सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। इस बार संवादों के बीच का एक दोस्ताना लानत-मलामती पत्र प्रस्तुत किया जा रहा है। संवादों के अंश आगे जारी रहेंगे।

आप भी इससे कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती

आज थोड़ा आप पर आपकी बातों पर संदर्भ से हट कर कुछ कहने का इरादा है। आपको बुरा लग सकता है, पर यही फिलहाल हमारा लक्ष्य है, ताकि अच्छा लगने की शुरुआत हो सके। बुरा लगना, पहला कदम है चिंतन को नवीन दिशा देने के लिए।

लगता है, हमारी बातचीत की दिशा, जैसा कि हम लक्षित करके शुरू हुए थे, थोड़ी अलग हो गई है। हमारा मकसद आपसी संवाद के जरिए, आपकी जिज्ञासाओं और सैद्धांतिक उलझनों पर कुछ इशारे करना था, ताकि आप अपनी सक्रियता के लक्ष्य इस वैयक्तिक और वैचारिक विकास हेतु प्रवृत्त कर सकें। पर अभी ऐसा लग रहा है कि संवाद बहस का रूप ले रहा है। निरर्थक बहसों, सहमति या असहमति के पायदानों पर पहुंचना या पहुंचाना हमारा मंतव्य नहीं रहा है। आपको सोचने और पुनर्विचार करने का अवसर पैदा करना लक्ष्य है, उसी हेतु हम कुछ गंभीर इशारे आपकी ओर उछालते रहते हैं, और उम्मीद करते हैं कि वे आपकी चिंतन प्रक्रिया में कुछ हलचल कर सकें।

आप बहुत ज़ल्दी में लगते हैं, प्रतिक्रियात्मक हैं, निष्कर्षात्मक बैचैनी से भरे हुए हैं। अहम् और श्रेष्ठता बोध से भरे हुए। यह आपकी यहां की बातचीत के अलावा भी नेट पर यत्र-तत्र देखे गए बहस-मुहाबिसों के संदर्भ में भी कहा जा रहा है। आपकी बातों में मैं, मेरा इतना होता है कि, वह भी इतना दंभ और अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ कि हमें बैचैनी होने लगती है। सही होना ही महत्त्वपूर्ण है, वह भी अपने नज़रिए और मान्यताओं के हिसाब से नहीं, वरन् वृहत्तर मानवजाति के हितों के सापेक्षतः। सही साबित होना, गलत साबित करना या सही दिखना कोई मायने नहीं रखता। ये तात्कालिक सीमाओं में होने वाले वैयक्तिक मामले हैं, जिनके तात्कालिक परिणाम उस वक़्त की आपकी अपनी सीमाओं पर निर्भर होते हैं। जो जितना झख मारने की स्थिति में होता है, उतना ही वह टिका रहता है और टिके रहने को ही अपनी वैयक्तिक जीत समझने को अभिशप्त होता है।

विचार और बात पृष्ठभूमि में चली जाती है, और वैयक्तिकता हावी हो जाती है। श्रेष्ठताबोध हावी हो जाता है। वैसे भी, छोटे से समय के सतही वाद-विवाद से कभी भी किसी की मानसिकता नहीं बदली जा सकती, और यह बहस का रूप लिये हो तो कतई भी नहीं। इसलिए हमें गलतफहमियां नहीं पालनी चाहिए कि हम कुछ बहसों से, कुछ तथ्यों से, मनमर्जी व्याख्याओं और तर्कों से किसी के व्यक्तित्व और विचारों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। थोड़ा बहुत असर की भी संभावनाएं भी वहीं रहती हैं जहां कि यह संवाद और आपसी विश्वास के साथ हुई ठंड़ी बातचीत में के दौरान हुआ हो।

हम किसी भी तरह के श्रेष्ठताबोध को पसंद नहीं करते, इसलिए नहीं कि यह हमारी पसंद-नापसंद का मामला है, वरन् इसलिए कि यह मनुष्यता के लिए बेहतर नहीं है। श्रेष्ठताबोध, किसी की कमतरी पर टिका हुआ होता है। यह मनुष्य-मनुष्य के बीच में गैरबराबरी, अलगाव, नफ़रत का वायस है, इसीलिए अननुकरणीय है, त्याज्य है। इसलिए धार्मिक, नस्लीय, वैयक्तिक, भाषीय, राष्ट्रीय आदि श्रेष्ठताबोधों के चश्में आधारित विचारधाराएं, मानसिकताएं हमें प्रभावित नहीं करती। किसी भी आत्मपरक लक्ष्य और रूप से व्याख्यायित की गई तथ्यात्मकता बेहतर नहीं है।

