क्या गति का उद्‍गम है?

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रमविकास पर चर्चा की थी, इस बार हम गति के उद्‍गम को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क्या गति का उद्‍गम है?

कोई भी वस्तु गतिशील कैसे होती है, विकास कैसे करती है, परिवर्तित क्यों होती है?

18Authier2010Fulcrum-565x468प्राकृतिक घटनाओं के ऊपरी प्रेक्षण से प्राचीन समय के कई प्राचीन दार्शनिक इस प्रस्थापना तक पहुंचे थे कि कोई वस्तु किसी बाह्य कारक ( external factor ), किसी अन्य वस्तु के प्रभाव से गतिशील या गतिशून्य बनती है। यह प्रस्थापना, इस अन्य प्रस्थापना से घनिष्ठ रूप से संबंधित है कि एक ही वस्तु एक ही समय में विरोधी गुणों, विशेषताओं या प्रवृत्तियों में, जैसे गतिशीलता और गतिशून्यता की स्थिति में नहीं हो सकती। १७वीं-१८वीं सदियों के सबसे बड़े दार्शनिकों का सोचना यह था कि ये दो प्रस्थापनाएं गति और विकास के कारण ( reason ) संबंधी प्रश्न का एकमात्र तर्क संगत उत्तर पेश करती हैं।

स्वाभाविक ही है कि वस्तुओं की संरचना, उनके गुणों और विशेषताओं का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों और दार्शनिकों का ध्यान सबसे पहले वस्तुओं के बीच मौजूद विरोधों ( conflicts ) पर जाता है न कि किसी वस्तु के अंदर मौजूद विरोधों पर। किंतु जब वे किसी पिंड में घटनेवाली प्रक्रियाओं और परिवेश के साथ उसके संबंधों की जांच करने लगते हैं, तो उनका साक्षात्कार काफ़ी भिन्न स्थिति से होता है।

दूर अतीत काल में ऐसे भी दार्शनिक थे, जो यह मानते थे कि स्वगति, आंतरिक गति तथा एक अवस्था से दूसरी का प्रतिस्थापन करने वाले परस्पर विरोधी आदिकारण या शक्तियां इस विश्व में क्रियाशील हैं। उनका कथन था कि कि प्रत्येक वस्तु दो विरोधी पक्षों ( opposites sides ) से बनी है, जो एक दूसरे के अभाव में अस्तित्वमान नहीं रह सकते हैं क्योंकि वे एक दूसरे की पूर्वापेक्षा करते हैं, साथ ही वे एक दूसरे के सर्वथा विरोधी होते हैं। मसलन, जीवन और मृत्यु, दिन और रात, प्रेम और घृणा, शुभ और अशुभ, पुरुष और नारी, आदि। विश्व में विरोधियों के अस्तित्व के बारे में प्राचीन चीन, भारत, यूनान और मध्यपूर्व के दार्शनिकों ने अपने अनुमानों को अभिव्यक्ति दी थी।

लाओ त्सी जैसे प्राचीन चीनी दार्शनिकों ने सार्विक प्राथमिक उद्‍गम ( universal primary source or origin ) के बारे में बताया और उसे ‘दाओ’ की संज्ञा दी। ‘दाओ’ को कई अंतर्विरोधी अनुगुणों से युक्त बताया गया। ‘दाओ’ रिक्त है और असीम भी, इसी तरह उसके अपने विरोधी में संक्रमण ( transition ) का, रूपांतरण ( conversion ) का विचार भी व्यक्त किया गया है: खंडित पूर्ण को संरक्षित रखने का काम देता है, वक्र ( curve ) ऋजु ( straight ) में परिणत हो जाता है, रिक्त भरा हुआ बन जाता है और पुरातन नूतन से प्रतिस्थापित हो जाता है। सुख में दुर्भाग्य तथा दुर्भाग्य में सुख निहित है । इसी प्रकार के विचार हेराक्लितस  ने भी व्यक्त किये : “हम में सब एक है – जीवित व मृत, जाग्रत व निद्रामग्न, जवान और वृद्ध। क्योंकि पूर्ववर्ती ( preceding ) परवर्ती ( latter ) में विलीन हो जाता है और परवर्ती पूर्ववर्ती में ।” प्राच्य प्रज्ञानियों ने दो आदि तत्वों के बीच संघर्ष की बात कही है : एक ओर प्रकाश और शुभ की, और दूसरी ओर अंधकार और अशुभ की शक्तियों के बीच । इन विचारों का बाद में और अधिक विकास किया गया। उदाहरण के लिए, इतालवी दार्शनिक जिओर्दानों ब्रूनों  का कहना था कि कोई एक विरोध दूसरे का आरंभ होता है, कि विनाश उद्‍भव है और उद्‍भव विनाश, और कि प्रेम घृणा है और घृणा प्रेम। फलतः उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जो कोई प्रकृति के अंतरतम रहस्यों में पैठना चाहता है, उसे चाहिए कि वह अंतर्विरोधों ( contradictions ) और विरोधों ( conflicts ) के न्यूनतम व अधिकतम का प्रेक्षण ( observation ) करे।

