विकास का उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूलो के अंतर्गत सार्विक संपर्क के उसूल को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम विकास के उसूल पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूल
विकास का उसूल

emergence_michael_kabotieद्वंद्ववाद ( dialectics ) का दूसरा बुनियादी उसूल, विकास का उसूल है। इसका सार यह है कि विश्व को पूर्व-निष्पन्न ( ready made ) वस्तुओं के समुच्चय ( set, collection ) के रूप में नहीं, अपितु प्रक्रियाओं ( processes ) के समुच्चय के रूप में ग्रहण करना चाहिए, जिसमें स्थायी ( permanent ) प्रतीत होनेवाली वस्तुएं सतत आविर्भाव तथा अवसान ( continuative emersion and expiration ) के अविरत परिवर्तन क्रम से गुजरती हैं, जिसमें ऊपर से दिखाई देनेवाली सारी आकस्मिकता ( casualness ) के बावजूद अंततोगत्वा एक अग्रगति ( precession ) अपने लिए रास्ता बना लेती है।

विश्व में जारी परिवर्तन अपने स्वभाव व दिशा में भिन्न होते हैं। इनमें से कुछ एक दूसरे के संबंध में पिंडो की गति होते हैं, अन्य किसी एक वस्तु के गुणों, संरचना तथा कार्य में परिवर्तन होते हैं। कुछ परिवर्तन विपर्येय ( reversible ) होते हैं यानि जिन्हें पुनः पहली स्थिति में लौटाया जा सकता है, एक दूसरे में बदला जा सकता है ( पानी – बर्फ़ – पानी ), और दूसरे अविपर्येय ( irreversible ) होते हैं यानि उन्हें पुनः पहली स्थिति में लौटाया नहीं जा सकता ( भ्रूण – जीव शरीर )। कुछ नयी चीज़, जिसका पहले अस्तित्व नहीं था, पृथक परिवर्तनों के दौरान उत्पन्न हो सकती है। कुछ प्रक्रियाओं का आशय निम्न से उच्चतर और सरल से जटिलतर में संक्रमण ( transition ) है, तो अन्य का उच्चतर से निम्नतर में और जटिल से सरलतम में संक्रमण होता है। ‘विकास’, ‘प्रगति’ तथा ‘प्रतिगमन’ जैसी संकल्पनाओं को परिवर्तन के विभिन्न प्रकारों के संज्ञा-पदों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

विकास ( development ) एक प्रकार की गति है, जिसमें किसी किसी वस्तु अथवा प्रक्रिया की आंतरिक संरचना में परिवर्तन सम्मिलित होते हैं। जब हम कहते हैं कि एक प्रणाली विकसित होती है, तो हमारा मतलब उसकी संरचना ( structure ) में एक आंतरिक ( internal ), गुणात्मक रूपातंरण ( qualitative transformation ) से होता है। संरचनात्मक परिवर्तन अविपर्येय होते हैं और उनकी एक सुस्पष्ट दिशा होती है। इस तरह से कहा जा सकता है कि जिन प्रक्रियाओं में अविपर्येय परिवर्तन होते हैं और किसी नयी चीज़ की उत्पत्ति होती है वे आम तौर पर विकास की प्रक्रियाएं कही जाती हैं

प्रकृति, समाज तथा चिंतन में विकास की तुलना तथा विश्लेषण कर के भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialistic dialectics ) विकास के उन सबसे सामान्य लक्षणों ( general characteristics ) को प्रकाश में लाता है, जो इसे गति के अन्य रूपों से विभेदित करते हैं। ये लक्षण निम्नांकित हैं: ( १ ) विकास की काल में एक दिशा होती है, अतीत से वर्तमान तथा भविष्य को, ( २ ) विकास एक अविपर्येय प्रक्रिया है, ( ३ ) किसी भी विकास के दौरान ऐसी नयी चीज़ उत्पन्न होती है, जिसका पहले अस्तित्व नहीं था, ( ४ ) विकास की प्रक्रिया नियम-संचालित होती है और विकास के अलग-अलग रूपों और सामान्य विकास दोनों के वस्तुगत नियम होते हैं। ये गुण-विशेषताएं ( attributes ) एक सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रवर्ग, यानि “विकास” के अर्थ का निर्धारण करते हैं जो प्रकृति, समाज तथा चिंतन की सारी घटनाओं से संबंधित है।

