व्यवहार के मानकों का आदर्शवाद

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


व्यवहार के मानकों का आदर्शवाद

guernicaहम इस पर पहले ही बात कर चुके है लेकिन आपके विचार इसपर सुनना चाहते हैं कि क्या जिस आदमी के समझ में यह बात आती है कि ये कम्पनियाँ आर्थिक गुलाम बना रही हैं, उसे क्या करना चाहिए? क्या उसे इनके उत्पाद खरीदने चाहिए? हालाँकि हम यह समझते हैं कि हमें दोनों के खिलाफ रहना है। आखिर इस दुविधा में वह आदमी क्या करे?

ये व्यक्तिगत डूज़ एंड डोन्ट्स की बाते हैं। कोई बड़ी दुविधा भी नहीं। यदि वह ऐसा करना चाहता है, करे, इसमें क्या दिक्कत हो सकती है, नहीं कर सकता है, तो ना करे, जीवनीय जरूरतों और इन्हें बेहतर बनाने के संघर्षों के सापेक्ष ये कोई मुख्य सवाल भी नहीं है। करना भी चाहे, तो यह वहां ही और उन मामलों में ही संभव है जहां हमारे पास विकल्प मौजूद हों, और बात सिर्फ़ एक चुनने की हो।

दुविधा की बात इसलिए समझ आती है कि यदि हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करते हैं, उनके षड़यंत्रों को समझने और समझाने की कोशिश करते हैं तो फिर यदि हम उनके उत्पादों को खरीदते हैं तो ये हमारे लिए आत्मिक तौर पर अंतर्विरोध पैदा करता है, खासकर हमने यदि इस बात को अपने लिए अधिक ही महत्त्वपूर्ण बना लिया है, और हमारे लिए कंपनियों के विरोध से अधिक उत्पादों को खरीदना या नहीं खरीदना ही अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है ( श्रम और उत्पादों पर हम पिछली बार बात कर ही चुके हैं, काम करने वाली बात के दौरान )। ऐसे में सामान्यतः, जहां तक हो सके, इसे महत्त्वपूर्ण सवाल बनाने से बचने की कोशिश करनी चाहिए। थोड़ा-बहुत तकलीफ़ भी उठा ली जाए, जब तक बहुत ही जरूरी ना हो गया हो, ना खरीदें। अब और क्या किया जा सकता है।

विदेशी कंपनियॊं के उत्पाद हम खरीदें नहीं, वे साम्राज्यवादी हैं, देशी कंपनियां भी शोषण करती हैं, उनका भी नहीं खरीदेंगे। हम अपने लिए स्वयं सब कुछ पैदा कर नहीं सकते। देखते हैं फिर जीने का क्या रास्ता निकलता है। कोई बात नहीं क्या फर्क पड़ता है, हमारी बात रहनी चाहिए, इसके लिए हमें जंगलों में रहना पड़े, कंद-मूल खाना पड़े, कंपनियों से लड़ाई की बातों से दूर, अपने जीवन को बचाने के लिए होने वाले संघर्षों में जुटे रहना पडे। 🙂

एक दुविधा और है कि क्या शोषित वर्ग के पक्ष में सोचनेवाले को कार या महँगी चीजें खरीदनी चाहिए? हमारी समझ में तो नहीं। हमें न्यूनतम सुविधा का उपभोग करना चाहिए। आपको पहले भी इस बारे में अपनी बात मैंने कही है। लेकिन जब एक मित्र यह सवाल गंभीरता से उठा रहे हो, तब उनको क्या कहें? जैसे हमें 10-20 जोड़े कपड़े नहीं रखने चाहिए आदि…यह सब मैं सोचता हूँ।

यह भी पढ़ा, और वह आपकी भेजी बातचीत भी। यत्र-तत्र भी आपके कथन पढ़ने को मिलते रहते हैं। यह हम पहले भी कह चुके हैं कि ये व्यक्तिगत जीवन से जुड़े हुए, व्यक्तिगत ईमानदारी और सैद्धांतिकता से जुडे सवाल हैं, एक व्यक्ति के रूप में जितना भी हो सकता है हमें अपना जीवन सादगी और आवश्यक सुविधाओं तथा साधनों के साथ ही जीना चाहिए। इसमें कोई दोराय नहीं है।

पर हम जब इनको नियमावलियों और सनकों में बांध लेते हैं, इन्हें अपने अस्तित्व और अस्मिता से जोड लेते हैं, इन्हें ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं, और फिर इन्हें सामाजिकता के साथ अंतर्संबंधित करके अपने संबंध तय करने लगते हैं, दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षाएं करने लगते हैं, अपने साथ जुड़ने की प्राथमिकताएं बनाने लगते हैं, अपने समूह की रूढि़यों और परंपराओं में आबद्ध करने लगते हैं, तो दरअसल हम एक संप्रदाय़ बन रहे होते हैं। अपने को सीमित कर रहे होते हैं। जो हमारे इन-इन कर्मकांडों को मानेगा वही हमारे साथ चल सकता है, ये ही खरीदना होगा, ये ही पहनना होगा, ये ही भाषा बोलनी होगी, आदि-आदि। अब जो मानता जाएगा वही हमारे संप्रदाय में शामिल हो पाएगा। फिर हम यह चाहेंगे सभी ऐसा ही करें, यही प्रचार हम करेंगे। दूसरे संप्रदायों से जो ऐसा नहीं करते हैं, हमारी घृणा संघर्ष भी पैदा करेगी। हम सांप्रदायिक होते जाएंगे।

हम क्या सोचते हैं, क्या मानते हैं, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण कर गुजरना है। हमें जो भी संभव हो सकता है, करते रहना चाहिए। बिना किसी अन्य से अपेक्षा पाले हुए, बिना इसका श्रेष्ठता-बोध और दंभ पाले हुए। जो करते हैं, या नहीं भी करते हैं अभी, और उसका ढोल पीटने लग जाना, सिर्फ़ उसकी बात करके ही अपनी श्रेष्ठताबोध की ग्रंथि को संतुष्ट करना और लोगों पर उसका आंतक फैलाना, शायद ठीक बात नहीं। आप करते रहिए, जो भी बेहतर कर सकते हैं, जो भी बेहतर किया जाना चाहिए, अपने व्यक्तिगत जीवन को यथासंभव ईमानदार बनाइए, वह अपने आप ही लोगों पर असर करता ही है। आपके व्यक्तित्व की यह भली छापें ही फिर आपके विचारों, मान्यताओं, सिद्धांतों को भी लोगों के बीच में आदर का पात्र बना देंगी।

यह भी सोचिए कि हमें इतनी जल्दबाज़ी क्यों हैं? इससे हमें, हमारी सोच और समझ और सक्रियता को नुकसान हो रहा है या फायदा? पता नहीं हमारी मूल लड़ाई क्या है? हमारे लक्ष्य क्या हैं? और हम फिलहाल कहां उलझ जाना चाहते हैं? इस तरह के सवालों से भी जूझ लेना चाहिए। 🙂


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: