नास्तिकता, नैतिकता और विश्वसनीयता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


नास्तिकता, नैतिकता और विश्वसनीयता

images (1)एक और सवाल है। एक जन ने कहा था कि धर्म को नहीं मानने पर ‘रिश्तों में पवित्रता’ का सवाल बचा रहता है। नास्तिक कैसे रिश्तों की पवित्रता में विश्वास करता है? यह सवाल मुझे महत्वपूर्ण लगा। इसपर कहिए कुछ।

दिमाग़ो में, सिद्धांतों में ‘रिश्तों में पवित्रता’ को भले ही कोई धर्म से जोड़ता रहे, पर व्यवहार में हम देखते हैं ‘रिश्तों में पवित्रता’ के सवाल का धर्म से दूर-दूर तक कोई व्यावहारिक नाता नहीं ठहरता है। सामाजिक व्यवहार या सक्रियता के सामाजिक और नैतिक मानदंड़, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से तय हुआ करते हैं। धर्म इनका एक अंग मात्र है और हो सकता है कि यह इन्हें तय करता हुआ सा लगे, पर वास्तविकता में यह अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रह पाता। धर्म अगर तय कर रहा होता तो हमारे भारत जैसे महान आध्यात्मिक और धार्मिक देश में रिश्तों के बीच कमाल की पवित्रता कायम रह रही होती। पर हम जानते हैं, ऐसा है नहीं।

धर्म कई बार वही रहता है, पर उसके अलग-अलग स्थानों और सभ्यताओं में, सामाजिक रिश्ते बनाने और निभाने में पवित्रता के नैतिक मानदंड़ बदल जाया करते हैं। पितृसत्तात्मक समाजों की नैतिक परंपराओं में जो रिश्ते अपवित्र माने जाते हैं, मातृसत्तात्मक समाजों की नैतिक परंपरा में उन्हें जायज़ रिश्तों में ढाला जाता है। आपके पास एक पुस्तक है नीतिशास्त्र, उसके ज़रिए आप इन नैतिकताओं की समस्या के बारे में अधिक जान पाएंगे। एक नास्तिक, सामाजिक नैतिकता के अधिक ऊंचे आदर्शों और मानदड़ों से संचालित हो रहा होता है, अपनी अधिक व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के साथ समाज से बाबस्ता हो रहा होता है तो वह अपने रिश्तों और उनकी पवित्रता को भी इन्हीं आदर्शों और जिम्मेदारियों के सापेक्ष ऊंचे स्तर पर रखने को मजबूर होता है। यहां व्यक्तिगत ईमानदारी का मू्ल्य अपनी मूलगामिता निभा ही रहा ही होता है। व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदारी के मूल्य से संपृक्त मनुष्य हर अवस्था में अधिक नैतिक रह सकता है। व्यक्तिगत तौर पर ईमानदारी और जिम्मेदारी के मूल्यों से विरत व्यक्ति धार्मिक आस्थावान हो, या नास्तिक वह अपनी नैतिकता में ढीलमपोल से ही पेश आएगा।

धार्मिक व्यक्ति के पास अपनी नैतिकता से विचलन के कई शास्त्रीय-धार्मिक उदाहरण और धार्मिक मिथकों की तार्किकताएं मिल सकती हैं जिन्हें वह अपनी ढ़ाल या जायज़ता के लिए इस्तेमाल कर सकता है, और करता ही है। जबकि एक नास्तिक, जो एक उच्चस्तरीय सामाजिक नैतिकता से भी संपृक्त हो, के पास विशुद्ध नैतिक और सामाजिक मानदंड़ो के सिवाय कुछ नहीं होता, और वे उसके सामाजिक हितों और पवित्रताओं से विचलन को निरंतर नाजायज़ ही ठहराएंगे।

‘वह अपने रिश्तों और उनकी पवित्रता को भी इन्हीं आदर्शों और जिम्मेदारियों के सापेक्ष ऊंचे स्तर पर रखने को मजबूर होता है’….यानि दमन होता हैं कहीं-न-कहीं।….जैविक व्यवहार एक यथार्थ है और इससे इतर कोई भी छद्म सिद्धांत जो जाहिर है, धर्म में खूब है, आदमी को दिखावा करने वाले, घोर दमनकर्ता बनाते हैं।…बात यह है कि ‘मजबूर होता है’ का अर्थ ऐसा ही लगा।

हमें चीज़ों को उनके द्वंद में ही समझना होगा। चीज़ें हमेशा द्वंद में ही होती हैं। व्यक्तिगतता का सामाजिकता के साथ, जैविक व्यवहार का सचेतन व्यवहार के साथ, आदि-आदि हमेशा अन्योन्य द्वंद में होते हैं। मनुष्य अपने सामाजिक दायरे में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लक्ष्य के मद्देनज़र इनमें एक सामंजस्य पैदा करता है। सामाजिक मूल्यों के सापेक्ष कुछ व्यक्तिगतताओं को छोड़ दिया जाता है, तो कुछ व्यक्तिगत आवश्यकताओं के समक्ष सामाजिकता से आंख बचा ली जाती है। कुछ जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सचेतनता को ताक पर रखा जा सकता है, और कभी सचेतन व्यवहार के लिए जैविक जरूरतों को भी कुर्बान किया जा सकता है।

