भाषाई श्रेष्ठता का सवाल

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


भाषाई श्रेष्ठता का सवाल

upper-paleolithic-cave-artकम्प्यूटर की भाषा पर।….लेकिन जो कहा वही है कि भाषा का असर कम्प्यूटर पर पड़ता है। संस्कृत का असर नेट पर हिन्दी आदि से बहुत अधिक है

हमारा मंतव्य और स्पष्ट करते हैं। यह तो वास्तविकता है ही कि कंप्यूटर का विकास किसी भाषा-विशेष को ध्यान में रखकर तो हुआ नहीं है। अब यह संयोग दीगर है कि किसी भाषा-विशेष से इसकी समरसता अधिक बैठती है या किसी से कम। इसका उल्टा पक्ष भी देखिए कि यदि संस्कृत या हिंदी, कंप्यूटर के साथ संगत बेहतरी से नहीं बैठा पा रही होती तो क्या हीन मानकर इन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए? हिंदी ही क्यों, कोई और भाषा ही हो। जो जिस भाषा को बोलता है, उसको अधिकार है कि वह अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल करे, उसको कठिनाई से ही सही नई तकनीक के साथ हमसाया करे।

यहां भी हम एक बार फिर वही कहना चाहेंगे कि श्रेष्ठता बोध ढूंढना ठीक नहीं लगता। हर मानवसमाज की भाषा उसके विकास, समाज, संस्कृति, परंपराओं, अनुभवों आदि-आदि का परावर्तन होती है। उसको उसकी मातृभाषा से मरहूम कर देना, उसकी सकारात्मक विरासत से उन्हें मरहूम कर देना है। उनका साम्राज्यवादी अनुकूलन कर देना है। ऐसा लगता है।

श्रेष्ठता साबित करने की बात होनी ही नहीं चाहिए, भले ही कोई श्रेष्ठ नहीं हो तो क्या उसका दमन कर दिया जाएगा, उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए? श्रेष्ठतर की उत्तरजीविता के प्राकृतिक उपक्रम को, मनुष्य जाति पर जंगली रूप में थोपना क्या मानवोचित है। मनुष्य, प्रकृति की खिलाफ़त में मनुष्य बना है और क्या इसीलिए मानवीयता के, इस प्राकृतिकता से हटकर अलग मायने, अलग मूल्य नहीं होने चाहिए ?

लेकिन अंग्रेजी के मामले में एक नफ़रत सी होती है और यहाँ समझौता नहीं करना चाहता….क्या यह सब देख-सुनकर गुस्सा नहीं आना चाहिए….जो बार बार सवाल करते हैं या भारतीय भाषाओं का मजाक उड़ाते हुए अंग्रेजी का समर्थन करते हैं। बार बार हिन्दी का अपमान या उसे कमजोर-छोटी भाषा कहने वालों के लिए…..कुछ कहा नहीं जाना चाहिए? यहाँ कुछ कहिए।

बाद में कभी इस पर वस्तुपरकता से बाते कर ली जाएंगी।

हालांकि यदि कोई किसी भी तरह का अनर्गल प्रलाप करता है तो उसका उचित और तार्किक जवाब प्रस्तुत किया जाना भी आवश्यक है। यदि आपको लगता है कि हिंदी के प्रति अपमान का भाव फैलाया जा रहा है या उसकी उपयोगिता के संदर्भ में गैरवाज़िब तर्क फैलाए जा रहे हैं, जो कि किसी हद तक सही भी है, तो इस तरह का कहना प्रासंगिक भी है।

इस पर बाद में बात करेंगे, हमारा उद्देश्य अपने आप में वह निर्लिप्तता पैदा करना है जब हम चीज़ों को वस्तुगत रूप से समझना सीख सकें, और यदि जरूरी भी हो तो सचेत रूप से, अंदर से किसी आत्मपरक भावना से विरत रहकर भी, अपनी बात को तार्किक रूप से रख सकें। तभी हमारी बात अधिक तार्किक, निष्पक्ष और प्रभावी बन उठती है।

एक अस्त्र बहिष्कार है। यद्यपि इसे राजीव दीक्षित से सुना है लेकिन यह फिलहाल या इस लोकतंत्र में बड़े काम का मालूम पड़ता है। जैसे अंग्रेजी से बहिष्कार का काम अंग्रेजी अखबारों, अंग्रेजी व्याख्यानों, अंग्रेजी समाचार, अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का बहिष्कार करके बहुत हद तक किया जा सकता है और इसकी सम्भावना भी लगती है।

ऊपर की बात के संदर्भ में ही इसे भी समझा जा सकता है। अंग्रेजी का बहिष्कार, बिना किसी वैकल्पिक आसरे के तो और मुश्किल पैदा कर देगा। अंग्रेजी इसलिए नहीं चल रही है कि यह श्रेष्ठ है या बेहतर है। यह इसलिए चल रही है कि यह सत्ता की भाषा है। अंग्रेजों के जमाने से ही, और हमारे हुक्मरानों ने आज़ादी के बाद भी इसे अपने लिए मुफ़ीद पाकर इसे बचाए और बनाए रखा। अभी इस पर ज़्यादा नहीं कहेंगे, पर यह तो कहा ही जा सकता है कि जबकि अभी सारी महत्त्वपूर्ण नौकरियां, व्यवसाय, सत्ता के विभिन्न उपागम इसी के ज़रिए पाए जा सकते हैं और पाये जा रहे हैं तो लोग उसे अपनाने को मजबूर होंगे ही। बेहतर जीवनयापन की सारी परिस्थितियां इस अंग्रेजी से जुड गई हैं, उसके साथ नाभिनालबद्ध हैं। कुलमिलाकर लाबलुब्बोआब यह है कि कोई भी भाषा परवान नहीं चढ़ सकती यदि वह सत्ता की भाषा नहीं बनती, यदि वह रोजगार देने में सक्षम नहीं है। और इसीलिए यह भी राजसत्ता से जुड़ा मामला हो जाता है।

“सभी क्षेत्रों में अन्य भाषाओं को तो छह महीने में लाया जा सकता है। बस, राजनैतिक  इच्छा शक्ति और षडयंत्र जैसे कारक बाधा डालते हैं।”….”कुछ अच्छी मांगे जिनसे देश के लोगों को मूलभूत सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हो पातीं, ऐसा कुछ करते। नहीं किया इन्होंने।”

तो क्या हमें इतना मासूम होना चाहिए कि हम यह भी नहीं समझ सकें कि सत्ता-पूंजी का गठजोड़ इतनी आसानी से अपने हितों के अनुकूल बनाई हुई परिस्थितियों को बिना किसी प्रतिरोध के अपने हाथ से निकलने देगा और ख़ुद अपने लिए खाई खोदने का कार्य करेगा।

सत्ता-पूंजी का गठजोड़, अपने हितसाधक राज्य के जन कल्याणकारी चरित्र को उतना ही वास्तविक बनाने के लिए मजबूर होता है, जितना की अपनी यथास्थिति बनाए रखने और संसदीय लोकतंत्र में अपनी चुनावी राजनीति के लिए आवश्यक समझता है। इसी हेतु यह गठ-जोड़ सभी तरह के राजनैतिक-खेलों, ड्रामों और षड़यंत्रों और यदि इनसे भी काम नहीं चल रहा हो, तो तानाशाही दमन के रास्ते अख्तियार करता है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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