आभास और सार – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अंतर्वस्तु और रूप’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘आभास और सार’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
आभास और सार – १
( Appearance and Essence ) – 1

Handmade-Modern-Oil-Painting-Acrylic-Paintingsजब हम एक सेब की जांच करते हैं, उसे सूंघते, महसूस करते हैं तथा उसका स्वाद लेते हैं, तो हमें अनेक संवेदन ( sensations ) प्राप्त होते हैं, जिनसे हम एक निश्चित संवेदात्मक बिंब ( sense image ) की रचना करते हैं। हमारे संवेदनों द्वारा हमें प्राप्त वस्तुगत चीज़ को उसका आभास ( appearance ) कहते हैं। आभास में हमारे गिर्द ( around ) विद्यमान वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के वस्तुगत गुणों ( objective properties ) बारे में सूचना निहित होती है। हमें वस्तु जो कुछ जान पड़ती है, हमारे सामने जैसी वह प्रकट होती है, यह केवल उसके वस्तुगत लक्षणों पर ही नहीं, बल्कि हमारे संवेद अंगों की संरचना, तंत्रिकातंत्र ( मस्तिष्क सहित ) और अंत में हमारे व्यावहारिक क्रियाकलाप ( practical activity ) पर भी निर्भर होती है।

एक सेब को देखने पर हम पाते हैं कि यह लाल और गोलाकार है। यह वस्तुतः उसकी पहली श्रेणी का आभास है। जब हम सेब की एक फांक को काटकर उसे सूक्ष्मदर्शी के तले देखते हैं, तो हमें उसकी कोशिकीय संरचना नज़र आती है, यह द्वितीय श्रेणी का आभास है। अनुक्रमिक ( sequential ) रूप से एक्स-रे उपकरण तथा इलैक्ट्रोनिक सूक्ष्मदर्शी, आदि का उपयोग करने पर हम सेब की कोशिकाओं की आंतरिक संरचना तथा उसके अंदर जारी आणविक प्रक्रियाओं ( molecular processes ) को होते देखते हैं। इसे तीसरी, चौथी, अदि श्रेणियों का आभास कहा जा सकता है। फलतः प्रवर्ग “आभास” हमारे गिर्द वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के वस्तुगत बाह्य पक्ष ( objective external aspect ) को परावर्तित करता है, जिससे हमें अपने व्यावहारिक ( practical ) तथा प्रायोगिक क्रियाकलाप ( experimental activity ) में सामना पड़ता है। आभास बाह्य लक्षणों का, अनुगुणों तथा वस्तुओं के अंदर या उनके मध्य संबंधों का साकल्य है, वह रूप है, जिसमें सार अपने को प्रकट करता है। हम इस बाह्य, दिखावटी पक्ष का सीधे या उपकरणों व औज़ारों के ज़रिये अनुबोध ( perceive ) प्राप्त करते हैं।

किंतु प्रवर्ग ‘सार’ ( essence ) किसको परावर्तित करता है? उपरोक्त उदाहरण को ही देखते हैं। हम अलग-अलग विशेषताओं, मसलन सेब के रंग, आकृति तथा आकार के बारे में दृष्टि संवेदनों की प्राप्ति से जानकारी हासिल करते हैं। ये लक्षण इसे अन्य वस्तुओं से विभेदित करते हैं। बाद में हम इस जाति के सारे फलों के लिए लाक्षणिक उसकी कोशिकीय संरचना के बारे में जानते हैं। कुछ और आगे बढ़ने पर हम कोशिकाओं में होनेवाली उन भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रियाओं के बारे में धारणा बनाते हैं, जो केवल पौधों की ही नहीं, बल्कि सामान्यतः जीवित अंगियों ( living organism ) की विशेषता भी है। सेब की आंतरिक संरचना में और गहरे पैठ कर हमें उन अधिकाधिक स्थायी ( stable ), आवश्यक संयोजनों ( necessary connections ) की जानकारी मिलती है, जो फल की इस जाति की वृद्धि ( growth ), विकास प्रक्रियाओं का संनियमन ( governing ) करते हैं।

दूसरे शब्दों में, पहली श्रेणी के आभास से दूसरी व अन्य श्रेणियों के आभास की तरफ़ चलते हुए तथा आभास या परिघटना ( phenomena ) की आंतरिक संरचना को जानकर हम उनकी वस्तुगत नियमितताओं ( objectives patterns ) का पता लगा सकते हैं। ये नियमितताएं ही उनके सार की रचना करते हैं। फलतः प्रवर्ग “सार” उन आंतरिक ( inner ), गहन अनुगुणों ( deep properties ) और संयोजनों ( connections ) को परावर्तित करता है, जो अध्ययनशील वस्तुओं और प्रक्रियाओं की कार्यात्मकता ( functioning ) तथा विकास का नियमन करते हैं। सार एक घटना या घटनाओं की आंतरिक नियमितताओं की समग्रता ( aggregate ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। इस तरह हम देखते हैं कि प्रवर्ग “सार” तथा “नियम” ( law ) एक ही श्रेणी की संकल्पनाएं ( concepts ) हैं। जटिल सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के समय इसे याद रखना विशेष महत्त्वपूर्ण है। विज्ञान और क्रांतिकारी व्यवहार के लिए घटना के सार को समझना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है।

जैसा कि हम देखते हैं, आभास और सार की संकल्पनाएं वस्तुओं और प्रक्रियाओं के अंतर्संबधित पक्षों ( interrelated aspects )  को द्वंद्वात्मकतः परावर्तित करती हैं इसीलिए इनके बीच कोई सुस्पष्ट विभाजक रेखा नहीं होती है। जो चीज़ आज नहीं देखी जा सकती है और जो किसी वस्तु का सार है, वह कल प्रेक्षण ( observation ) के दायरे में आ सकती है और आभास में परिणत ( resulted ) हो सकती है। प्रवर्ग “आभास” और “सार” एक तरफ़ से अंतर्विरोधी ( contradictory ) प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनमें से एक प्रवर्ग बाह्य पक्ष को जो कि अधिक परिवर्तनशील है तथा दूसरा प्रवर्ग आंतरिक पक्ष को जो कि अधिक स्थायी है, परावर्तित करता है। ये द्वंद्वात्मक रूप से जुड़े हैं और एक दूसरे में संक्रमण ( transition ) करते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: आभास और सार – २ | समय के साये में

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