अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम पर चर्चा आगे बढ़ाई थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए अंतर्विरोधों के रूपों पर बात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – तीसरा भाग
अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप

contradictions-s14s15-wingsdomain-art-and-photographyविश्व में अंतर्विरोधों ( contradiction ) के अनेक और विविधतापूर्ण रूप ( forms ) पाए जाते हैं। वे विकास की प्रक्रिया पर विविध प्रकार का प्रभाव डालते हैं और अपने समाधान के विविध रूपों तथा साधनों की मांग करते हैं। लोग अपने दैनिक जीवन में उनसे टकराते रहते हैं, भरसक उनका विश्लेषण करते हैं और उनके समाधानों के लिए, तद्‍अनुकूल ही अपने व्यवहार का नियमन ( regulation ) करते हैं। अतः अंतर्विरोधों के सामान्य रूपों की गहरी समझ इस प्रक्रिया को बेहतर बनाती है और व्यक्ति को अपनी वस्तुस्थिति को जानने और इसमें अपनी एक निश्चित भूमिका को तय करने में मदद करती है। इसी उद्देश्य से हम यहां अंतर्विरोधों के उन सबसे महत्त्वपूर्ण और सामान्य रूपों का अध्ययन करेंगे, जिनका कि व्यावहारिक, वैज्ञानिक और सामाजिक-राजनीतिक महत्त्व बहुत अधिक है। ये हैं आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोध, बुनियादी और गैरबुनियादी अंतर्विरोध तथा प्रतिरोधी और अप्रतिरोधी अंतर्विरोध।

आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोध

जीवन में हमें आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के अंतर्विरोधों से वास्ता पड़ता है और ये दोनों ही विभिन्न घटनाओं के विकास पर निश्चित प्रभाव डालते हैं। आंतरिक अंतर्विरोध एक ही वस्तु या घटना के अंतर्निहित विरोधी पक्षों के बीच उत्पन्न होते हैं। बाहरी अंतर्विरोध एक विचाराधीन वस्तु या घटना के तथा अन्य वस्तु या घटना के बीच उत्पन्न होते हैं।

आंतरिक अंतर्विरोध ( internal contradiction ) किसी भी वस्तु या घटना के विकास में निर्णायक महत्त्व के होते हैं, क्योंकि वे उसकी अंतर्वस्तु ( content ) से जुड़े होते हैं और उसमें होनेवाले परिवर्तन तथा विकास का आधार होते हैं। वस्तु या घटना के आंतरिक अंतर्विरोध उसके सार व प्रकृति को परावर्तित ( reflect ) करते हैं, उद्‍घाटित करते हैं। बाहरी अंतर्विरोध ( external contradiction ) वस्तुओं और घटनाओं के अंतर्संबंधों और परस्पर निर्भरता को परावर्तित और उद्‍घाटित करते हैं। ये वस्तुओं और घटनाओं के विकास को बाहरी रूप से प्रभावित करते हैं और अक्सर आंतरिक अंतर्विरोधों के समाधान पर काफ़ी अधिक असर डालते हैं। इसलिए विभिन्न विकास-प्रक्रियाओं के अध्ययन में इन दोनों तरह के अंतर्विरोधों को ध्यान में रखा जाना चाहिए, साथ ही यह भी कि ‘आंतरिक’ और ‘बाहरी’ में अंतर्विरोधों का ऐसा विभाजन सापेक्ष ( relative ) है।

विकास की प्रक्रिया पर बाहरी और आंतरिक दोनों तरह के अंतर्विरोधों का निश्चित ही प्रभाव पड़ता तो है, किंतु विकास का मुख्य स्रोत ( main source ) आंतरिक अंतर्विरोधों के समाधान की प्रक्रिया है। द्वंद्ववाद की इस प्रस्थापना ( proposition ) का बहुत अधिक व्यावहारिक महत्त्व है : जब हमें किसी समस्या का सामना होता है, तो हमें पहले आंतरिक अंतर्विरोधों को प्रकाश में लाना चाहिए और उनके समाधान का सबसे अधिक सही तरीक़ा खोजना चाहिए। साथ ही हमें याद रखना चाहिए कि आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोध ख़ुद भी विरोधियों के पारस्परिक अंतर्वेधन ( interpenetration ) तथा रूपातंरण ( transformation ) की द्वंद्वात्मकता से संनियमित ( governed ) होते हैं। जो अंतर्विरोध एक स्थिति में बाहरी होते हैं, वे दूसरी स्थिति में आंतरिक हो सकते हैं। मसलन, दो विश्व प्रणालियों के बीच अंतर्विरोध इनमें से प्रत्येक के लिए बाह्य हैं, परंतु सारी मनुष्यजाति के लिए वे आंतरिक हैं। या और सरलता से समझें तो एक परिवार के सदस्यों के बीच अंतर्विरोध, एक दूसरे के सापेक्ष बाहरी हैं, परंतु उस परिवार के लिए वे आंतरिक अंतर्विरोध हैं।

बुनियादी और गैरबुनियादी अंतर्विरोध

आंतरिक और बाहरी अंतर्विरोधों के अलावा बुनियादी और ग़ैरबुनियादी व्याघातों के बीच भी भेद ( distinguish ) किया जाना चाहिए। जो आंतरिक अंतर्विरोध किसी वस्तु अथवा घटना के विकास में निर्णायक भूमिका अदा करते है और जिनका समाधान मूलतः नयी घटनाओं व प्रक्रियाओं की उत्पत्ति की ओर ले जाता है, उन्हें मूलभूत, बुनियादी अंतर्विरोध ( basic contradiction ) कहते हैं। यह उस वस्तु या घटना के सार से संबद्ध होता है। इनके सिवा अन्य सारे अंतर्विरोध गौण और ग़ैरबुनियादी ( non-basic ) होते हैं।

मसलन, पूंजीवाद का बुनियादी अंतर्विरोध उत्पादन की सामाजिक प्रकृति और विनियोजन के निजी पूंजीवादी रूप के बीच होता है। उत्पादन की प्रकृति तो सामाजिक होती है, परंतु उसका नियोजन और वितरण निजी मुनाफ़ा केन्द्रित प्रणाली से होता है। यह बुनियादी अंतर्विरोध ही, पूंजीवाद के अन्य सभी प्रमुख अंतर्विरोधों का निर्धारण करता है।

बुनियादी अंतर्विरोध संबंधी प्रस्थापना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसका व्यावहारिक महत्त्व इस प्रकार है कि जब हमें किन्हीं सामाजिक-राजनीतिक, उत्पादकीय, वैचारिक या वैज्ञानिक-संज्ञानात्मक समस्याओं पर विचार करना होता है, उन्हें हल करना होता है, तो सबसे पहले अध्ययनाधीन प्रक्रिया के बुनियादी अंतर्विरोधों का पता लगाना जरूरी है। इनको निश्चित करने के बाद ही हम उन्हें सुलझाने के साधनों तथा रूपों के चयन में सटीकता ( accuracy ) पैदा कर सकते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप – २ | समय के साये में

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