लड़ाई इस व्यवस्था के विरुद्ध होनी चाहिए

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


लड़ाई इस व्यवस्था के विरुद्ध होनी चाहिए

1964-Oppressed-peoples-unite“लेकिन एक सवाल फिर उठता है कि जो विचार सही थे, उन्हें इतने समय तक दबाना विचारों या सत्य के उपर वर्ग-विशेष की जीत तो नहीं?” इसका अभिप्राय था कि बौद्ध या चार्वाक जो बहुत हद तक (अपनी अल्प जानकारी के हिसाब से) आधुनिक और प्रगतिवादी लगते हैं, इन्हें लम्बे समय तक कैसे दबा कर रख लिया गया….सवाल यह है कि लम्बे समय तक ऐसा होना शोषक वर्ग की इतनी लम्बी जीत का प्रतीक है।

यह है, तो इसका मतलब यही है कि यह प्रभुत्व प्राप्त शोषक वर्गों की लंबी जीत का ही प्रतीक है। ये अलग बात है कि शोषक वर्ग बदलता भी रहा है। जो ओझाओं, सरदारों, जमींदारों, सामंतों, ब्राह्मणों, व्यापारियों, पूंजीपतियों या इनके विभिन्न गठजोडों तक बदलता रहा है। कल्पनाओ की उड़ान कितनी भी कर ली जाए, पर समाज पर किसी वर्ग का प्रभुत्व उसकी राज्य-सत्ता में निहित होता है। इसका मतलब यह भी है कि शोषित वर्ग किसी भी विचारधारा को रख लें, उसे उसकी वास्तविक क्रियान्वनकारी शक्तियां तब तक प्राप्त नहीं हो सकती हैं जब तक कि उसका राज्य-सत्ता पर नियंत्रण ना हो जाए।

लेकिन साफ कहा जाय तो थोपने वाले साम्राज्यवादी लोगों से नफ़रत सी होती है और वहाँ उन्हें कमतर मानना पड़ता है, कम से कम इस मामले में कि अपनी सोच साम्राज्यवादी तो नहीं है।

यह वाज़िब बात है, इसमें तकलीफ़ ही क्या होनी चाहिए। साम्राज्यवादी, पूंजीवादी, असामाजिक, व्यक्तिवादी, शोषक, वर्ण-नस्ल या धार्मिक श्रेष्ठतावादी प्रवृत्तियों और उनका झंड़ा थामने वाले व्यक्तियों और समूहों से नफ़रत सी होनी ही चाहिए।

समाज अधिकतर रूप से दो ही सामान्य प्रवृत्तियों-शक्तियों में बंटा हुआ होता है जिन्हें हम सामान्य रूप से शोषक या शोषित वर्गों के रूप में रख सकते हैं। हमें इनके बीच अपनी पक्षधरता चुननी और निश्चित करनी चाहिए। दोनों वर्गों के पास अपनी-अपनी विचारधाराएं हैं, हमें उनमें फर्क करना सीखना चाहिए। इसे थोड़ी सी सावधानी से समझा सकता है, यदि हम उसे इस कसौटी पर कस कर देखें कि किस चीज़ से अंततः किस वर्ग को फायदा पहुंचता है। यानि वह दिखते रूप में कैसी भी क्यों ना लगती हो, कुछ भी क्यूं ना कहती हो, यदि वह अंततः शोषक वर्ग को फायदा पहुंचा रही है तो यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि वह अंततः शोषक वर्ग की विचारधारा का ही एक छद्म या स्पष्ट रूप है। इसी तरह उन विचारधाराओं को भी आसानी से पहचाना जा सकता है जो शोषित वर्ग के साथ अपनी पक्षधरता रखती हैं। अपनी पक्षधरता निश्चित करने के बाद, अपने शत्रु वर्ग के प्रति नफ़रत का होना, उन्हें कमतर या असामाजिक समझना इतना नाजायज़ भी नहीं है।