हमने आपके सामने कई गंभीर चीज़ें भी रखी, क्लिष्ट संकल्पनाएं भी। और उम्मीद की आप शायद उनसे गुजर कर थोड़ा आंदोलित होंगे, समझ नहीं आने पर उन्हीं के आसपास अपनी जिज्ञासाएं पेश करेंगे। पर ऐसा नहीं हो पा रहा है, आप सिर्फ़ तात्कालिक रूप से प्रतिक्रिया देते हैं, अपनी मान्यताओं के साथ उन पर कोई गंभीर आलोड़न-विलोड़न नहीं करते। आप सिर्फ़ उन्हें अपने चश्में से देखते हैं, तुरंत ही सहमत या असहमत होते हैं और अपनी मान्यताओं की खिलाफ़त सूंघते ही तुरंत बहस-मुहाबिसे के लिए उद्यत हो जाते हैं।

आपने अपने जरा से अनुभवों और जरा से अध्ययन से प्राप्त छुटपुट, भावुक, सतही और सामान्य से विचारों को, इतना मौलिक, इतना क्रांतिकारी, इतना जरूरी समझ लिया है कि आप इस श्रेष्ठताबोध के घटाघोप से बाहर आना ही नहीं चाहते। आपको जिस तरह यह अनोखा और नवीन सा लग रहा है, उतना ही यह एक सामान्य परिघटना है। सभी ऐसे आवेगों से गुजरते हैं, सभी को ऐसा लगता है कि उसके अनुभव, उत्पन्न विचार नितांत मौलिक और अनोखे हैं। परंतु जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते जाते हैं, पता चलता जाता है कि ये एक सामान्य परिघटना ही थे, सभी ऐसे ही आवेगों से गुजरते हैं, सभी ऐसा ही समझते भी हैं। दुनिया बहुत बड़ी है मित्र। हम जब तक किसी भी क्षेत्र में अपने से पहले रचे गए, बुने गए, कहे गए, समझे गए, स्थापित को जान और समझ नहीं लेते, आत्मसात् नहीं कर लेते, तब तक कुछ नया रच ही नहीं सकते। कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में तो लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। अगर आपने समझना चाहा तो, वरना अपने श्रेष्ठताबोध के घेरे में अधिकतर सभी ही जीते ही रहते हैं, अपना पूरा जीवन निकाल देते हैं।

जो कौम ऐसी श्रेष्ठताबोधों से निकलने को राजी ही नहीं होती, निकलना ही नहीं चाहती वह कुछ भी नया और वास्तविक श्रेष्ठ रच ही नहीं सकती। यही हमारी टिपिकल सामान्य भारतीय मानसिकता है। धार्मिकता और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से लबालब, सामंती प्रवृत्तियों से लबरैज, अपने ही बुने-चुने श्रेष्ठताबोधों से भरी-उफनी हुई। यही कारण रहा है, और है कि प्राचीन समय को छोड़कर अभी तक ना तो कुछ नया रच पाये हैं, ना कुछ नया कर पाये हैं। हमारे पास एक भी मौलिक वैज्ञानिक नहीं है, ढंग का टेक्नोक्रेट नहीं है। इसलिए इससे मुक्ति पाना, और दिलाना हमारा अभीष्ट होना चाहिए। ना कि इसी मानसिकता को तुष्ट करता कोई नया सा घटाघोप।

यह बहस करने के लिए, आपके विचार जानने के लिए, आपकी राय, आपकी सहमति या असहमति प्राप्त करने के लिए लिखा दस्तावेज़ नहीं है। अगर आपको इसमें कुछ ठीक लगे तो इसे छोड़कर आगे बढ़ना, गलत लगे तो भी छोड़ कर आगे बढ़ना। क्योंकि यह जरूरी नहीं कि यह आपके सापेक्ष सही ही हो, बस यह है और आवेग में लिख दिया गया है। कुछ आपके सापेक्ष सही हो तो बेहतर करने की चेष्टा, कुछ नहीं हो तो उसको दिल सा ना लगाने की प्रवृत्ति, हमें विकसित करनी चाहिए।

हम आपमें इसे समझ पाने और अन्यथा नहीं लेने की क्षमता महसूस करते हैं, आपमें संभावनाएं देखते हैं, इसीलिए यह जरूरी समझ रहे हैं और लिख पा रहे हैं। आगे भी जब भी जरूरी लगा, कुछ ऐसा-वैसा लिखते रहेंगे। उम्मीद है कि हमेशा की तरह ही आप आपकी शान में की गई इन गुस्ताखियों को आया-गया करते रहेंगे।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: कुछ भी मौलिक नहीं होता « समय के साये में

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