिक उत्पादक क़िस्म का विकास नहीं किया।

वहीं मनुष्यों को, जिन्होंने खेतीबाड़ी तथा पशुपालन का काम कुछ ही हज़ार साल पहले शुरू किया था, अपने सक्रिय व्यावहारिक क्रियाकलाप, प्रयत्न एवं त्रुटि ( trial and error ) की विधियों और अनेक बार पुनरावर्तित प्रयोगों ( repeated experiments ) के ज़रिये इस बात पर यक़ीन हो गया कि घरेलू जानवरों और पौधों को प्रभावित किया जा सकता है। उन्होंने फ़सलें उगाने तथा मवेशी पालने के क़ायदों की खोज ( discover ) तथा उनक निरूपण ( formulation ) किया और इस तरह से नितांत नयी नस्लों व क़िस्मों का विकास किया, जो प्राकृतिक जीवन में विद्यमान नहीं हैं। इस प्रकार, कृषि के क्षेत्र में व्यवहार से नये वस्तुगत सत्यों की खोज, उनकी पुष्टि तथा उपयोग हुआ।

ठोस पिंडों तथा तरलों ( मसलन, पानी ) की विशेषताओं को चाहे कितनी ही बार क्यों न देखा गया हो, उनके निष्क्रिय प्रेक्षण से यह कहना संभव नहीं हो सकता था कि पानी में डुबायी हुई वस्तु के भार में क्या परिवर्तन होते हैं। पानी में सोद्देश्य डुबाये हुए या संयोगवश डूबे हुए पिंडों के साथ व्यावहारिक क्रियाकलाप में कई बार वास्ता पड़ने पर काफ़ी समय बाद लोगों ने यह खोज की कि पानी में डूबी वस्तु का भार ठीक उतना ही कम हो जाता है, जितने पनी को वे विस्थापित ( displaced ) करती हैं ( आर्कमिड़ीज़ का नियम )। बाद में इस खोज को जहाज़ निर्माण के व्यवहार में भारी सफलता के साथ इस्तेमाल किया गया।

इस प्रकार, यह एक प्रस्थापना के रूप में कहा जा सकता है कि व्यवहार, प्रकृति और समाज के बारे में ज्ञान का स्रोत, ज्ञान के विकास का आधार और प्राप्त ज्ञान की सत्यता की कसौटी होता है


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम