आस्थाओं-मान्यताओं के मामले में हस्तक्षेप

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


आस्थाओं-मान्यताओं के मामले में हस्तक्षेप

A5_FHFDetailमैं भी महसूस करता हूँ कि नास्तिक कहलाने से और सीधे सब अंधविश्वासी परम्पराओं का विरोध करने से लोग और यह व्यवस्था अस्वीकार कर देते हैं। इसका समाधान क्या है? लोग सुनने तक को तैयार नहीं होते नास्तिक और गैर-पूंजीवादी विचारों पर।

सभी लोग अपने हिसाब से खूब समझदार होते हैं, और अपने को एकदम अद्यतन और सही समझते हैं। यह भ्रम या ग़लतफ़हमी उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक भी है, वरना जीना ही मुश्किल हो जाए। वे इसकी सीमाएं भी ख़ुद से ही समझते हैं, और अपने को लगातार और अद्यतन करते रहते हैं। पर यदि कोई उनके अस्तित्व की इस जरूरी शर्त के सामने उसे ग़लत साबित करते हुए, उसे कमतर सिद्ध करते हुए, अड़ जाए, उनकी आस्थाओं और मान्यताओं के विपरीत बातों पर उनको मुतमइन करना चाहे ( इसका एक सीधा या कभी-कभी अप्रत्यक्ष मतलब यह भी होता है कि वह सामने वाले की श्रेष्ठता को भी स्वीकार करले, यानि अपने आप को उससे कमतर भी ) तो फिर वह क्या करे। समर्पण कर दे, और अपना जीना मुहाल कर ले।

सामान्यतः वह इसके बचाव की राह अपनाता है, अपने श्रेष्ठताबोध की रक्षा पर उतारू होता है, येन-केन प्रकारेण अपने को सही साबित करने की कोशिश करता है ( भले ही उसे लगने भी लगे कि शायद वह गलत है, हालांकि यह भी कम ही हो पाता है क्योंकि हर मान्यता की अपनी तार्किकता होती है ) और क्यूं ना करे यह उसके अधिकार क्षेत्र की बात है, जो उसे अच्छा या सही लगता है वह उसे माने।

अब यदि हम अपनी मान्यताओं और तार्किकताओं को ( जो कि सांयोगिक है इस हिसाब से कि हमारी परिस्थितियों ने सांयोगिक रूप से यह संभव बना दिया कि हम उस नई तार्किकता तक पहुंच पाए और हमने अपनी मान्यताओं और विचारों को तदअनुरूप बदल लिया है ) किसी पर थोपने की कोशिश करेंगे, और वह भी इस तरह से कि हमारा श्रेष्ठताबोध भी साफ़ परिलक्षित हो रहा हो, और हम अप्रत्यक्ष रूप से ही सही उसके अहम् को चोट पहुंचा रहे हो, उसे ग्लानि से भरने की कोशिश कर रहे हों, अपने को श्रेष्ठ और उसे कमतर साबित से करते से लग रहे हों तो वह अपने उपरोक्त अधिकारों का प्रयोग करेगा ही। और इसमें उसके नज़रिए से कुछ ग़लत भी नहीं होगा।

संप्रेषण और अंतर्क्रिया के इस मनोविज्ञान को समझे बिना हम किसी और की चेतना में सार्थक हस्तक्षेप नहीं कर सकते। सिर्फ़ अपनी ढ़पली अपना राग अलाप सकते हैं। अपने विचारों, अपनी तार्किकताओं, अपनी मान्यताओं को सिर्फ़ फैंक सकते हैं, सामने वाले को इन विचारों पर मुतमइन नहीं कर सकते।

यानि कि यदि हम चाहते हैं कि ऐसा हो तो हमें फिर इसी के हिसाब से पद्धतियां भी अपनानी होगी। दूसरे के विचारों को सुनना, उन्हें उचित आदर देना सीखना होगा। लहज़े और भाषा में उचित नम्यता लानी होगी। विरोधी विचार रखते समय काफ़ी सावधानी बरतनी होगी, ताकि वह ऊपर वर्णित रूप लेता हुआ सा ना लगे। वह हमारी तार्किकता ( जिसे कि हम ज़्यादा बेहतर समझ रहे हैं ) को यदि आत्मसात कर पाएगा तभी यह हो सकता है उसके अंदर भी कुछ टूटे-जुड़े ( हालांकि फिर भी यह हो सकता है कि वह उस समय ही तात्कालिक रूप से स्वीकार ना करे पर उसके मनोजगत में हलचल मच चुकी होगी)।

