क्रमविकास किस प्रकार होता है?

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने विज्ञान की दुनिया की तीन महान खोजों पर चर्चा की थी, इस बार हम क्रमविकास को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क्रमविकास किस प्रकार होता है?

Our-changing-world1दार्शनिक वस्तुओं को उनके परिमाण ( quantity ) तथा गुण ( quality ) से पृथक करते थे। मसलन, देमोक्रितस  ने कहा कि विश्व में परमाणु हैं और शून्य है। परमाणु अपने रूप और भार ( यानि परिमाण ) में भिन्न होते हैं और यह सजीव और निर्जीव वस्तुओं के बीच एकमात्र अंतर है। उन्होंने कहा कि आत्मा भी परमाणुओं से बनी है, जिनका रूप गोलाकार और भार हलका होता है। प्रकृति में परिमाणात्मक संबंधों के प्रश्न को पेश करने वाले पहले व्यक्ति पायथागोरस  थे। उनका विश्वास था कि समस्त अस्तित्वमान वस्तुओं का मूल स्रोत अंक हैं।

परंतु वैज्ञानिकों ने परिमाण तथा गुण के बीच संबंध को बहुत पहले ही मान्यता दे दी थी। मसलन यह बात अरब किमियागरों को ज्ञात थी, जिन्होंने तत्वों के रूपातंरण का सिद्धांत बनाया था। एक प्रवर्ग ( category ) के रूप में गुण का विश्लेषण सबसे पहले अरस्तु  ने किया था। उन्होंने इसे सार की एक विशिष्ट विशेषता के रूप में परिभाषित किया था।

प्रत्येक व्यक्ति जान सकता है कि किसी एक वस्तु या घटना में परिमाणात्मक ( quantitative ) परिवर्तन नये गुण को जन्म देते हैं। हम बढ़ते हैं, अर्थात बालपन से किशोरावस्था में, फिर प्रौढ़ होकर बूढ़े हो जाते है। यह प्रक्रिया ( एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना ) हमारे अनजाने ही होती है और बालपन व किशोरावस्था के बीच की विभाजक रेखा को हमेशा नहीं खोजा जा सकता है। परिमाणात्मक परिवर्तनों का सातत्य ( continuity ) प्राकृतिक तथा सामाजिक प्रक्रियाओं के दौरान नूतन के आविर्भाव का स्पष्टीकरण नहीं देता, साथ ही उसे समझना भी अधिक कठिन बना देता है। नूतन की धारणा एक छलांग सरीखे गुणात्मक ( qualitative ) रूपातंरण के रूप में विकास के साथ अनिवार्यतः जुड़ी होती है।

प्राचीन यूनानी दार्शनिक इस बात को समझ गये थे। उन्होंने ऐसी विशिष्ट मानसिक युक्तियों का सुझाव दिया, जिसमें प्रकृति और मानवजीवन में छलांग सरीखे गुणात्मक रूपांतरणों की अवश्यंभाविता को तार्किक दृष्टि से प्रमाणित किया गया है। ऐसी छलांगें परिमाणात्मक सातत्य का क्रम भंग कर देती हैं। मिसाल के लिए, ‘अंबार’ युक्तिमाला में यह प्रश्न पेश किया जाता है कि रेत के अलग-अलग कणों से एक पूरा अंबार कैसे उत्पन्न होता है। रेत का अकेला कण अंबार नहीं है और दो, तीन, चार या पांच भी अंबार नहीं….अन्य रेत-कणों में एक और रेत-कण डालने से भी अंबार नहीं बनता। तो यह कैसे उत्पन्न हो जाता है? किस विशेष क्षण पर होता है?  इसी तरह ‘गंजा’ युक्तिमाला में इसी प्रक्रिया पर विपरीत क्रम में विचार किया जाता है – कि पुरुष गंजा कैसे हो जाता है? जबकि उसके बालों में एक, दो या तीन, इत्यादि बालों की कमी होने पर वह गंजा नहीं होता है। फिर भी अंबार बन रहे हैं और पुरुष गंजे हो रहे हैं।

