सत्य क्या है – ४ ( सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे एवं सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य को समझेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सत्य क्या है – ४ ( सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य )
what is truth – 4 ( relative and absolute truth )

Pundyk_Crestऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था पर हमारा ज्ञान, सीमित और सापेक्ष ( relative ) होता है। इस सापेक्ष ज्ञान को आगे चलकर अधिक विशिष्ट ( specific ) तथा अधिक सही बनाया जा सकता है। प्राचीन चिंतक अक्सर घटनाओं या प्रक्रियाओं के मात्र बाहरी पक्ष का प्रेक्षण करते हुए उनकी जटिल आंतरिक संरचना के बारे में अतीव काल्पनिक अटकलें लगा दिया करते थे, परंतु फिर भी उनका ज्ञान, विज्ञान के लिए आगे बढ़ने का प्राथमिक आधार ही था। जब व्यवहार और विज्ञान, दोनों ही आगे बढ़ते हैं, तो लोग धीरे-धीरे सत्य को जानने लगते हैं। मसलन, देमोक्रितस ने महज अटकल लगायी थी कि दुनिया परमणुओं से बनी है, किंतु भौतिकीविद नील्स बोर ने परमाणु की संरचना की वस्तुतः खोज की थी।

हम कह सकते हैं कि मानव संज्ञान के विकास के हर चरण में वस्तुगत सत्य ( objective truth ) भी एक सीढ़ी ऊपर उठा और हमारे ज्ञान में से आत्मगत ( subjective ) तत्वों को निष्कासित करता गया। वस्तुगत सत्य के विकास की ये सीढ़ियां सापेक्ष सत्य ( या वस्तुगत सत्य के सापेक्ष रूप ) कहलाती हैं। एक प्रस्थापना के रूप में कहें तो, वस्तुगत सत्य की अभिव्यक्ति के रूप को, जो ठोस ऐतिहासिक दशाओं पर निर्भर होता है और ज्ञान के प्रदत्त स्तर पर प्राप्त उसकी सटीकता, परिशुद्धता और पूर्णता की कोटि को दर्शाता है, सापेक्ष सत्य ( relative truth ) कहते हैं

अतः निरंतर विकास करते और जटिल बनते व्यावहारिक कार्यकलाप के प्रभावस्वरूप, वस्तुगत सत्य भी निरंतर विकास करता जाता है और अपने किसी भी रूप में वह अंतिम और पूर्ण नहीं माना जा सकता। वास्तव में, वह इस या उस वस्तु से संबंधित सापेक्ष सत्यों का सिलसिला ही है, और वह भी ऐसे सापेक्ष सत्यों का कि उनमें से हर एक अपने पूर्ववर्ती का व्यापकीकरण और गहनीकरण होता है। इस प्रक्रिया को संज्ञान का द्वंद्व कहा जाता है। इस तरह, विज्ञान सहित मानव ज्ञान का सारा विकास कुछ सापेक्ष सत्यों का ऐसे सापेक्ष सत्यों के द्वारा अनवरत अनुक्रमण ( constant succession ) है, जो वस्तुगत सत्य को अधिक पूर्णता और सटीकता ( exactness ) से व्यक्त करते हैं। संज्ञान की प्रक्रिया, वस्तुगत सत्य की अधिक पूर्ण और अधिक सटीक जानकारी है।

किसी घटना के सर्वथा पूर्ण, सटीक, सर्वतोमुखी ( all-round ), सांगोपांग ( comprehensive ), सर्वांगपूर्ण ( exhaustive ) ज्ञान को निरपेक्ष सत्य ( absolute truth ) कहते हैं। अक्सर पूछा जाता है कि क्या हम निरपेक्ष सत्य को प्राप्त तथा उसका निरूपण ( formulate ) कर सकते हैं ? अज्ञेयवादी ( agnostic ) कहते हैं कि नहीं। प्रमाण के रूप में वे इस तथ्य का हवाला देते हैं कि हमारा सरोकार केवल सापेक्ष सत्यों से है और, वे आगे दलील देते हैं, आगे चलकर यह पता चलता है कि प्रत्येक सापेक्ष सत्य सटीक और पूर्ण नहीं है, जैसा कि सौर मंडल के उदाहरण में। फलतः, पूर्ण, सांगोपांग ज्ञान अलभ्य ( unattainable ) है। अधिभूतवादी ( metaphysicians ) यह सोचते हैं कि निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और हमारे क्रियाकलाप के किसी भी क्षण पर सदा के लिए जाना और व्यक्त किया जा सकता है।

अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ, बहुत सरल मामलों में निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मसलन, क्या यह कथन कि ‘दिल्ली भारत की राजधानी है’ निरपेक्ष सत्य नहीं है ? परंतु क्या यह कथन दिल्ली की आबादी, उसके क्षेत्रफल और इमारतों की संख्या के बारे में सर्वांगपूर्ण ज्ञान देता है, अथवा क्या यह बताता है कि यह भारत की राजधानी कब बना, आदि ? यहां तक कि निश्चित तारीख़ के लिए दिये जानेवाले आंकड़े एक या दो वर्ष में सदोष हो जायेंगे। इस भांति हम देखते हैं कि पहली नज़र में जो बात निरपेक्ष सत्य मालूम पड़ती है, वह वास्तव में सापेक्ष सत्य होती है, क्योंकि उसमें दिल्ली के बारे में सर्वांगपूर्ण तथा सर्वदा के लिए सत्य ज्ञान नहीं होता है।

कोई एक घटना जितनी ज़्यादा जटिल ( complicated ) होती है, निरपेक्ष सत्य की, यानी उसके बारे में पूर्ण ज्ञान की, प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। किंतु इसके बावजूद निरपेक्ष सत्य होता है और उसे मानव ज्ञान की वांछित सीमा और लक्ष्य के रूप में समझना चाहिए। प्रत्येक सापेक्ष सत्य हमें उस लक्ष्य के निकटतर लानेवाला एक क़दम है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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  1. Trackback: सत्य क्या है – ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता ) | समय के साये में

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