कारण और कार्य – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘आभास और सार’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य – १
( Cause and Effect ) – 1

dominoesहम यह भली-भांति जानते हैं कि विश्व निरंतर गतिमान है और इसमें निरंतर घटनाएं घटती रहती हैं, कई प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। हमारे प्रेक्षण हमें यह भी स्पष्टतः दिखाते हैं कि प्रकृति, समाज और चिंतन की सारी घटनाएं या प्रक्रियाएं, किन्हीं अन्य घटनाओं या प्रक्रियाओं की वज़ह से या उनके द्वारा उत्पन्न और विनियमित ( governed ) होती हैं। जो पहली घटना, दूसरी को जन्म देती है, उसे दूसरी घटना का कारण ( cause ) कहा जाता है। एक घटना ( प्रक्रिया ) को उस हालत में, दूसरी घटना ( प्रक्रिया ) का कारण कहते हैं, जब ( १ ) पहली, काल में दूसरी की पूर्ववर्ती ( preceding ) हो ; ( २ ) और जब पहली, दूसरी की उत्पत्ति ( rise ), परिवर्तन ( change ) या विकास ( development ) के लिए एक आवश्यक पूर्वावस्था ( precondition ) या आधार ( basis ) हो। जो किसी घटना को उत्पन्न करता है, वह उस घटना का कारण कहलाता है। किसी एक घटना की उत्पत्ति, उसकी अवस्था में परिवर्तन तथा उसका विलोपन ( elimination ), कारण पर निर्भर होता है। कारण की संक्रिया ( operation ) का परिणाम कार्य ( effect ) कहलाता है।

विश्व में कारणहीन कुछ नहीं होता। सारी घटनाएं निश्चित कारणों का परिणाम होती हैं। किसी एक घटना के कारण का पता लगाना उसके संज्ञान ( cognition ) का एक प्रमुख तत्व है। कार्य-कारण संबंध ( cause-and-effect connection ) एक प्रकार का सार्विक ( universal ) संबंध है, अर्थात संबंध का एक ऐसा प्रकार है, जिसके अंतर्गत एक घटना या परिस्थिति, अन्य को स्वयं पर आश्रित करती है अथवा उसे उत्पन्न ( engender ) करती है। कारण और कार्य वस्तुगत ( objective ) हैं। उनके बीच संबंध को कारणता संबंध ( causal connections ) कहते हैं। दार्शनिक प्रवर्ग “कारण” और “कार्य” वस्तुगत कारणता संबंधों को परावर्तित करते हैं, जिनका सार्विक महत्त्व है और जो भूतद्रव्य ( matter ) की गति के सारे रूपों में विद्यमान होते हैं। कार्य-कारण संबंध की खोज से विज्ञान की शुरुआत होती है। इन संबंधों का अध्ययन प्राकृतिक, तकनीकी और सामाजिक विज्ञानों का एक महत्त्वपूर्ण काम है।

१८वीं सदी में विज्ञान जगत में ज्ञान की तत्कालीन सीमाओं के अंतर्गत कई अजीब धारणाएं प्रचलित थी। जैसे कि पिण्ड दहनशील ( combustible ) इसलिए होते हैं कि उनमें फ़्लोजिस्टोन नामक द्रव्य पाया जाता है। फ़्लोजिस्टोन हमेशा दहन का कारण है और दहन हमेशा फ़्लोजिस्टोन का कार्य ( परिणाम ) है। इस दृष्टि से फ़्लोजिस्टोन दहन का कार्य नहीं हो सकता, और दहन फ़्लोजिस्टोन का कारण नहीं हो सकता। इसी तरह, लगभग उसी काल में यह धारणा भी प्रचलित हुई कि पिण्डों ( bodies ) के तपने की वजह उनमें तापजनक नामक एक भारहीन पदार्थ का होना है। यह माना जाता था कि तापजनक सदैव तापीय परिघटनाओं ( thermal phenomena ) का कारण और तापीय परिघटनाएं सदैव तापजनक का कार्य हैं। उस काल में सभी ज्ञात विद्युतीय ( electrical ) परिघटनाओं को कुछ विशिष्ट अदृश्य विद्युतीय द्रवों ( liquids ) की क्रिया का परिणाम माना जाता था और सोचा जाता था कि इन द्रवों के कुछ पिण्डों से दूसरे पिण्डों में बहने से ही विद्युत पैदा होती है। तत्कालीन धारणाओं के अनुसार ये विद्युतीय द्रव सदैव विद्युतीय परिघटनाओं के कारण थे और विद्युतीय परिघटनाएं सदैव इन द्रवों का कार्य।