इन घटनाओं को परिमाणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों के बीच अंतर्संबंध के विश्लेषण ही से समझा तथा स्पष्ट किया जा सकता है। दोनों ही मामलों में परिमाण में हो रहा सतत परिवर्तन गुणों में परिवर्तन पैदा कर देता है, यानि इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि परिमाणात्मक संचय एक गुणात्मक विशेषता में परिवर्तित हो जाता है। इसका एक अन्य विनोदपूर्ण उदाहरण, जिसे हेगेल  ने प्रस्तुत किया था, इस प्रकार है : आप एक पैसा या चवन्नी-अठन्नी खर्च कर सकते हैं, और यह खर्च महत्त्वहीन है, किंतु यही महत्त्वहीनता आपके बटुवे को खाली कर सकती है और यह एक मौलिक गुणात्मक अंतर है।

दैनिक जीवन की एक परिघटना के वैज्ञानिक विश्लेषण से भी इसे समझा जा सकता है। पानी को यदि  सतत उष्मा दी जाए, तो ग्रहण की जा रही उष्मा के परिमाण में हो रही वृद्धि के अनुरूप ही पानी के तापमान में भी वृद्धि होती है। पानी के गुण में कोई परिवर्तन नहीं होता केवल उसके ताप के परिमाण में परिवर्तन होता रहता है। तापमान में वृद्धि का एक निश्चित मान प्राप्त होने पर ही, यानि १०० डिग्री सेल्सियस पर, यह परिणामात्मक परिवर्तन, गुणात्मक परिवर्तन में एक छलांग लगा देता है। पानी भाप बन जाता है जो कि गुणों में पानी से निश्चित ही भिन्न होता है। इस तरह हम समझ सकते हैं कि एक निश्चित परिमाणात्मक संचय किस तरह छलांग रूप में गुणात्मक परिवर्तनों का कारण बनता है।

2631_952_952_2_-la-recherche-du-temps-perduपरिमाणात्मक परिवर्तन विभिन्न प्रकार के होते हैं : वे या तो मंद और अगोचर होते हैं ( जैसे बचपन से वयस्क अवस्था में परिवर्तन ), या त्वरित हो सकते हैं। परिमाणात्मक परिवर्तनों को क्रमविकासीय विकास ( evolutionary development ) कहते हैं। क्रमविकास ( evolution ) शनैः शनैः होनेवाला, सुचारू तथा मंद प्रकार का विकास है। गुणात्मक विकास क्रांतिकारी ( revolutionary ) होता है, इसमें अतीत का मूलोच्छेद ( extirpate ) हो जाता है और सामाजिक संबंध, संस्कृति, तकनीक, विश्वदृष्टिकोण, आदि आमूलतः बदल जाते हैं। सामाजिक क्रांतियां ( social revolutions ) तथा वैज्ञानिक खोजें इसी प्रकार के विकास का उदाहरण हैं।

