प्रत्ययवाद/भाववाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ें

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ों को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ें
( the epistemological roots of idealism )

25-14-1-11-23-53-45mजब संकल्पना ( concept ) के निर्माण करने में समर्थ रचनात्मक क्रियाकलाप, वस्तुओं के वस्तुगत अनुगुणों ( objective properties ) तथा संबंधों के विरुद्ध आ टकराता है, तो अपकर्षण/अमूर्तकरण ( abstraction ) की प्रक्रिया के दौरान ऐसी असत्य संकल्पनाएं बन सकती हैं, जो वस्तुगत यथार्थता ( reality ) को विरूपित ( distorted ), त्रुटिपूर्ण ढंग से परावर्तित करती हैं। ऐसी संकल्पनाओं के पैदा होने की संभावना हमेशा मौजूद रहती है और कुछ दशाओं में यह प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) की ओर पहुंचा सकती हैं।

बेशक, प्रत्येक असत्य संकल्पना या अपकर्षण में होनेवाली हर ग़लती प्रत्ययवाद की ओर नहीं ले जाती। संकल्पनाएं ‘हरी बिल्ली’ या ‘दयालु त्रिभुज’ महज निर्रथक ( senseless ) हैं। वास्तविकता में उनके अनुरूप कुछ नहीं होता है। जो लक्षण या अनुगुण वास्तविकता से असंबद्ध है, उन्हें ग़लत ढंग से परस्पर चस्पां कर दिया गया है। जो संकल्पनाएं, वस्तुगत यथार्थता में विद्यमान पृथक अनुगुणों के स्वयं यथार्थता से,  अधिभूतवादी विलगाव ( metaphysical separation ) के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं, वे प्रत्ययवाद की ओर पहुंचाती हैं। यानी जब वस्तुओं से संबद्ध अनुगुणों को, वस्तुओं से अलग कर दिया जाता है फिर उसे पृथक रूप से विस्तारित या अतिरंजित ( exaggerated ) बना कर, ऐसी संकल्पना में आबद्ध कर दिया जा सकता है जो कि यथार्थ को ग़लत तरीक़े से पेश करती हैं, या एक अयथार्थ कल्पनालोक ( mythological fantasy ) को अभिव्यक्त करती हैं।

किसी व्यक्ति में जीवन की प्रत्याशा ( expectation ) कम या ज़्यादा हो सकती है, वह विभिन्न बातों के बारे में कम या ज़्यादा जानकार हो सकता है, उसमें निश्चित शारीरिक बल होता है, आदि। किंतु एक सर्वज्ञ ( omniscient ), सर्वशक्तिमान, अमर सत्व ( immortal being ) – ईश्वर – की अतिकाल्पनिक संकल्पना की उत्पत्ति के लिए, जानकारी या बलशालिता के अनुगुण को, या जीवन की प्रत्याशा को वास्तविक लोगों से पृथक करना, पराकाष्ठा ( extreme ) तक अतिरंजित तथा विस्तारित ( inflate ) करना काफ़ी है। इसी प्रकार, भूतद्रव्य ( matter ) से स्वतंत्र ( independent ) तथा उसके मुक़ाबले में खड़ी, गति और ऊर्जा की संकल्पनाओं के उत्पन्न होने के लिए, गतिमान भूतद्रव्य का अध्ययन करते समय गति को भौतिक पिंड़ों से पृथक करना, पदार्थ को ऊर्जा के मुक़ाबले खड़ा करना और काल ( time ) को देश ( space ) से पृथक करना पर्याप्त है ; और यह ‘भौतिक’ प्रत्ययवाद की ओर, इस मत की ओर सीधा क़दम है कि भौतिक जगत ग़ायब हो सकता है और उस का अस्तित्व नहीं रह जायेगा, जबकि ऊर्जा उसके बिना भी भी अस्तित्वमान और शाश्वत रहेगी ; जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ऊर्जा अभौतिक ( immaterial ) है, यानी प्रत्ययिक ( ideal ) है।

प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय, यानी संज्ञानात्मक जड़ें इस बात में निहित हैं कि संज्ञान ( cognition ) की जटिल ( complex ), द्वंद्वात्मक प्रक्रिया ( dialectical process ) में ऐसी सरलीकृत असत्य प्रविधियां ( techniques ) पैदा हो सकती हैं, जिनसे ऐसी संकल्पनाएं बन सकती हैं, जो यथार्थता को विरूपित ढंग से परावर्तित ( reflect ) करती हैं और यह सोचना संभव बना देती हैं कि विचार ( ideas ) और संकल्पनाएं ख़ुद भूतद्रव्य से स्वतंत्र रूप में विद्यमान ( exist ) होती हैं या उससे भी पहले विद्यमान थीं।

परंतु ज्ञानमीमांसीय जड़ें किसी भी हालत में स्वयं अपने आप प्रत्ययवाद की ओर अवश्यमेवतः नहीं ले जाती। यह प्रत्ययवाद की केवल एक संभावना ( possibility ) है। प्रत्ययवाद के वस्तुतः ( actually ) उत्पन्न तथा घनीभूत ( consolidated ) होने के लिए निश्चित सामाजिक दशाओं और निश्चित वर्गों ( classes ) और समूहों ( groups ) का होना जरूरी है जिन्हें अपने वर्ग के प्रभुत्व ( dominance ) के आधार के रूप में प्रत्ययवादी विश्वदृष्टिकोण ( idealistic world outlook ) में दिलचस्पी होती है। इन दशाओं को प्रत्ययवाद की सामाजिक जड़े ( social roots of idealism ) कहते हैं।

अलंकारिक भाषा ( figurative language ) में ऐसा कहा जा सकता है कि प्रत्ययवाद, ज्ञान के जीवंत वृक्ष ( living tree ) पर होनेवाला एक बंध्या फूल ( sterile flower ) है ( जिसे सामाजिक व ज्ञानमीमांसीय दोनों जड़ों की जरूरत होती है )। प्रत्ययवाद की सामाजिक जड़ों का नाश, सामाजिक जीवन के रूपांतरण ( transformation ) के ज़रिये ही किया जा सकता है जिसमें कि इसकी ज्ञानमीमांसीय जड़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष ( struggle ) अग्रभूमि पर रहे। इनके समूल नाश के लिए, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और संज्ञान के द्वंद्ववादी सिद्धांत में सक्रियता ( actively ) और सचेतनता ( consciously ) से पारंगति हासिल करना आवश्यक है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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  1. Trackback: संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन | समय के साये में

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