तापीय, विद्युतीय और अन्य परिघटनाओं की ऐसी समझ के आधारों पर ही कारण और कार्य की तत्कालीन समझ पैदा हुई, जिसके अनुसार यदि वस्तु ‘क’ वस्तु ‘ख’ का कारण है, तो यह असंभव है कि वस्तु ‘क’ वस्तु ‘ख’ का कार्य हो। यानी कि कुछ घटनाएं हमेशा अन्य का कारण और अन्य उनके केवल कार्य ( परिणाम ) होती है, अर्थात उनके बीच के संबंध और स्थान अपरिवर्तनीय ( unchangeable ) होते हैं। इस तरह इस द्वंद्ववादविरोधी तत्वमीमांसीय दृष्टिकोण का सार यह था कि एक ही वस्तु में दो विलोम ( यानी कारण और कार्य ) नहीं हो सकते। किंतु ज्ञान के आगे के विकास ने कारण और कार्य के प्रवर्गों ( categories ) की इस तत्वमीमांसीय समझ को भ्रामक ( misleading ) ठहराया। उसने दिखाया कि विश्व तैयार वस्तुओं का जमघट नहीं, अपितु प्रक्रियाओं, संबंधों और संपर्कों की समष्टि है।

आज हम जानते हैं कि पनबिजलीघर में जो बिजली पैदा की जाती है उसका कारण जलधारा की यांत्रिक गति है। जब कोई मशीन, जैसे कि लेथ चालू की जाती है, तो बिजली की धारा उसकी यांत्रिक गति का कारण बनती है। पहले दृष्टांत ( illustration ) में बिजली की धारा यांत्रिक गति का कार्य है और दूसरे दृष्टांत में यही धारा यांत्रिक गति का कारण है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद, मानवजाति के अनुभव व ऐतिहासिक व्यवहार तथा विज्ञान की ऐसी उपलब्धियों पर आधारित होने की वजह से यह दर्शाता है कि कोई एक घटना ( मसलन, वर्षा के बादलों में आर्द्रता का संचयन ) जो किसी अन्य घटना का परिणाम है और स्वयं भी एक अन्य घटना ( वर्षा ) का कारण हो सकती है। इस अर्थ में यह कहा जा सकता है कि वस्तुतः कार्य और कारण स्थान परिवर्तन करते हैं ; जो एक समय पर किसी घटना का कार्य है, वह अगले क्षण पर दूसरी घटना का कारण हो सकता है।

यदि कारण-कार्य श्रृंखला की कड़ियों को प्रक्रियाओं ( processes ) के रूप में देखा जाए, तो पता चलेगा कि जब एक प्रक्रिया ‘क’, प्रक्रिया ‘ख’ पर प्रभाव डालकर उसमें परिवर्तन लाती है, तो अपनी बारी में प्रक्रिया ‘ख’ भी प्रक्रिया ‘क’ पर प्रभाव डालकर उसमें परिवर्तन लाती है। इसलिए हर प्रक्रिया दूसरी प्रक्रिया को प्रभावित करते हुए स्वयं भी प्रभावित होती है। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति और समाज में भी, संबंध अन्योन्यक्रियाएं ( mutual actions ) हैं तथा एक ही वस्तु या प्रक्रिया में दो विलोम ( कारण और कार्य ) होते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: कारण और कार्य – २ | समय के साये में

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