परंतु कुछ वैज्ञानिक और दार्शनिकों का ख़्याल है कि प्रकृति और समाज में केवल परिमाणात्मक परिवर्तन ही होते हैं। इस तरह से वे अधिभूतवादी ( metaphysical ) दृष्टिकोण अपना लेते हैं, जिससे परिमाणात्मक संबंध निरपेक्ष ( absolute ) और प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, अनाक्सागोरस  ने कहा है कि मनुष्य के बीज में आंखों से न देखे जा सकनेवाले सूक्ष्म बाल, नख, वाहिकाएं, पेशियां तथा हड्डियां होती हैं, जो विकास के दौरान परस्पर मिलती हैं, बढ़ती तथा दृश्य हो जाती हैं। इसी तरह के दृष्टिकोण किंचिंत परिवर्तित रूप में जैविकी में और आगे चलकर समाज विज्ञान में भी प्रविष्ट हो गये। इस तरह समाज के विकास को क्रमविकास में सीमित कर दिया जाता है और क्रांतिकारी परिवर्तनों से इंकार कर दिया जाता है। इसके व्यावहारिक परिणाम होते हैं। राजनीति में क्रमविकासवाद, सुधारवाद तथा दक्षिणपंथी अवसरवाद के लिए प्रचार का द्योतक है। इस सिद्धांत के अनुयायी सामाजिक परिवर्तनों को केवल एक सुचारू रूप से क़दम-ब-क़दम चलने वाली प्रक्रिया मानते हैं। इसलिए वे वर्गों के बीच सहयोग की वकालत करते हैं और सरकारी सुधारों तथा संवैधानिक संशोधनों, आदि के महत्त्व को बढा-चढ़ाकर पेश करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण की प्रक्रिया को रोकने की कोशिश करते हैं यानि वास्तव में क्रांति के विरुद्ध ही खड़े होते हैं।

इसी का दूसरा छोर है गुणात्मक परिवर्तनों को निरपेक्ष बनाना। इसमें विकास को एक अनन्य गुणात्मक परिवर्तन मात्र माना जाता है। कुछ पश्चिमी वैज्ञानिक फ्रांसीसी प्रकृतिविद जी. कुविए  रचित महाविपत्तिवाद के सिद्धांत को दर्शन के क्षेत्र में जबरन घसीट लाते हैं। कुविए का विचार था कि विकास प्रशांत अवस्था से महाविपत्ति की अवस्था की ओर जा रहा है। यद्यपि आगे चलकर विज्ञान ने कुविए के विचारों का खंडन कर दिया, तथापि उन्हें सामाजिक प्रक्रियाओं की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया गया और उन्होंने अराजकतावादियों ( anarchists ) तथा हर प्रकार के राजनीतिक दुस्साहसवादियों के लिए राजनीतिक कार्यकलाप के आधार का काम किया। उपरोक्त तरह के विचार अधिभूतवादी है, क्योंकि वे या तो मात्र परिमाणात्मक परिवर्तनों पर या केवल गुणात्मक परिवर्तनों पर आधारित हैं। किंतु वास्तव में विकास, परिमाणात्मक और गुणात्मक परिवर्तनों का एकत्व है, जिसमें परिमाणात्मक परिवर्तन, छलांगों के लिए या गुणात्मक परिवर्तनों के लिए, क्रमविकास में नये, आमूल परिवर्तन के लिए रास्ता तैयार करते हैं।

इसका समापन करते हुए हमें इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि छलांगें भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है और सब की सब एकसमान नहीं होतीं। मसलन, वे एक निश्चित तापमान पर धातु के तरल में या पानी के भाप में रूपांतरित होने के समकक्ष हो सकती है, अथवा वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति के। छलांगों को कई सहस्त्राब्दियां भी लग सकती हैं, जिसका एक उदाहरण भौगोलिक युगों का अनुक्रम है, या वे ऐतिहासिक दृष्टि से एक अल्पावधि में ही हो सकती हैं।

परिमाण से गुण में संक्रमण का सिद्धांत भौतिकवादी द्वंद्ववाद को एक विशिष्ट क्रांतिकारी स्वरूप प्रदान कर देता है। यह सामाजिक प्रगति ( progress ) के बुनियादी सार का स्पष्टीकरण देता है और एक प्रदत्त अवस्था में समाज या देश के क्रमविकास के सहज परिणाम-रूप में क्रांति को लानेवाले क्रमविकासीय परिवर्तनों को समझना आसान बना देता है।

अब जबकि हम यह समझ चुके हैं कि गति परिमाणात्मक से गुणात्मक परिवर्तन की ओर होती है, तो हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि गति का स्रोत क्या है? इसे अगली बार देखेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: क्या गति का उद्‍गम है? | समय के साये में

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