भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम’ का सार प्रस्तुत किया था, इस बार हम ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग” पर चर्चा शुरू करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्रवर्ग होते क्या हैं ?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
( categories of materialistic dialectics )

भौतिकवादी द्वंद्ववाद, विकासमान वास्तविकता ( developing reality ) के सर्वाधिक सामान्य और महत्त्वपूर्ण संयोजनों को व्यक्त करनेवाले उसूलों ( principles ) और नियमों ( laws ) तक ही सीमित नहीं है। यह भौतिक जगत और संज्ञान ( cognition ) के विकास के उन अनिवार्य संयोजनों और पक्षों का भी अध्ययन करता है, जो दार्शनिक प्रवर्गों ( philosophical categories ) में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रवर्ग ( category ) क्या है?

6a00d8341c66f153ef011570914f04970b-500wiआइये थोड़ा विस्तार से समझते हैं। उपग्रह पृथ्वी का ही नहीं होता ( पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा है ), सौरमण्डल के अन्य ग्रहों के भी अपने उपग्रह हैं। उदाहरण के लिए, शनि के नौ उपग्रह हैं, जिनमें सबसे बड़ा टाइटन है। शनि का उपग्रह होने के नाते टाइटन को सौरमण्डल के ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में और इसीलिए नक्षत्रों के गिर्द घूमनेवाले ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में भी गिना जा सकता है। फिर स्वयं उपग्रह कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड हैं और जैसा ज्ञात है कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड सामान्यतः अंतरिक्षीय पिण्डों का ही एक हिस्सा है। इस तरह उत्तरोतर व्यापक संप्रत्ययों ( concepts ) की ओर बढ़ने पर हम एक श्रृंखला बनती देखते हैं, जिसकी हर अगली कड़ी ( संप्रत्यय ) पहली से अधिक व्यापक है : टाइटन –> शनि का उपग्रह –> सौरमण्डल के ग्रह का उपग्रह –> ग्रह का उपग्रह –> कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड –> अंतरिक्षीय पिण्ड –> भौतिक पिण्ड –> पदार्थ।

एक अन्य संप्रत्यय लें – गेंहूं। गेंहूं अनाज है और सभी अनाज एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियां हैं, जो द्विबीजपत्री वनस्पतियों के साथ आवृत्तबीजियों का वर्ग बनाती हैं। आवृत्तबीजी और अनावृत्तबीजी, दोनों बीजधारी वनस्पतियों के वर्ग में शामिल हैं, जो स्वयं सामान्यतः वनस्पतियों का ( जिनमें बीजधारी और बीजरहित, सभी वनस्पतियां शामिल हैं ) अंग हैं। यहां व्यापकतर संप्रत्यय की ओर बढ़ने का क्रम इस प्रकार है : गेंहूं –> अनाज –> एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पति –> आवृत्तबीजी वनस्पति –> अवयवी –> स्वनियंत्रित तंत्र –> भौतिक पिण्ड –> पदार्थ।

इस तरह हम देख सकते हैं कि सभी संप्रत्यय ऐसी ही श्रृंखलाओं की कड़ियां हैं और ये श्रृंखलाएं आपस में संबद्ध ( associated ) होती हैं। चूंकि गेंहूं अनाज है, इसलिए ‘गेंहूं’ संप्रत्यय में अनाज के सभी लक्षण और इसके साथ ही केवल गेंहूं में पाये जानेवाले लक्षण ( जो उसे अन्य अनाजों से भिन्न बनाते हैं ) शामिल हैं। इसी तरह ‘अनाज’ संप्रत्यय में एकबीजपत्री आवृत्तबीजियों के लक्षणों के साथ-साथ उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो अनाजों को शेष एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियों से भिन्न बनाते हैं।

यही बात अन्य संप्रत्ययों पर भी लागू होती है : अधिक व्यापक संप्रत्यय का अर्थ अधिक संकीर्ण संप्रत्यय के अर्थ में पूर्णतः शामिल होता है। इसके अलावा अधिक संकीर्ण संप्रत्यय में उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो इस उपवर्ग को, उस व्यापक वर्ग के ( जिसमें यह शामिल है ) अन्य उपवर्गों से भिन्न बनाते हैं। इसीलिए, उदाहरणार्थ, अवयवी ( organism ) के लक्षणों की कल्पना सभी वनस्पतियों ( अब तक पांच लाख से अधिक वनस्पतियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में और सभी जीवों ( उनकी दस लाख से अधिक जातियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में की जाती है। किंतु भौतिक वस्तुओं से संबंधित सभी संप्रत्ययों में ‘पदार्थ’ ( matter ) के संप्रत्यय का विशिष्ट स्थान है। चूंकि यह सबसे अधिक व्यापक, अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय है, इसलिए उसका अर्थ जीवों और अजीवों, प्राकृतिक और मनुष्यनिर्मित कृत्रिम भौतिक वस्तुओं से संबंधित करोड़ों विविध संप्रत्ययों में शामिल किया जाता है।

पदार्थ ही ऐसा एकमात्र अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय नहीं है, जिसकी परिधि में सभी ज्ञात संकीर्णतर संप्रत्यय आते हों। दर्शनशास्त्र के अनुसार अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय निम्न हैं : पदार्थ और चेतना, गति और गतिशून्यता, सामान्य और विशिष्ट, सार और परिघटना, गुण और परिमाण, क्रमभंग और सातत्य, कार्य और कारण, अनिवार्यता और संयोग, संभावना और वास्तविकता, अंतर्वस्तु और रूप, ढांचा और प्रकार्य, आदि-आदि। यही अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय ही दार्शनिक प्रवर्ग कहलाते हैं। हर प्रवर्ग में विशाल संख्या में संकीर्णतर संप्रत्यय शामिल होते हैं, और यदि सभी प्रवर्गों को एक साथ लिया जाये, तो उनकी परिधि में मानवजाति को ज्ञात सभी संप्रत्यय आ जायेंगे।

यहां यह बात भी समझने की है कि सामान्यतः प्रवर्ग इस या अन्य विज्ञान की आधार संकल्पनाएं ( basic concepts ) होते हैं। मसलन, द्रव्यमान, ऊर्जा और आवेश भौतिकी के प्रवर्ग हैं, इसी तरह उत्पादन के संबंध, पण्य ( commodity ) और मूल्य राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रवर्ग हैं, आदि-आदि। किंतु दार्शनिक प्रवर्गों की अपनी विशेषता यह है कि वे सर्वाधिक सामान्य संकल्पनाएं होते हैं। उनका सह-संबंध ( correlation ) सार्विक नियमों ( universal laws ) तथा घटनाओं के बीच स्थायी संयोजनों ( permanent connections ) को व्यक्त करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण | समय के साये में

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