इतिहास की धाराओं को परखना होगा

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


इतिहास की धाराओं को परखना होगा

अब बात धर्मपाल और उनके इतिहास की….राजीव दीक्षित ने इनका जिक्र अपने व्याख्यानों में किया है…25-30 साल तक इन्होंने इस काम पर मेहनत की है, दुनिया के कई देशों के पुस्तकालय आदि छाने…मैंन इन पर संदेह किया…जिस स्रोत को बताया गया है और किताब लिखी गई है, वहाँ मैंने सब देख लिया कि लेखक सही बता रहा है…

इतिहास पर लिखने वालों की गज़ब भरमार है। कई धाराएं यहां काम कर रही हैं। कुछ लोग गंभीर काम कर रहे हैं, वे निरपेक्षता, वस्तुगतता के साथ वैज्ञानिक पद्धतियों से अपने इतिहास की पुनर्रचना में लगे हुए हैं, कुछ लोग नस्लीय आर्य श्रेष्ठता के चश्में से भारत को समूची मानवजाति का मूल सिद्ध करने की रणनीति के तहत इतिहास की मनमानी व्याख्याएं करने में लगे हैं, कुछ श्रेष्ठताबोध तलाशते हुए अतीत से इस श्रेष्ठताबोध को तुष्ट करने लायक सामग्री निकाल रहे हैं, सीमित, अधूरी, एकतरफा विवेचना कर रहे हैं, कुछ पुराणों, महाकाव्यों और मिथकों को ही इतिहास समझने और समझाने में लगें हैं।

सभी काम कर रहे हैं, महनत कर रहे हैं, लाखों पृष्ठ काले कर रहे हैं। ऐसे में सभी स्वतंत्र है, जिसको जो अपनी मानसिकता, अपनी राजनीति, अपने हितों के अनूकूल लगता है उसे उठा रहा है और उसका उपयोग कर रहा है।

राजीव दीक्षित को अपने उद्देश्यों के लिए धर्मपाल उचित जान पड़ते हैं, तो वह उनका संदर्भ लेते हैं, उन्हें चुन लेते हैं। इस चुनाव को श्रेष्ठ और समुचित बताने का प्रक्रम तो करना ही होता है। वैसे मेहनत तो करनी ही होती है, कुछ भी रचना हो। कुछ लोग जानबूझकर बदमाशी करते हैं, कुछ अपनी मानसिकता और मान्यताओं के प्रति कोरी भावुकता में अपना जीवन भी होम कर ही देते हैं। बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के, बिना उस वैज्ञानिक-विषय के प्रति ईमानदारी के, बिना सार्विक वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाए, कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं रचा सकता, चीज़ों को सही और वस्तुगत रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।

तथ्यों का संदर्भ सही हो सकता है, परंतु बात उनकी व्याख्याओं की, इन व्याख्याओं में काम में लिये गए दृष्टिकोण और उनकी दबी-छिपी उद्देश्यपरकता की है, इनके पीछे की आत्मपरकताओं की है। कोई भी, पहले से ही कुछ मन में ठाने, पूर्वाग्रहों को चित्त में समाए, कोई हित या उद्देश्य सामने रख कर जब किसी अनुसंधान में उतरता है, तो उसके निष्कर्ष भी जाहिर है, इसी तरह के होंगे।

धर्मपाल जी की महनत अपनी जगह है, पर उनकी आंखों पर चढ़ा हुआ श्रेष्ठताबोध और राष्ट्रवादी आत्मपरकता का मुलम्मा अपनी जगह ही है। और इसीलिए वे कम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वे राजीव दीक्षित जी के लिए काम के हो सकते हैं, दक्षिणपंथियों, अंधराष्ट्रवादियों के काम के हो सकते हैं, विकीपीडिया पर डाले जा सकते हैं, परंतु इतिहास पर हो रहे गंभीर और वैज्ञानिक शोध और अध्ययन में इनका कोई स्थान हमें अभी तक तो नज़र नहीं आया है। इन्हें वहां संदर्भित होने का मौका भी नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि मंड़न और खंड़न की प्रक्रियाओं में वाद-विवादों, मत-मतांतरों में ये धाराएं एक दूसरे का संदर्भ नहीं देती हैं, हमारा कहने का मतलब यह है कि इनके काम की भागीदारी तो वहां इस वाद-विवाद के लिए भी नहीं दिखती है। वहां पर दूसरे कई इसी मानसिकता के लेखक हैं, जिनके काम को इस लायक तो समझा जाता है कि जिनका खंड़न के प्रयास किये जाते हैं।

यह हमने अपनी जानकारियां ऐसे ही पेश करदी हैं, आप ख़ुद अपने शोध जारी रखे हुए ही हैं। अपनी मान्यताएं बनाना, बिगाड़ना, गलत मानना, सही मानना, अपने दृष्टिकोण को तय करना आपका अधिकार है। आप ही अपने लिए, इसे भली-भांति कर सकते हैं।

एक किताब है ‘भारतीय चित्त, मानस और काल’ धर्मपाल की ही है…किताब में जिन विषयों के संस्कृत विद्यालयों में पढ़ाने की बात की है, उसमें आवश्यक और तकनीकी विषय हैं। जैसे….

ये विषय ठीक ही लग रहे हैं, तथ्यात्मकता के नज़रिए से। उस समय की भारतीय तकनीकी प्रगति के सापेक्ष ही हैं। पत्त्थर और लकड़िया काटने वाले, लौह और अन्य धातुकर्म करने वाले, धागा कातने और बुनने वाले, चूडियां मनके बनाने वाले, नमक बनाने वाले, बारूद पर काम करने वाले, साबुन बनाने वाले, नाव बनाने वाले, मछलियां पकड़ने वाले, धोबी, खाती, जूते बनाने वाले, दर्ज़ी आदि-आदि। ये तकनीकी काम हैं, और उस समय की तात्कालीन जीवनचर्या से जुडे हुए ही लगते हैं। इनमें पता नहीं आप क्या विशेष देख रहे हैं। इसमें गढ़ने लायक कुछ नहीं लग रहा, अब बात यह है कि इनको कोई भी कैसे व्याख्यायित करता है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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