उच्चतर क़िस्म के संगठन की ओर प्रगतिशील विकास को प्रगति ( progress ) कहते हैं और विपरीत दिशा में होनेवाले परिवर्तन प्रतिगमन ( regression ) कहलाते हैं। विकास, प्रगति और प्रतिगमन की जटिल द्वंद्वात्मक अंतर्क्रिया है। विश्व की, उसके विकास की, मनुष्यजाति के विकास की और मनुष्यों के मन में इस विकास के प्रतिबिंब की सच्ची अवधारणा केवल द्वंद्ववाद की पद्धतियों के द्वारा ही की जा सकती है, जो उद्भावना और तिरोभावना के बीच, प्रगतिशील और प्रतिगामी ( progressive and regressive ) परिवर्तनों के बीच असंख्य क्रिया-प्रतिक्रियाओं को निरंतर ध्यान में रखता है।

blending-the-elements-of-creation-फलतः, सारे विश्व की गति को एक ही दिशा में होनेवाला – आरोही ( प्रगतिशील ) या अवरोही ( प्रतिगामी ) – विकास नहीं माना जा सकता है। केवल अलग-अलग प्रणालियों और प्रक्रियाओं के संबंध में ही निश्चित दिशा में होनेवाले परिवर्तन की बात कही जा सकती है। प्रगति और प्रतिगमन के बीच सहसंबंध ( correlation ) भौतिक जगत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होता है। अजैव जगत में ‘उदासीन’ प्रक्रियाएं हावी होती हैं ( इनमें प्रगतिशील व प्रतिगामी, दोनों ही तरह के परिवर्तन शामिल होते हैं )। लेकिन जैव प्रकृति में परिवर्तनों की मुख्य प्रवृत्ति प्रगतिशील होती है : जीवित प्राणियों के अधिक जटिल आंतरिक संगठन, संरचना तथा कार्यों की ओर। लेकिन यहां भी प्रगति में प्रतिगमन के तत्वों का मेल पाया जाता है।

यद्यपि समाज प्रगति के रास्ते में चलता है, तथापि प्रगति सीधी-सरल नहीं होती। इतिहास में कई विपर्ययों और तीव्र पुनरावर्तनों का होना ज्ञात है, पर इसके बावजूद इसकी सामान्य दिशा आरोही ( ascending ) और प्रगतिशील है। इतिहास में एक दूसरी का अनुक्रमण ( sequencing ) करनेवाली सभी सामाजिक व्यवस्थाएं मानव-समाज के निम्नावस्था से ऊपर की ओर अंतहीन विकास-क्रम की केवल अल्पकालिक मंज़िलें हैं।

यद्यपि गति और विकास के सार्विक ( universal ) होने का तथ्य अविवादास्पद ( uncontroversial ) है, तथापि जैसा कि हम शुरुआत में ही परिचित हो चुके हैं, विश्व प्रक्रिया को समझने के दो दृष्टिकोण हैं, विकास की दो संकल्पनाएं हैं – अधिभूतवादी और द्वंद्ववादी। विकास की द्वंद्वात्मक संकल्पना ( dialectical concept ), गति व विकास के स्रोत के बारे में, उनके स्वभाव, क्रिया-विधि, रूप तथा दिशा के बारे में वस्तुगत एवं विज्ञानसम्मत विवेचना और व्याख्या करती है। वहीं अधिभूतवादी संकल्पना ( metaphysical concept ) इस संदर्भ में आत्मगत ( subjectively ) रूप से, गति व विकास के स्रोतों को समझने में ग़लती करती है, वह विकास को पहले से ही विद्यमान ( existing ) में सामान्य घटती या बढ़ती ( decrease or increase ) समझती है, स्थायित्व ( stability ) को निरपेक्ष बनाती है तथा गति और विकास के अंतर्विरोधात्मक स्वभाव ( contradictory nature ) को समझने में नाकामयाब हो जाती है।

आज के प्रभुत्व प्राप्त वर्ग द्वारा प्रतिपादित विकास की अधिभूतवादी संकल्पना का एक निश्चित वर्ग उद्देश्य है। वह अपनी वर्ग हितबद्धता को ध्यान में रखते हुए, विकास की संकल्पना को इस तरह से पेश करती है, जिससे सामाजिक प्रगति के विचार को ठुकरा या विरुपित ( deform ) कर दिया जाए, शोषक समाज को शाश्वत, वर्गों के बीच संघर्ष को व्यर्थ और एक शोषणविहीन समतामूलक समाज की ओर अवश्यंभावी संक्रमण को, समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण ( revolutionary transformation ) की आवश्यकता को धूमिल कर दिया जाए।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद मूलतः क्रांतिकारी है। यह लोगों को आस-पास के जगत की सारी प्रक्रियाओं और घटनाओं को गति और विकास में देखना सिखलाता है। प्रकृति और समाज में जारी वास्तविक प्रक्रियाओं को अधिक गंभीर और परिपूर्ण रूप से, एकता और संघर्ष की द्वंद्वात्मकता के साथ समझना सिखाता है। यह प्रकृति और समाज के विकास को रेखांकित करते हुए, समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण की संभावनाओं को प्रदर्शित करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – पहला भाग | समय के साये में

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