यह भी वहीं हो पाता है, सारी सावधानियां बरतते हुए भी, जहां कि सामने वाले के अंदर जिज्ञासा, वस्तुगतता और वैचारिक ईमानदारी हो। यदि वह अपनी मान्यताओं और तार्किकता के साथ आत्मपरकता के साथ जुड़ा हुआ है, उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ ले रहा है, उन्हीं पर उसका जीवन निर्भर है तो यह उम्मीद करना भी बेमानी है वह हमारी बात पर जरा भी ध्यान भी देगा। मानना-वानना तो बहुत दूर की बात है।

अभी आप अध्ययन कर रहे हैं, आप धीरे-धीरे यह समझ पाएंगे कि विचार निरपेक्ष नहीं होते। किसी के भी विचार उसकी भौतिक, सामाजिक व परिवेशगत परिस्थितियों के संकुल के उत्पाद होते हैं। सरल भाषा में हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य के विचार उसकी परिस्थितियां पैदा कर रही होती हैं। यानि हम उसके विचारों में परिवर्तन चाहते हैं, तो यह सिर्फ़ वैचारिक उपदेशों, तार्किक बहस-मुहाबिसों के भरोसे संभव ही नहीं है। उक्त नियम कहता है कि परिस्थितियों को बदल दीजिए, विचार भी बदलने लगेंगे।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी वज़ह से वैचारिक उन्नयन के लिए प्रस्तुत मनुष्य ही इन अवस्थाओं में होता है कि वह अपनी मान्यताओं और आस्थाओं के साथ वस्तुगतता के साथ जूझ सके, अपने विचारों में गंभीर परिवर्तन कर सके। सामान्यतः सामान्य मनुष्य से इसकी उम्मीद करना बेमानी है। जब उनकी वास्तविक परिवेशीय परिस्थितियां बदलती हैं तभी वे नई परिस्थितियों के अनुसार ही अपने विचार भी बदलने लगते हैं।

हमको यह भी समझना होगा कि इसी तरह धर्म, आस्तिकता, ईश्वर, आदि-आदि के विचार भी ठोस वस्तुगत ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज हैं, और इन परिस्थितियों के लोप के साथ ही शनैः शनैः इनका भी लोप हो जाएगा। हम जबरन बड़े पैमाने पर इन्हें ख़त्म नहीं कर सकते। सिर्फ़ वैचारिक रूप से इनसे लड़कर तो कभी नहीं।

इसलिए आस्थाओं को, आस्तिकताओं को बहस-मुहाबिसे का विषय बनाना कतई भी उचित नहीं है। सामन्यजन इन्हीं में डूबा हुआ है, हम इसी से शुरुआत करेंगे तो प्रारंभ में ही अपनी विश्वसनीयता खो देंगे, बीच में एक खाई पैदा कर लेंगे, संवाद से अपने आपको मरहूम कर लेंगे और कुछ और भी सार्थक करने की अवस्थाओं में नहीं होंगे। यानि हमें अपना संघर्ष, ठोस वस्तुगत परिस्थितियों में ही, इन परिस्थितियों में बदलाव के लक्ष्य पर ही केंद्रित रखना होगा। एकबारगी विश्वसनीयता और संवाद कायम हो जाए तो हम धीरे-धीरे अन्य वैचारिक ज्ञान की मुहीमों से समझ को बढ़ाने की शुरुआत कर सकते हैं। और बिना इसको मुख्य मुद्दा बनाए, व्यक्तिगत मान्यताओं का प्रश्न ही बनाए रखकर, उन्हें मानने और अपनाने की आज़ादी को वास्तविकता में ही महसूस करवा कर ही हम इस आस्था के मामले में भी धीरे-धीरे दखल दे सकते हैं।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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