मगर यह श्रेष्ठताबोध वाली बात अपने पक्ष और पक्षधरताओं के बीच तो नहीं ही होनी चाहिए। शोषित वर्गों के बीच ( जो कि वैश्विक हैं ) किसी भी तरह की श्रेष्ठताबोधों के द्वारा अलगाव पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से भी तो हमें नफ़रत होनी चाहिए। हमें तात्कालिक रूप से, और दूरगामी रूप से भी ऐसी प्रवृत्तियों को समझना और चुनना, उनसे नफ़रत करना और उन्हें अपने बीच से निकाल फैंक देना भी तो हमारा लक्ष्य होना चाहिए जो शोषित वर्ग और उसकी पक्षधरताओं के बीच वैमनस्य पैदा करती हैं, खाई बढ़ाती हैं।

अब देखिए कि मैं किसी धार्मिक मंदिर या दिखावे के लिए चंदा नहीं देता हूँ। और तुरन्त कहा जाता है कि यह व्यक्ति मुस्लिम है। क्या ऐसे ही मामलों से धर्म के विरुद्ध जमकर बोलने का मन नहीं होता। मतलब एक आदमी  की पहचान वह भी इस रूप में की जाती है। संयोग से मैं नास्तिक ठहरा लेकिन आस्तिक हिन्दू कोई होता तो इस बात के लिए लड़ाई छिड़नी ही थी लेकिन यह वाक्य मुझ पर असर नहीं डाल सका सिवाय इस अनुभव के। इस पर कहिए कुछ।

वस्तुस्थिति तो यही है कि आदमी की पहचान इसी रूप में की जाए, इसके लिए भरपूर परिस्थितियों को कायम रखा जाता है। नये भ्रम रचे जाते हैं। कुछ व्यक्ति, जिनके पास सम्मानजनक आजीविका के साधन नहीं हैं, लेकिन वे इन परिस्थितियों को समझते है जिनमें सीधे या इस तरह की भावनाओं को उभार कर भीख, चंदें या दान के रूप में इनको ऐन्कैश किया जा सकता है और अपनी आजीविका चलाई जा सकती है। यही भौतिक परिस्थितियां ऐसे क्रियाकलापों को बनाए रखती हैं। ऐसे कई व्यक्तियों की, समूहों की आजीविकाएं, इसी तरह की गतिविधियों पर निर्भर हैं। जाहिर है, इनकी व्यवसायिकता, लोगों को इसी तरह के कई भ्रमों, अंधविश्वासों, परंपराओं, कर्मकांड़ो में उलझाए रखने की भरसक कोशिश करेगी। लोगों को इनसे मुक्त करवाने वाली हर कोशिशों का साम-दाम-दंड़-भेद से प्रतिकार करेगी।

धर्म के विरुद्ध जमकर बोलने और उसके अंतर्विरोधों, अप्रासांगिकता और प्रतिगामी स्वरूप को सामने लाना एक जरूरी कार्य है। हम जो आपको निरंतर कह रहे हैं, उसमें हमारा मंतव्य इसको रोकने का नहीं, वरन सही पद्धति के साथ सार्थक रूप से कर पाने का है। उद्देश्य धर्म के खिलाफ़ क्रोध प्रकट करने और सिर्फ़ इसकी खिलाफ़त का नहीं है, वरन उद्देश्य इसके जंजालों से अपने संपर्क में आए व्यक्तियों या समूहों को मुक्त कराने का है। हमारे लिए वह व्यक्ति ही सबसे महत्त्वपूर्ण होना चाहिए, जो दत्त समय में हमारे सामने हैं और जिसकी आस्थाएं और समझ उसको सांयोगिक रूप से मिली परिस्थितियों की उपज मात्र है। इस लक्ष्य को, उस व्यक्ति को, अपने सामने से हटाकर, उसे भुलाकर, उसकी उन चीज़ों के लिए उस पर पिल बैठना जिनके लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार नहीं है, कहां की समझदारी कही जा सकती है।

उससे तो हमें सहानुभूति ही रखनी चाहिए, वह तो भुगत-भोगी मात्र है, लड़ाई तो उस व्यवस्था के विरुद्ध लड़नी चाहिए जो ऐसी परिस्थितियों को जारी रखना चाहती है जिसमें ये सारे अमानवीय, अंधविश्वासी, और नफ़रत पैदा करने की वस्तुस्थितियां संभव बनी हुई हैं।

इस हेतु विश्वसनीयता वाली बात पर हम पहले ही कई इशारे कर चुके हैं।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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