मानसिकताओं की परिस्थितियों पर निर्भरता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


मानसिकताओं की परिस्थितियों पर निर्भरता

330535-120225-review-job-painting“हमको यह भी समझना होगा कि इसी तरह धर्म, आस्तिकता, ईश्वर, आदि-आदि के विचार भी ठोस वस्तुगत ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज हैं, और इन परिस्थितियों के लोप के साथ ही शनैः शनैः इनका भी लोप हो जाएगा।” आपका यह वाक्य आशा और नियतिवादिता को एक साथ बयान करता सा लग रहा है। तब क्या करें और क्या करना चाहिए? इस बारे में कुछ सुझाएँ कि स्वयं के विचारों या चिन्तन में यह बात आए कि संस्कृति क्या है और हमें इन धार्मिक या कर्मकांडी व्यवहार से अधिक परेशान न हुआ जाये।

वह लोप हो जाने वाली बात सामान्य वृहत सामाजिक स्तर पर के लिए कही गई थी, और आशा के साथ-साथ सही है कि नियतिवादिता सी लग सकती है। पर यह समाज के विकास के अंतर्गत की नियमबद्धता है।

कुछ उदाहरण हम अपने आसपास इस तरह के देखते ही रहते हैं। जैसे कि एक ग्रामीण परिवेश के व्यक्ति के लिए रोजाना मंदिर जाना और दिया जलाना एक आवश्यक कार्यवाही हो सकती है जिसे बिना नागा संपन्न किया ही जाना है। परंतु यदि वही व्यक्ति किसी शहर में नौकरी करने लगता है, तो वहां की परिस्थितियां उसे दैनिक रूप से मंदिर जाने की परंपरा का लोप करने के लिए मजबूर कर देती हैं। जैसे-जैसे वह शहरी सभ्यता, व्यवहार आदि सीखने लगता है, वहां के माहौल में रमने लगता है, वैसे-वैसे उसे अपने कई ग्रामीण संस्कारों की अर्थहीनता नज़र आने लगती है, कई चीज़ें जो पहले धार्मिक और आवश्यक थीं, अब धीरे-धीरे अंधविश्वास और त्याज्यता का रूप लेने लगती हैं।

पढलिखकर कई व्यक्तियों को आपने देखा होगा जो अपनी धार्मिकता और आस्थाओं को नया रूप देने की कोशिश करते हुए पाए जाते हैं। वे धर्म की नई परिभाषाओं से अब प्रभावित होने लगते हैं, धार्मिकता की जगह एक उच्च स्तर की आध्यामिकता उन्हें अधिक भाने लगती है, अपने स्तर के ज़्यादा अनुकूल लगने लगती है और वे धार्मिक से आध्यात्मिक होने लगते हैं।

आप मानसिकताओं के निर्माण की परिस्थितियों पर निर्भरता को और अधिक स्पष्टता से समझ सकते हैं, जब आप इस तथ्य को देखते हैं कि जीवन में जितनी अधिक असुरक्षा और अनिश्चितता होती है उतना ही अधिक धार्मिकता में इसका हल खोजा जाता है। जीवन में सुरक्षा और निश्चिंतता धीरे-धीरे इस लौकिकता और ईश्वर पर सीधी निर्भरता को ख़त्म करती जाती है। जैसे-जैसे शिक्षा के क्षेत्र में प्रतियोगिता बढ़ती जा रही है, और शिक्षा के बाद नौकरी की अनिश्चितता मुंह बाए खड़ी है, या वे लोग जो शेयर-मार्केट की अनिश्चितताओं में अपनी जमा-पूंजी लगा कर उलझते जा रहे हैं, वैसे-वैसे शहरों में, पढ़े-लिखे परिवारों में, किशोरों में, नौजवानों में भी ईश्वर, धर्म, मंदिरों, व्रतों, मन्नतों का प्रचलन बढ़ रहा है।