alfred-gockel-evolution-iii-78706दैनंदिन जीवन, विज्ञान और राजनीतिक संघर्ष, सभी इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि वास्तविकता अंतर्विरोधों से भरी पड़ी है। किंतु वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस तथ्य को मान्यता देना ही काफ़ी नहीं है। यह भी जरूरी है कि प्रकृति में विद्यमान विरोधियों ( opponents ) के बीच संबंधों की जड़ तक पैठा जाये। केवल दार्शनिक और विज्ञानी ही नहीं, बल्कि साहित्यकार और कवि भी इस तथ्य के प्रति सचेत रहे हैं। मसलन, १७वीं सदी के अफ़गान कवि अब्दुल क़ादिर ख़ान  ने लिखा : बुराई पिटती अच्छाई से / तो पिटती दया बुराई से / दया उचित ठहराती जिसको / क्रोधित निंदा पाता वही बुराई से । रविन्द्रनाथ टैगोर  ने, जिनकी कविताएं उचित ही दार्शनिक निबंध कही जाती है, लिखा कि जीवन अपने सभी रूपों में शुभ है, क्योंकि एक चीज़ दूसरी से उपजती है और दूसरी के द्वारा वांछित ( desired ) होती है। उन्होंने जीवन के अंतर्विरोधों से निष्क्रियता में लौटने से इनकार कर दिया तथा वस्तुओं और घटनाओं की विराट विविधता को सराहा : भाव ललकता होने को साकार रूप में / चाह रूप की भावों में खो जाना / अभिलाषा असीम की सीमित होना / सीमा इच्छुक असीम में घुलने की / बंधन में जकड़े सारे मुक्ति मांगते / मुक्ति चाहती बंधन में बंध जाना ।

विरोधियों के बीच के संबंध शनैः शनैः प्रकाश में आ रहे थे। हेराक्लितस  ने कहा : “सब एक है – विभाज्य और अविभाज्य, जन्मा और अजन्मा, बुद्धित्व और चिरंतनता, पिता और पुत्र…”। यह साफ़ होता जा रहा था कि विरोधियों के बीच का संपर्क सूत्र घनिष्ठ और अटूट होता है, उसके परे उनका अस्तित्व नहीं। किंतु विरोधियों के बीच मात्र एकता ( unity ) के संबंध ही नहीं होते, वे मुखाभिमुख संघर्ष ( struggle ) में भी होते हैं। जर्मनी के महान कवि गेटे का कहना था कि जीवन स्वयं संघर्ष का नाम है, कि वह अच्छाई और बुराई के, प्रेम और घृणा, उल्लास और पीड़ा के बीच संघर्ष है।

जैसे-जैसे पिंड़ो में घट रही प्रक्रियाओं और परिवेश के साथ उसके संबंधों पर ध्यान दिया जाने लगा, वस्तुओं के संबंध में नये तथ्यों और जानकारियों का ज्ञान बढ़ने लगा, प्रकृति की द्वंद्वात्मकता ( dialectics ) का व्यापक रूप सामने आने लगा। हर गतिशून्य पिंड़ गतिशील और हर गतिशील पिंड गतिशून्य भी होता है, कि पिंड में गति और गतिशून्यता, दोनों साथ-साथ पायी जाती हैं और वे एक दूसरे से अविभाज्य ( indivisible ) हैं। हर प्रकार की गति वास्तव में विरोधियों के बीच इसी प्रकार के एकता और अंतर्विरोधों के संबंधों का परिणाम ( result ) होती है।

उदाहरण के लिए, जीवन भी एक गति है, जिसका कारण शरीर से बाहर नहीं होता। शरीर में गति उसमें निहित कारण का ही परिणाम है। इस गति का स्रोत शरीर के अंगीभूत विरोधों – द्रव्यों का आत्मसात्करण ( assimilation ) तथा निस्सारण ( extraction ) – की अन्योन्यक्रिया ( interaction ) है। इन विरोधों के बीच संतुलन, यहां तक कि आंशिक, स्थूल संतुलन भी, बहुत ही कम समय तक जारी रह पाता है। उनमें पूर्ण संतुलन कभी नहीं होता, वे एक दूसरे को निष्क्रिय कभी नहीं कर पाते। जब तक जीवन ( और इसीलिए उनका स्रोत – विरोधों का टकराव ) है, तब तक उनके बीच असंगति ( inconsistency ), विरोध भी बने रहते हैं। इसीलिए स्वतः गतिशीलता ही जीवन है।

निस्संदेह, बाह्य कारकों की भूमिका को पूरी तरह अस्वीकार करना ठीक नहीं होगा, जो किसी न किसी प्रकार से गति में सहायक या बाधक हो सकते हैं। किंतु सभी प्रकार की गति का उद्‍गम, स्रोत ( मूल ) आंतरिक विरोध ही होते हैं : नये विरोधों के आविर्भाव से गति का नया रूप पैदा होता है और जब उनका विलोपन ( elimination ) होता है, तो गति का भी रूप बदल जाता है, जिसकी प्रेरक शक्ति अन्य विरोध होते हैं। प्रत्येक अंतर्विरोध का एक अपना ही इतिवृत ( chronicle ) होता है। वह उत्पन्न होता है, बढ़ता है और फिर उसका समाधान हो जाता है। इस तरह संघर्ष के जरिये विकास होता है, संघर्ष विरोधियों के बीच संबंध का सार है। अधिभूतवादी दार्शनिक विरोधियों की एकता को अस्वीकार करते हैं, वे यह मानते हैं कि प्रत्येक विरोधी स्वतंत्र रूप से विद्यमान होता है। जो लोग विरोधियों की एकता को मानते हैं किंतु उनके बीच संघर्ष को स्वीकार नहीं करते, वे भी इसी अधिभूतवादी स्थिति में होते हैं।

अंत में कहा जा सकता है कि हमें जीवन में, वास्तविकता में लगातार अंतर्विरोधों का सामना करना पड़ता है। वे गति के, विकास के प्राथमिक सारतत्व तथा उद‍गम हैं। इसीलिए उन्हें जानना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह ज्ञान हमारे क्रियाकलाप को कारगर बना देता है। यही इस प्रश्न का आधार है कि हमारे चिंतन में अंतर्विरोध किस तरह परावर्तित ( reflected ) होते हैं? यह अगली बार।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: द्वंद्ववाद और संकलनवाद | समय के साये में

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