मानसिक और शारीरिक श्रम

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


मानसिक और शारीरिक श्रम

propaganda_karlengland_0212_2मानसिक और शारीरिक श्रम क्या हैं ?  दोनों में क्या अन्तर है ?  दोनों में महत्व किसका अधिक है। सुझाएँ।

श्रम का मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन। श्रम का उद्देश्य निश्चित समाजिकतः उपयोगी उत्पादों को पैदा करना है। जाहिर है, इसके लिए उसे अपने पूर्व के अनुभवों के आधार पर पहलें मानसिक प्रक्रिया संपन्न करनी पड़ती है, आवश्यकता क्या है, उसकी तुष्टि के लिए क्या करना होगा, किस तरह करना होगा, एक निश्चित योजना और क्रियाओं, गतियों का एक सुनिश्चित ढ़ांचा दिमाग़ में तैयार किया जाता है तत्पश्चात उसी के अनुरूप मनुष्य प्रकृति पर कुछ निश्चित साधनों के द्वारा कुछ निश्चित शारीरिक क्रियाएं संपन्न करता है।

यानि किसी भी उत्पाद को तैयार करने में, उत्पादन में मानसिक तथा शारीरिक क्रियाएं अंतर्गुथित होती हैं। पहले की उत्पादन प्रक्रियाओं में उन दोनों प्रक्रियाओं की सभी क्रियाएं एक ही मनुष्य द्वारा संपन्न की जाती थी, परंतु आज की विकसित उत्पादन प्रक्रियाओं में, जबकि उत्पादन का समाजीकरण होता जा रहा है, किसी भी उत्पाद की संपूर्ण प्रक्रियाओं का विलगीकरण हो जाता है, और यह प्रक्रिया कई टुकड़ो में बंट जाती है। मानसिक प्रक्रियाएं, शारीरिक प्रक्रियाएं अलग होती है, और इनके भी कई टुकड़े हो जाते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि उत्पादन प्रक्रियाओं में मानसिक तथा शारीरिक श्रम अलग होते जाते हैं। ये भी और हिस्सों में बंट कर अलग-अलग व्यक्तियों के श्रम योगदान में परिवर्तित हो जाते हैं।

इस तरह आजकल मानसिक और शारीरिक श्रम काफ़ी दूर हो गये हैं, कई बार तो लगता भी नहीं कि ये किसी एक ही उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े हैं। अब यह समझा जा सकता है कि इनमें क्या अंतर है। ये सामाजिकतः उपयोगी उत्पादन प्रक्रियाओं के दो भिन्न पहलुओं को परावर्तित करते हैं। एक में मानसिकतः प्रधान और दूसरी में शारीरिकतः प्रधान सार्थक क्रियाएं संपन्न की जाती हैं।

अगर हमने यह समझ लिया है कि ये आपस में अंतर्गुथित हैं, तो महत्त्व का सवाल ही बाकी नहीं रह जाता। परंतु समाज में प्रचलित मानसिकताओं और दृष्टिकोणों के अनुसार इनको विभिन्न सामाजिक संरचनाओं में अलग-अलग महत्त्व दिया जाता है। जहां शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखा जाता है वहां मानसिक श्रम को जाहिरा तौर पर ऊंचा दर्ज़ा प्राप्त होता जाता है। समाज के साधनसंपन्न लोग उत्पादन प्रक्रियाओं के मानसिकतः पहलू पर अपना आधिपत्य और एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश करते हैं, ताकि बाकियों को हेय शारीरिक श्रम में लगाए रखा जा सके और वे उससे बचे रह सकें। पढलिखकर ऊंचे ओहदों और कार्यों को लपकने के लिए चल रही गलाकाट प्रतिस्पर्धा में इसका प्रतिबिंबन आसानी से देखा जा सकता है, यह व्यवस्था उन्हें लूट के अधिक हिस्से का , लाभ का बनाए रखकर इसमें मदद करती है।

व्यापक रूप से देखा जाए तो श्रम की प्रक्रिया एक अभिन्न सी प्रक्रिया है जिसमें मानसिक और शारीरिक पहलू आपस में गहरे से अंतर्गुथित होते हैं। दरअसल इन्हें अलग-अलग रूपों में महसूस करके जो भ्रम रचा जाता है वह अपने को व्यापक सर्वहारा वर्ग से अलग और शासक वर्ग के साथ निकटता महसूस करने के लिए होता है। मानसिक श्रम करने वाले भी यदि उनके पास बुर्जुआ साधन नहीं है और वे अपने जीवनयापन के लिए अपना श्रम ( चाहे मानसिक श्रम ही ) बेचकर ही गुजारा कर सकते हैं तो वर्गीय दृष्टि से वे सर्वहारा वर्ग में ही आते हैं। परंतु वे थोड़ा अधिक फैंका हुआ हिस्सा पाते हैं, इसलिए अधिक साधन संपन्न हो जाते हैं और अपने को प्रभुत्वशाली वर्ग के पास पाते हैं, वैसा ही बन जाने या बन पाने के सपने रचते हैं, तो इसीलिए वे इस मानसिक श्रम के अलगाव का भ्रम रचते हैं जो उन्हें शारीरिक श्रम करने वालों से अलग, श्रेष्ठ होने का सुक़ून देता है। यह भ्रम व्यवस्था द्वारा फैलाया और पोषित किया जाता है, वह ऐसा मानसिक श्रम वालों को अधिक हिस्सा प्रदान करके किया करती है और उनकी प्रतिरोधी चेतना को कुंद करती है, सर्वहारा वर्ग में फूट डालती है, उनमें मानसिक परिपक्व नेतृत्व की संभावनाओं को कमजोर करती है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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