अब क्या करें और क्या करना चाहिए वाली बात पर, हमने वहां ही यह भी लिखा था, ‘हमें अपना संघर्ष, ठोस वस्तुगत परिस्थितियों में ही, इन परिस्थितियों में बदलाव के लक्ष्य पर ही केंद्रित रखना होगा।’ यानि कि लोगों के जीवन की वास्तविक भौतिक समस्याओं से संबंधित जिन बड़े सवालों को लेकर हम ज़मीन पर उतरते हैं, उन्हीं को मुख्य लक्ष्य बना कर हमें संगठन और कार्यवाहियां तय करनी चाहिए।

जहां तक अपने चश्में से देखने और उसके अनुसार किए जाने वाले व्यवहार को अपनी आदर्शी सनक बना लेने की बात है, सभी के पास भी अपने-अपने चश्में होते ही हैं, और यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा चश्मा ही नया है, बदला हुआ है, सामान्य से अलग है, प्रचलन से अलग है ( हमारे पास भी पहले लगभग औरों जैसा ही था )। काल के किसी विशेष क्षण में, समाज के जिस हिस्से में हम सक्रिय होते हैं उसका सामान्य जीवन-परिचालन उसके परिवेश, परिस्थितियों, उसकी सामाजिक चेतना के सामान्य स्वरूप से तय हो रहा होता है। इस परिवेश, इन परिस्थितियों और इस सामान्य सामाजिक चेतना के अपने आयाम, अपनी संस्कृति, अपने विचार, अपनी आस्थाएं, अपनी मान्यताएं आदि-आदि होते हैं। समाज इन्हीं के अनुसार गतिशील रहता है।

अब यदि कोई इनसे इतर कोई आयाम, मान्यताएं आदि लेकर हाजिर होता है या इन्हीं में से उभरता है और समाज की इस गतिशीलता में सार्थक हस्तक्षेप करना चाहता है तो इसकी सीमाओं के अंतर्गत ही यह संभव हो सकता है। यानि कि उसकी क्रियाशीलता और पद्धतियों को उसकी मान्यताओं के आयाम नहीं बल्कि उपलब्ध समाज की यही सीमाएं तय करेंगी। तभी सार्थकता हासिल की जा सकती है।

उनके साथ रहते हुए, उनके सुख-दुख में शामिल रहते हुए, अपनी समझदारी और मान्यताओं के साथ उनके क्रियाकलापों में शामिल रहते हुए ही एक साझेदारी पैदा की जा सकती है। यदि सामान्य आस्थाओं और मान्यताओं को नकारा, उनका मज़ाक उड़ाया जाएगा तो हम अपने को अलगा ही रहे होंगे। यदि थोड़ा-बहुत सम्मिलित रहते हुए हम अपनी बात और मान्यताओं को बिना अहम और श्रेष्ठताबोध का प्रश्न बनाए उनके बीच रखते रहें तो हो सकता है वे भी आपकी बातों को सुने, कभी-कभार गुनें और अपने अनुभवों के साथ उनका सांमजस्य बैठाने का प्रयत्न करें।

सामन्यतः यह देखा गया है कि अधिकतर सभी ही अपनी स्थिति के अनुसार अपनी आस्थाओं और परंपराओं पर संदेह या शक की गुंजाइश बनाए रखते हैं, ठोस जीवन उनकी निस्सारता को उनके भी सामने भी रख ही रहा होता है, पर इसे आदतन, ऐसा ही होता आया है, यही हमारा धर्म है, यही हमारी संस्कृति है, इसमें क्या हर्ज है, हो सकता है इनके पीछे भी कोई वाज़िब बात रही होगी आदि के तर्कों के साथ इन्हें अपनाता और दोहराता चला आता है। साथ ही हमें यह भी समझना चाहिए कि यदि कोई परंपरा जीवित चली आ रही है तो इसका मतलब है कि उसके बने रहने के भौतिक आधार अभी भी बने हुए हैं। इसलिए उन्हें प्राथमिक सवाल नहीं बनाना चाहिए।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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