ईश्वर की अवधारणा और इसके विकास का स्वरूप – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

संवाद की इन्ही श्रृंखलाओं में, कुछ समय पहले एक गंभीर अध्येता मित्र से ‘ईश्वर की अवधारणा’ और इसकी व्यापक स्वीकार्यता के संदर्भ में एक संवाद स्थापित हुआ था। अब यहां कुछ समय तक उसी संवाद के कुछ संपादित अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


ईश्वर की अवधारणा और इसके विकास का स्वरूप – ३

( पिछली बार से जारी……….)

tumblr_ma2cmbqNFx1rui49ao1_1280इसलिए यह निष्कर्ष निकालना क्या उचित नहीं होगा, मानव-मस्तिष्क और उसके समस्त क्रियाकलाप अंततः इसी प्रक्रिया से गुजरे हैं, और इसीलिए मूलभूत रूप से जिस तरह मानव-मस्तिष्क, उसके विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज है, अंततः मूल रूप से मानव-मस्तिष्क के सभी क्रियाकलाप भी इन्हीं ऐतिहासिक परिस्थितियों की पैदाइश हैं। यानि कि ऐसा कहा जाना अधिक उचित नहीं रहेगा, कि अन्य विचारों या अवधारणाओं की तरह ही, ईश्वर की अवधारणा भी, ऐतिहासिकतः विकसित हुए मानव मस्तिष्क और चेतना की पैदाइश ही है, जो कि अंततः उसके विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों की स्वाभाविक परिणति या उपज है।

इसीलिए इतिहास में हम पाते हैं, कि जिस तरह से स्वयं मानव का क्रम-विकास हुआ है, उसके मस्तिष्क और चेतना का क्रमिक विकास हुआ है, उसके समाज और संस्थाओं का क्रम-विकास हुआ है, उसकी भाषा और चिंतन का क्रम-विकास हुआ है, उसके अन्य विचारों और अवधारणाओं का क्रम-विकास हुआ है, ईश्वर और धर्म से संबंधित अवधारणाओं का भी एक समुचित क्रम-विकास संपन्न हुआ है। और यह भी कि क्रमिक रूप से, सरल रूपों से जटिलतर रूपों में विकसित हुई चीज़ों के लिए, कोई सरलीकृत, विशिष्टीकृत आधार, कोई विशिष्ट जनक ढूंढ़ना, ऐतिहासिकतः और वस्तुगत वैज्ञानिकतः रूप से अधिक समीचीन नहीं है। इस तरह की कार्यवाहियां ही, अपनी विशिष्ट परिणति में मानव जाति को एक विशिष्ट जनक आदम-ईव या मनु-शतरूपा के मिथकों और साथ ही सृष्टि की रचयिता किसी परम चेतना की काल्पनिकता तक ले गई थीं।

आप भले ही समाधान के लिए शब्दावली कुछ भी काम में ले रहे हैं पर आप भी इस विकास प्रक्रिया से इतनी भली-भांति मुतमइन हैं कि यह निष्कर्ष निकाल पा रहे हैं कि ‘मुझे यह भी लगता है कि क्रमिक विकास होते होते एक दिन मानव जाति इस अवधारणा को नकार भी देगी’। जिस तरह से आप इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, उसी तरह से मानवजाति का अद्यानूतन दर्शन भी इसी निष्कर्ष तक पहुंचता है। वह इसे इस शब्दावली में कहता है कि, जिस तरह ईश्वर की अवधारणा एक निश्चित और विशिष्ट परिस्थितियों की उपज है, उसी तरह से विकास-क्रम में इन निश्चित और विशिष्ट परिस्थितियों का लोप होने पर, ईश्वर की अवधारणा स्वतः ही लुप्त हो जाएगी, इतिहास की चीज़ हो जाएगी। यह कई अन्य अवधारणाओं की तरह सिर्फ़ अध्ययन और आश्चर्य मिश्रित हास्यबोध का विषय रह जाएगी कि क्रम-विकास में मनुष्य का ज्ञान, एक समय में इन अवस्थाओं में था कि वह इस तरह के काल्पनिक समाधानों की दुनिया में विचरण किया करता था, और धर्म तथा ईश्वर की इन अवधारणाओं को अपने हितार्थ नाना-रूपों में पल्लवित कर कुछ व्यक्ति या समूह एक लंबे समय तक समाज में अपने-आप को प्रभुत्व प्राप्त स्थिति में बनाए रखने में सफल रहे थे। 🙂

ऐसा होना भी सिर्फ़ इसलिए संभव नहीं हो गया कि यह किसी विशिष्ट मस्तिष्क या चेतना की, या विशिष्ट समूहों के सचेतन प्रयासों से निगमित हुआ हो, ऐसा होना इसलिए भी संभव हो पाया कि ऐसा होने के निश्चित भौतिक पूर्वाधार मौजूद थे। भौतिक-जीवनीय परिस्थितियां, तद्‍अनुकूल चेतना और परिवेश के ज्ञान का स्तर, जीवनयापन हेतु उत्पादन प्रक्रिया और प्रणालियों का स्तर, प्रकृति के सामने असहायता और विवशता, जीवन के सामने प्रस्तुत ख़तरों से उत्पन्न भय, प्राकृतिक शक्तियों के बारे में उसका अज्ञान, उनसे बचने-निपटने, उन्हें अपने वश में नियंत्रित करने की महती आवश्यकता, आदि-आदि, ये सब आपस में अंतर्गुथित हैं और इस तरह की अवधारणाओं के विकास के भौतिक आधारों की पूर्वपीठिका निर्धारित करती हैं।

हालांकि हम इस बात को समझ रहे हैं कि आपके ‘ईश्वर मानव मस्तिष्क की पैदाईश है।’ कहने का मंतव्य दरअसल, यह स्थापित करना है कि ईश्वर का यथार्थ अस्तित्व नहीं है और यह मनुष्यों के दिमाग़ की परिकल्पना मात्र है। पर चूंकि हमारे संवाद का प्राथमिक उद्देश्य नास्तिकता के आधारों को समृद्ध करना था, इसलिए हम इस बात पर इतना जोर दे रहे हैं कि चेतना को ( जो जाहिरा तौर पर मानव-मस्तिष्क की प्रक्रियाओं का विशिष्ट उत्पाद है ) प्राथमिक समझना, उसे मूल कर्ता, कारण के रूप में स्थापित करना अंततः अपनी तार्किक परिणति में उसी भाववादी विचारधारा तक पहुंचता है, कि जिस तरह मनुष्य द्वारा सृजित परिवेश के पीछे उसकी चेतना मूलभूत है, पदार्थ और इस विश्व के सृजन के पीछे भी, किसी चेतना, परम चेतना का मूलभूत होना स्वाभाविक और आवश्यक है। यही तो ईश्वर तथा धर्म की अवधारणाओं और उसके सांस्थानिक रूपों का मूलाधार है।

( अगली बार लगातार…..)


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: ईश्वर की अवधारणा और इसके विकास का स्वरूप – ४ | समय के साये में

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