जब हम बिना इनकी महत्ताओं, कमियों, इनके प्रभावों को समझे हुए जबरन इनका प्रतिरोध करते हैं, इन्हें दबाने की कोशिश करते हैं तो यह दमन है और जाहिरा तौर पर ये विचार और व्यवहार में अपने नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है। परंतु जीवनीय व्यवहार और सामाजिकता तथा सामूहिकता के मूल्यों के लिए जब हम अपने व्यवहार में समुचित सांमजस्य पैदा करते हैं, पूरी समझ और विवेक से, कुछ मूल्यों के सापेक्ष बेहतर चुनाव या परित्याग करते हैं, तब यह दमन नहीं बल्कि अपने व्यवहार का सचेतन नियमन होता है और नकारात्मकताओं के विपरीत, सही व्यवहार कर पाने के अपने लक्ष्यों की पूर्ती की संतुष्टि प्रदान करता है।

हमने जब इसी मूल्य-सापेक्ष व्यवहार के लिए ‘मजबूर होता है’, वाक्यांश का प्रयोग किया तो इसका मतलब यही था कि हमारे व्यवहार की कसौटियां, हमारे द्वारा अपनाए गये जीवन मूल्य, हमें जैविक व्यवहार की सीमाओं से बाहर निकलने, अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर, सचेत रूप से मानवोचित व्यवहार करने के लिए निरंतर दबाब बनाते रहते हैं, मजबूर करते रहते हैं।

आपकी बात सामान्यतः सही है कि एक ऐसे परिदृश्य में जब व्यवस्था और परिवेश, जैविक व्यवहारों से ओतप्रोत व्यक्तिवादी मूल्यों में मनुष्यों को अनुकूलित कर रही है, तो उनके व्यवहार में केवल ‘डिग्री’ का अंतर ही रह जाता है। यानि वे आंतरिक रूप से सभ्य और सामाजिक नहीं हो पाए हैं, केवल अपने अन्य स्वार्थों की सुनिश्चितता के लिए, ऐसे दिखावों के लिए अभिशप्त हैं। ऐसे व्यक्ति गाहे-बगाहे, येन-केन प्रकारेण इस तरह की चीज़ों को व्यवहार और विचारों में प्रदर्शित करते रहते हैं और जब मौका मिलता है तो वे अधिक मारक और खतरनाक साबित हो सकते हैं।

जैविक व्यवहार की कुछ अभिव्यक्तियां यथार्थ है, पर सामाजिक व्यवहार की आवश्यकता भी एक यथार्थ ही है। जैसा कि आपने कहा इनके सापेक्ष पैदा और थोपे गये छद्म सिद्धांत व्यक्तियों को दिखावा करनेवाले घोर दमनकर्ता बनाते हैं, इसलिए इन यथार्थों के सापेक्ष वास्तविक यथार्थ सिद्धांतो का निरूपण और व्यवहार ही समुचित बदलाव रच सकता है, सामाजिक मूल्यों द्वारा शासित व्यवहार को सहज व्यक्तिगत व्यवहार में अनुकूलित कर सकता है।

आपने विश्वसनीयता की बात की है। लेकिन यह आएगी कैसे और आम जन के साथ पहले वैचारिक लड़ाई न लड़कर विश्वसनीयता की बात करें कैसे, इस पर कुछ कहेंगे तो अच्छा लगेगा और यह आवश्यक भी है, इस व्यक्ति के लिए।

जब हम किसी के साथ किसी भी तरह की अंतर्क्रिया करते हैं तो यदि हम उसकी चेतना के स्तर तक पहुंच के बात करते हैं, यानि उसकी भाषा, उसकी समझ, उसकी तार्किक क्षमताओं के दायरे में बात करते हैं तो हमारा व्यवहार हमें उसके साथ जोड़ता है। चेतना के स्तर पर भी और व्यवहार के स्तर पर भी, यही विश्वसनीयता के संबंधों की शुरुआत होती है। हमारा पारदर्शी, सहज और हर आयाम से किया गया विश्वसनीय व्यवहार भी हमारी विश्वसनीयता बढ़ाता है।

आमजन के साथ वैचारिक लड़ाई की बात करना ही बेमानी है। उसके पास सामन्यतः वैचारिक परिपक्वता ही नहीं पैदा हो पाती, तो फिर उसके साथ विचारों के स्तर की लड़ाई भला कैसे की जा सकती है। यानि कि उसके साथ लड़ाई नहीं, वरन् शनैः शनैः वैचारिक विनिमय और उसके विचारों तथा तार्किकता का उन्नयन किया जा सकता है। यह भी तभी संभव हो सकता है जबकि हम पहले उसके साथ अंतर्क्रिया में, अपने व्यवहार में उसके साथ एक अपनापा पैदा कर चुके हैं, विश्वास के संबंध बना चुके हैं, वह हमारे व्यवहार और उद्देश्यों के प्रति सशंक नहीं रहता, आदि।

कई बार जबकि सीधी अंतर्क्रिया भी संभव नहीं हो रही हों, फिर भी हमारी या हमारे समूह की सक्रियता और कार्यवाहियों की सूचनाएं आमजन के मानस में हमारी या हमारे समूह के प्रति विश्वसनीयता बढ़ा रही होती है, यदि वे वाकई इस लायक हैं तो। इसलिए हमें, हमारी कार्यवाहियों को, हमारी पद्धतियों, हमारे लक्ष्यों को, उनकी जरूरतों, उनकी आकांक्षाओं के साथ सा्मंजस्य बैठाना होगा। हमारी गतिविधियां और हमारे लक्ष्य, यदि उनकी अपेक्षाओं के साथ तालमेल खा्ते, उनके वास्तविक जीवन से ( ना कि किसी अवास्तविक खोखले उपदेशात्मक आदर्शों की तरह ) जुड़े प्रतीत होते हुए लगेंगे तो वे अपना स्वाभाविक जुड़ाव हमसे बनाएंगे, और तब हमारा व्यवहार और उनके प्रति हमारा रवैया ही उनके बीच हमारी विश्वसनीयता बढ़ाएगा।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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